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शांति, स्वतंत्रता और समानता का बुनियादी स्तंभ है लोकतंत्र

लोकतंत्र केवल मतपत्र पर लगाई गई मुहर का नाम नहीं है। यह उस विश्वास का नाम है जिसमें प्रत्येक नागरिक को अपनी आवाज, अपनी गरिमा और अपने अधिकारों के साथ राष्ट्र-निर्माण में सहभागी होने का अवसर मिलता है। एक तरह से शांति, स्वतंत्रता, समानता एवं सह-जीवन का बुनियादी स्तंभ है लोकतंत्र। हर वर्ष 15 सितंबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस इसी लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करने का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2007 में इस दिवस की स्थापना की थी और 2008 से इसका आयोजन हो रहा है। 2026 में अंतर-संसदीय संघ-आईपीयू ने लोकतंत्र दिवस के लिए “मानवाधिकारों को केंद्र में लाएं” को प्रमुख विषय बनाया है। इसका संदेश स्पष्ट है कि मानवाधिकार लोकतंत्र के सजावटी तत्व नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी शर्त हैं। मानवाधिकार सुरक्षित नहीं हैं तो चुनाव, संसद और संविधान की मौजूदगी के बावजूद लोकतंत्र अधूरा रहेगा।

आज दुनिया के सामने लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या लोकतंत्र केवल संस्थागत ढांचे के रूप में जीवित है या उसके भीतर नागरिक स्वतंत्रता, समानता, न्याय, संवाद और मानवीय गरिमा भी सुरक्षित हैं? संयुक्त राष्ट्र भी 2026 में लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित न मानते हुए मानवाधिकार, कानून के शासन और नागरिकों की सार्थक भागीदारी को उसकी अनिवार्य आत्मा मान रहा है। लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि सत्ता का अंतिम स्रोत जनता होती है। लेकिन इसकी कमजोरी भी यहीं से शुरू होती है। जब जनता अपनी जिम्मेदारी भूल जाती है, जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक रहते हैं लेकिन कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाते हैं, जब चुनाव जाति, धर्म, क्षेत्र, धनबल, बाहुबल या झूठे प्रचार के प्रभाव में आने लगते हैं, तब लोकतंत्र का बाहरी ढांचा तो बचा रहता है, लेकिन उसकी आत्मा कमजोर होने लगती है।

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आज दुनिया के अनेक देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। राजनीतिक धू्रवीकरण बढ़ रहा है, संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर दबाव दिखाई देता है तथा सत्ता के केंद्रीकरण की प्रवृत्ति कई समाजों में चिंता का कारण बन रही है। लोकतंत्र के नाम पर चुनाव हो जाना पर्याप्त नहीं है। यदि चुनाव के बाद नागरिकों की आवाज को महत्व न मिले, विपक्ष को शत्रु समझा जाए, मीडिया स्वतंत्र न रहे, न्यायपालिका पर दबाव हो और सत्ता जवाबदेही से मुक्त होने लगे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे बहुमत की निरंकुशता में बदल सकता है। महात्मा गांधी का लोकतंत्र संबंधी चिंतन आज भी इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था- “मेरे विचार में लोकतंत्र में सबसे कमजोर व्यक्ति को वही अवसर मिलना चाहिए जो सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को मिलता है।” गांधी के लिए लोकतंत्र केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने की व्यवस्था नहीं था, बल्कि कमजोर से कमजोर व्यक्ति को सम्मान, अवसर और न्याय उपलब्ध कराने की व्यवस्था था। वे लोकतंत्र को अहिंसा, अनुशासन, आत्मसंयम और नागरिक चेतना से जोड़ते थे। उनका स्पष्ट विचार था कि लोकतंत्र हिंसा और असत्य के सहारे कायम नहीं रह सकता।

विंस्टन चर्चिल का प्रसिद्ध कथन भी लोकतंत्र की वास्तविक प्रकृति को समझने में मदद करता हैकृ “लोकतंत्र शासन की सबसे खराब प्रणाली है, उन सभी प्रणालियों को छोड़कर जिन्हें आजमाया जा चुका है।” यह कथन लोकतंत्र की कमियों को स्वीकार करते हुए भी उसकी श्रेष्ठता को रेखांकित करता है। लोकतंत्र पूर्ण व्यवस्था नहीं है, लेकिन उसमें आत्म-सुधार की क्षमता है। जनता सरकार को चुन सकती है, उसकी आलोचना कर सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उसे बदल सकती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है-सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण। जहाँ सत्ता परिवर्तन के लिए हिंसा, क्रांति या रक्तपात की आवश्यकता नहीं पड़ती और मतदाता अपनी इच्छा से सरकार बदल सकता है, वहाँ लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं। लेकिन इसके लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन व्यवस्था, स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और सक्रिय नागरिक समाज आवश्यक हैं।

