झूठ फैलाना बंद करे पाकिस्तान... UN में सिंधु जल संधि पर इस्लामाबाद के पत्र पर भारत की कड़ी आपत्ति, Court of Arbitration को बताया गैर-कानूनी
भारत ने संयुक्त राष्ट्र (UN) सुरक्षा परिषद को सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) से जुड़े 'कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन' (CoA) के फैसले पर पत्र भेजने को लेकर पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया है। भारत ने पाकिस्तान के इस कदम की तीखी आलोचना करते हुए साफ कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार झूठ और प्रोपेगैंडा फैला रहा है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि तथाकथित मध्यस्थता अदालत गैर-कानूनी तरीके से गठित की गई थी और उसके किसी भी फैसले की भारत के लिए कोई मान्यता नहीं है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक ब्रीफिंग में कहा, "पाकिस्तान की आदत है कि वह अपने बुरे प्रोपेगैंडा को आगे बढ़ाने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश करता है और झूठ फैलाता है। सबसे पहली बात, यह तथाकथित फैसला 'परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन' का नहीं है, जैसा कि पाकिस्तान के मंत्री ने दिखाने की कोशिश की है, बल्कि यह एक गैर-कानूनी तरीके से गठित अदालत का फैसला है।" उन्होंने आगे कहा, "हम इसे सच्चाई को तोड़ने-मरोड़ने की पाकिस्तान की एक और कोशिश के तौर पर देखते हैं। इस मुद्दे पर हमारा रुख बहुत साफ है और हमने इसे कई बार दोहराया है।"
भारत ने लगातार 'कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन' को खारिज किया है। भारत का कहना है कि इसका गठन सिंधु जल संधि का उल्लंघन करके किया गया था और उसने कभी भी इस संस्था को मान्यता नहीं दी या इसकी कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। नई दिल्ली का यह भी कहना है कि ट्रिब्यूनल को भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और इसके फैसलों का भारत के कामों पर कोई असर नहीं पड़ता।
पिछले साल अप्रैल में, पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को रोक दिया था। इस हमले में 26 लोग मारे गए थे। नई दिल्ली ने कहा है कि संधि तब तक रुकी रहेगी जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को अपना समर्थन भरोसेमंद और पक्के तौर पर खत्म नहीं कर देता।
31 अगस्त को, 'कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन' ने एक फैसला सुनाया जिसमें कहा गया कि सिंधु जल संधि लागू रहेगी और भारत इसे एकतरफा तौर पर रोक नहीं सकता। भारत ने तुरंत इस फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि CoA "गैर-कानूनी तरीके से गठित" था और उसे भारत के संप्रभु फैसले पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था।
ब्रीफिंग के दौरान, जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ "भरोसेमंद कार्रवाई" करनी चाहिए, ताकि दुनिया को यकीन हो सके कि इस्लामाबाद जो कहता है, वह करेगा।
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान को कार्रवाई और पक्का इरादा दिखाने की जरूरत है। और उसे सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भरोसेमंद कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि दुनिया को यकीन हो सके कि वह जो कहता है, वह करेगा।" जयसवाल का यह बयान तब आया है जब पाकिस्तान ने अक्टूबर में होने वाली 'फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स' (FATF) की बैठक से कुछ हफ़्ते पहले, अपनी 'मोस्ट-वांटेड' आतंकवादियों की लिस्ट में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के चीफ मसूद अज़हर पर इनाम की रकम 20 लाख PKR से बढ़ाकर 70 लाख PKR कर दी है। भारत ने इस कदम को "दिखावा" और "झूठी घोषणा" बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि इस्लामाबाद को अज़हर के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की ज़रूरत है।
पाकिस्तान का दावा है कि अज़हर अब देश में नहीं है और अफगानिस्तान में छिपा हुआ है। हालांकि, भारतीय खुफिया एजेंसियों का मानना है कि वह पाकिस्तान के सिंध प्रांत के नवाबशाह में है। सूत्रों ने पहले 'इंडिया टुडे टीवी' को बताया था कि यह आकलन पिछले छह महीनों में किए गए तकनीकी विश्लेषण पर आधारित है।
भारत में अज़हर कई हमलों के सिलसिले में वांछित है, जिनमें 2001 का संसद हमला और फरवरी 2019 का पुलवामा बम धमाका शामिल है, जिसमें CRPF के 40 जवान मारे गए थे।
SIR पर अंदरूनी मतभेद की खबरों को चुनाव आयोग ने किया खारिज, कहा- 'सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए', विपक्ष का CEC ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला
देश में 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) प्रक्रिया और चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज को लेकर छिड़े भारी राजनीतिक घमासान के बीच चुनाव आयोग के आधिकारिक सूत्रों ने बड़ा स्पष्टीकरण जारी किया है। आयोग के सूत्रों ने उन तमाम मीडिया रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें दवा किया गया था कि SIR प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयुक्तों के बीच गंभीर मतभेद हैं। आयोग ने साफ किया कि SIR से जुड़े फैसलों समेत तमाम रणनीतिक और प्रशासनिक निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति और सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं।
चुनाव आयोग के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बुधवार को स्पष्ट किया: "भारत के निर्वाचन आयोग के सभी फैसले, जिनमें SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) भी शामिल है, पूरी तरह सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की लिखित मंजूरी व सहमति से ही लिए गए हैं।"
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मीडिया रिपोर्ट में क्या बात उठाई गई थी?