आज लोकतंत्र के सामने एक नई और जटिल चुनौती कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई और डिजिटल तकनीक के रूप में भी सामने आई है। तकनीक लोकतंत्र को अधिक सहभागी और पारदर्शी बना सकती है। सरकारी योजनाओं की निगरानी, नागरिक शिकायतों के समाधान, नीति-निर्माण में आंकड़ों के उपयोग और जनता की राय को शासन तक पहुंचाने में एआई उपयोगी हो सकता है। लेकिन यही तकनीक गलत सूचना, डीपफेक, लक्षित दुष्प्रचार, हेट स्पीच और जनमत को प्रभावित करने का माध्यम भी बन सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने भी एआई की इन संभावनाओं और जोखिमों के बीच संतुलन तथा उसके जिम्मेदार शासन की आवश्यकता पर बल दिया है। इसलिए लोकतंत्र का डिजिटल भविष्य केवल तकनीकी क्षमता से तय नहीं होगा, बल्कि इस बात से तय होगा कि तकनीक के पीछे मानवीय विवेक कितना मजबूत है। एआई लोकतंत्र का विकल्प नहीं, लोकतांत्रिक विवेक का सहायक होना चाहिए। तकनीक नागरिक को नियंत्रित करने का उपकरण नहीं, नागरिक को सशक्त करने का माध्यम बने-यही लोकतांत्रिक तकनीकी संस्कृति की कसौटी होनी चाहिए।

लोकतंत्र की दूसरी बड़ी आवश्यकता है संवाद की संस्कृति। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। सरकार से प्रश्न पूछना राष्ट्र-विरोध नहीं; विपक्ष की आलोचना लोकतंत्र-विरोध नहीं; मीडिया द्वारा सत्ता से जवाब मांगना व्यवस्था-विरोध नहीं। बल्कि यही लोकतंत्र की जीवंतता के प्रमाण हैं। जब असहमति को दबाया जाता है, तब लोकतंत्र का संवाद समाप्त होता है और उसके स्थान पर भय जन्म लेता है। इसीलिए लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों में भी आंतरिक लोकतंत्र जरूरी है। जो राजनीतिक संगठन अपने भीतर विचार-विमर्श, पारदर्शिता और नेतृत्व परिवर्तन की स्वस्थ परंपरा नहीं रखते, वे व्यापक समाज में लोकतांत्रिक संस्कार कैसे विकसित कर सकते हैं? लोकतंत्र की शुरुआत संसद से पहले राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के भीतर होनी चाहिए। साथ ही लोकतंत्र को केवल राष्ट्रीय सत्ता तक सीमित रखना भी उचित नहीं। पंचायत, नगर निकाय और स्थानीय संस्थाएं लोकतंत्र की वास्तविक पाठशाला हैं। जिस लोकतंत्र में गांव का नागरिक अपने स्थानीय निर्णयों में सहभागी नहीं है, उसमें लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण अधूरा है। गांधी का ग्राम स्वराज इसी व्यापक लोकतांत्रिक दृष्टि का प्रतीक था-सत्ता का प्रवाह ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर की ओर हो।

लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों को भी यह समझना होगा कि अधिकारों के साथ कर्तव्य जुड़े हैं। मतदान करना ही नागरिकता की पूर्ण जिम्मेदारी नहीं है। सही सूचना प्राप्त करना, संविधान और कानून का सम्मान करना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना और गलत नीतियों के विरुद्ध शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाना भी नागरिक धर्म है। अंततः लोकतंत्र कोई तैयार होकर मिल जाने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि निरंतर साधना है। उसे हर पीढ़ी को अपने आचरण, संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से मजबूत करना पड़ता है। लोकतंत्र तभी सार्थक है जब सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह हो, संस्थाएं स्वतंत्र हों, मानवाधिकार सुरक्षित हों, कमजोर को न्याय मिले, असहमति का सम्मान हो और नागरिकों को यह विश्वास हो कि शासन वास्तव में उनके कल्याण के लिए है।

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विविधता और जनभागीदारी का अद्भुत उदाहरण है। विशाल जनसंख्या, भाषाई-सांस्कृतिक विविधता और अनेक राजनीतिक विचारधाराओं के बावजूद भारत ने संविधान, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और स्वतंत्र निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से लोकतांत्रिक व्यवस्था को निरंतर मजबूत किया है। सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण, स्वतंत्र न्यायपालिका, जीवंत संसद, सक्रिय मीडिया और मजबूत नागरिक समाज इसकी लोकतांत्रिक शक्ति के प्रमुख आधार हैं। भारत का लोकतंत्र यह संदेश देता है कि विविधता विभाजन नहीं, शक्ति बन सकती है। इसकी वास्तविक मजबूती तभी कायम रहेगी, जब नागरिक अधिकारों के साथ कर्तव्य, सहिष्णुता, संवाद, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति आस्था को भी सर्वाेच्च महत्व दिया जाए।

अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस हमें इसी आत्ममंथन का अवसर देता है। आज आवश्यकता केवल लोकतंत्र को बचाने की नहीं, बल्कि उसे अधिक मानवीय, अधिक सहभागी, अधिक पारदर्शी और अधिक जवाबदेह बनाने की है। मानवाधिकार उसकी बुनियाद हैं, जनभागीदारी उसकी शक्ति है, संवाद उसकी आत्मा है और जवाबदेही उसकी सुरक्षा-कवच। जब तकनीक मानवीय करुणा से जुड़ेगी, सत्ता नैतिकता से बंधेगी और जनता अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक होगी, तभी लोकतंत्र अपने आदर्श रूप को प्राप्त कर सकेगा। ’लोकतंत्र की असली विजय तब होगी, जब सबसे शक्तिशाली नागरिक और सबसे कमजोर नागरिक-दोनों को न्याय, सम्मान, अवसर और अपनी आवाज की समान कीमत महसूस हो। यही लोकतंत्र का सार है और यही उसके भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी भी।’

- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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ब्रिक्स@20: सपने बड़े, चुनौतियां उससे बड़ी, ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत?

कभी चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए गढ़ा गया ‘ब्रिक’ आज 11 देशों की बड़ी इमारत बन चुका है। हालांकि किसी भी इमारत की मजबूती उसके आकार से नहीं, नींव से तय होती है। यही सवाल अब ब्रिक्स के सामने है कि क्या यह समूह केवल पश्चिमी प्रभुत्व के विकल्प की तलाश करता राजनीतिक मंच बनेगा या वैश्विक दक्षिण की आर्थिक और विकास संबंधी आकांक्षाओं को ठोस शक्ति में बदल सकेगा? नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को भारत मंडपम में हो रहा 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस सवाल के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारत की अध्यक्षता में हो रहा यह सम्मेलन ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष पूरे होने का भी साक्षी है। इसलिए यह केवल वार्षिक बैठक नहीं बल्कि दो दशक की यात्रा के मूल्यांकन और अगले चरण की दिशा तय करने का अवसर है।

ब्रिक्स की शुरुआत मूलतः एक आर्थिक अवधारणा के रूप में हुई थी। 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की आर्थिक संभावनाओं को रेखांकित करते हुए ‘BRIC’ शब्द गढ़ा। तब यह निवेश विश्लेषण की शब्दावली थी लेकिन जल्द ही इन देशों ने महसूस किया कि उनकी समानता केवल तेज आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था में असंतुलन भी उनकी साझा चिंता है। 2006 में चारों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला शिखर सम्मेलन इस अवधारणा को औपचारिक अंतर-सरकारी मंच में बदलने की निर्णायक कड़ियां बने। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने इस प्रक्रिया को और बल दिया। पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था की कमजोरियों ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं को यह सवाल उठाने का अवसर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते योगदान के अनुरूप वैश्विक संस्थाओं में उनकी हिस्सेदारी क्यों न बढ़े।

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दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद 2011 में ‘BRIC’ का ‘BRICS’ बनना इसके विस्तार का पहला बड़ा पड़ाव था। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तथा 2025 में इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने से समूह 11 देशों तक पहुंच गया। साझेदार देशों की बढ़ती संख्या ने इसका दायरा और व्यापक कर दिया है। अब ब्रिक्स एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण अमेरिका की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाता है। यह विस्तार केवल संख्या नहीं है, इसके साथ बाजार, ऊर्जा, संसाधन, जनसंख्या और रणनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है लेकिन यही विस्तार ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती भी है। अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक संरचनाओं और विदेश नीति की प्राथमिकताओं वाले 11 देशों के बीच साझा एजेंडा बनाना पहले की तुलना में कहीं कठिन है। भारत-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, रूस की भू-राजनीतिक स्थिति और पश्चिम एशिया के तनाव इसके सामने जटिल समीकरण पैदा करते हैं यानी ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है।

भारत ने 2026 की अध्यक्षता के लिए ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण’ की थीम चुनकर इसी चुनौती का व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश की है। ‘मानवता प्रथम’ की भावना से जुड़ा यह दृष्टिकोण ब्रिक्स को भू-राजनीतिक नारों से निकालकर विकास के ठोस एजेंडे से जोड़ता है। भारत की अध्यक्षता में 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। राजनीतिक एवं सुरक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय तथा सांस्कृतिक एवं जन-से-जन संपर्क इसके तीन प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अब असली परीक्षा यह है कि इन बैठकों के निष्कर्ष कितने ठोस परिणामों में बदलते हैं। ब्रिक्स की आर्थिक प्रासंगिकता का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान है। डॉलर की भूमिका कम करने की चर्चा लंबे समय से होती रही है लेकिन साझा ब्रिक्स मुद्रा निकट भविष्य में व्यावहारिक लक्ष्य नहीं दिखती। सदस्य देशों की मौद्रिक नीतियां, आर्थिक संरचनाएं और वित्तीय बाजार काफी अलग हैं। इसलिए अधिक यथार्थवादी रास्ता यह है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़े, भुगतान प्रणालियां आपस में जुड़ें और सीमा-पार लेन-देन की लागत घटे।