यह स्पष्टीकरण बुधवार को 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें कहा गया था कि SIR प्रक्रिया पर लिए गए फैसलों पर तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की जांच में कहा गया है कि उसने नवंबर 2025 और अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा दर्ज कराई गई लिखित आपत्तियों की समीक्षा की।
रिपोर्ट के अनुसार, "आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई जो उनकी जानकारी के बिना लिए या जारी किए गए थे।"
रिपोर्ट में कहा गया है कि आपत्तियों में SIR, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाताओं को जोड़ने और हटाने, मतदाता सूची के फैसलों से जुड़ी अपील और मतदाता सूची के डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे।
आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया के मुख्य पहलू भी शामिल थे, जैसे नए मतदाताओं को जोड़ना, मतदाता सूची से नाम हटाना, मतदाता डेटाबेस का रखरखाव और मतदाताओं से संबंधित फैसलों के खिलाफ अपील।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने सवाल उठाया कि क्या कुछ फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
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विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की
इस रिपोर्ट ने राजनीतिक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है, जिसमें विपक्षी दलों और नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं और CEC ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग की है।
मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को अपनी मर्जी से चला रहे हैं। पार्टी ने कहा कि 'शिकायतों से यह साफ होता है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में सिर्फ ज्ञानेश कुमार की ही चलती है।'
कांग्रेस ने कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया और चुनाव आयोग में 'वोट की चोरी' और राजनीतिक दखलंदाजी के अपने पुराने आरोपों को दोहराया। पार्टी ने कहा, "ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह ही तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए 'वोट चोरी' में लगे हैं। हमने पहले भी कहा है - मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्ज़ा कर लिया है। ज्ञानेश कुमार मोदी की कठपुतली हैं। इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट इस बात को साबित करती है। मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुँचाया है। लेकिन याद रखें - जब समय आएगा, तो सभी को जवाबदेह ठहराया जाएगा, ज़िम्मेदारी तय की जाएगी। इस अपराध के लिए सज़ा ज़रूर मिलेगी।"
समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस रिपोर्ट को 'बेहद गंभीर' बताया और आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि अगर किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्य फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद नहीं हैं या उनकी चिंताओं को नहीं सुना जाता है, तो इसके लोकतंत्र पर गंभीर परिणाम होंगे। समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा, "इसका सीधा मतलब है कि सभी चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। अगर किसी स्वतंत्र संस्था के सदस्यों को सही काम करने की आज़ादी नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जाती है, तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं। सत्ता में बैठे लोगों की कठपुतली बनकर लोकतंत्र के साथ धोखा करना एक गंभीर संवैधानिक अपराध है। यह लोकतंत्र को खत्म करने की साज़िश से कम नहीं है।"
यादव ने सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत, DMK प्रवक्ता TKS इलांगोवन, AAP नेता सौरभ भारद्वाज और CPI(M) सांसद जॉन ब्रिटास समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दी है और SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
DMK प्रवक्ता TKS इलांगोवन ने बुधवार को BJP पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पार्टी SIR प्रक्रिया के साथ खेल कर रही है। उन्होंने कहा, "BJP सरकार इस SIR के साथ खेल कर रही है। वे इस देश से मुसलमानों को हटाना चाहते हैं। यही उनका मकसद है। वे इसे हिंदू देश बनाना चाहते हैं, जो नामुमकिन है, क्योंकि कानून के मुताबिक, लोगों ने वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराया है और वे यहाँ लंबे समय से रह रहे हैं, और उन्हें यहाँ रहने की इजाज़त मिलनी चाहिए।"
आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता और दिल्ली राज्य अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने भी CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता की बात करते हुए इस बहस में अपनी राय रखी। उन्होंने X पर एक पोस्ट में कहा, "सभी विपक्षी दलों को एकजुट होना चाहिए और सबसे पहले इस CEC का मामला सुलझाना चाहिए। बाकी सब बातें बाद में आती हैं।"
UBT सेना के सांसद संजय राउत ने CEC की और भी कड़ी आलोचना करते हुए दावा किया कि CEC को जल्द ही जेल जाना पड़ सकता है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने X पर पोस्ट किया, "ज्ञानेश कुमार जेल जाएंगे! उन्हें जाना ही होगा! उनके आका देश छोड़कर भाग जाएंगे।"
CPI-M के सांसद जॉन ब्रिटास ने मीडिया रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए चुनाव आयोग को 'एक व्यक्ति की तानाशाही' करार दिया।
ब्रिटास ने X पर पोस्ट किया, "यह अब चुनाव आयोग नहीं रहा। यह CEC ज्ञानेश कुमार के तहत एक व्यक्ति की तानाशाही है!! दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई है। उन्होंने नए वोटरों को जोड़ने और बड़ी संख्या में नाम हटाने की प्रक्रिया को अनधिकृत और गैर-कानूनी बताया है। उन्होंने चुपके से नाम हटाने, बहाल करने और 'फॉर्म 6' में बदलाव करने पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं, जिनसे पहली बार वोट देने वाले युवा परेशान होते हैं- और यह सब उन्हें अंधेरे में रखकर किया गया।"
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