यहीं भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का अनुभव महत्वपूर्ण हो जाता है। यूपीआई, डिजिटल पहचान और खुले डिजिटल ढ़ांचे ने भारत में कम लागत पर बड़े पैमाने पर वित्तीय समावेशन को संभव बनाया है। यदि ऐसे मॉडलों को ब्रिक्स देशों के बीच सुरक्षित और अंतर-संचालनीय तरीके से जोड़ा जा सके तो यह केवल तकनीकी सहयोग नहीं होगा बल्कि विकासशील देशों के लिए व्यापार और वित्त का नया आधार तैयार कर सकता है। न्यू डेवलपमेंट बैंक इस दिशा में ब्रिक्स की सबसे ठोस संस्थागत उपलब्धियों में है। 2014 में स्थापित इस बैंक ने यह दिखाया कि ब्रिक्स केवल वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार की मांग करने वाला समूह नहीं, विकासशील देशों की जरूरतों के लिए वैकल्पिक वित्तीय क्षमता बनाने वाला मंच भी हो सकता है। आगे स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण, बुनियादी ढ़ांचे और सतत विकास में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है।

ब्रिक्स का एजेंडा अब वित्त तक सीमित नहीं है। खाद्य, ऊर्जा और स्वास्थ्य सुरक्षा भी इसकी प्राथमिकताओं में हैं। महामारी ने चिकित्सा आपूर्ति श्रृंखलाओं की कमजोरियां उजागर की जबकि युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों ने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के जोखिम बढ़ाए हैं। महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा, उर्वरक, दवाओं और कृषि तकनीक की विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाने में सहयोग ब्रिक्स को वास्तविक आर्थिक ताकत दे सकता है। प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इसका अगला निर्णायक क्षेत्र है। डिजिटल कृषि, भू-स्थानिक तकनीक और एआई का इस्तेमाल छोटे किसानों की उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में किया जा सकता है। इसी तरह स्टार्टअप, एमएसएमई और डिजिटल कौशल के क्षेत्र में सहयोग उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच नई आर्थिक कड़ियां बना सकता है। लेकिन ब्रिक्स की असली पहचान आर्थिक परियोजनाओं से भी आगे तय होगी। सवाल यह है कि क्या यह पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनेगा? ब्रिक्स की ताकत किसी दूसरे शक्ति-गुट का प्रतिरूप बनने में नहीं, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिक बनाने में है। वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रभावी बनाने का अर्थ पश्चिम से टकराव नहीं, वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक संतुलित भागीदारी सुनिश्चित करना है।

यहीं भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ अपने रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है तो दूसरी ओर रूस, चीन और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ ब्रिक्स में सक्रिय है। यह विरोधाभास नहीं, भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति की वास्तविकता है। ब्रिक्स भारत को चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद का मंच देता है और साथ ही वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ अपनी नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत करने का अवसर भी। इसलिए नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सफलता घोषणापत्र की लंबाई से नहीं, उसके क्रियान्वयन से मापी जानी चाहिए। क्या सीमा-पार भुगतान सस्ता और आसान होगा? क्या व्यापारिक बाधाएं घटेंगी? क्या एमएसएमई को नए बाजार और वित्त मिलेगा? क्या डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना साझा होगी? क्या ऊर्जा, खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए भरोसेमंद तंत्र बनेंगे? और क्या ब्रिक्स वैश्विक वित्तीय एवं राजनीतिक संस्थाओं में सुधार के लिए साझा और प्रभावी आवाज बन सकेगा?

दो दशक पहले ‘ब्रिक’ एक आर्थिक अनुमान था। आज ‘ब्रिक्स’ बदलती विश्व व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है। मगर आर्थिक भार अपने आप सामूहिक शक्ति में नहीं बदलता, उसके लिए संस्थागत क्षमता, आपसी विश्वास, व्यावहारिक सहयोग और साझा हितों की पहचान जरूरी है। इसलिए ब्रिक्स की ‘ब्रिक’ कितनी मजबूत है, इसका उत्तर उसके 11 सदस्यों की संख्या में नहीं, उनके बीच बनने वाली परस्पर निर्भरता में छिपा है। यदि यह समूह व्यापार को आसान बनाता है, विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराता है, तकनीकी समाधान साझा करता है और वैश्विक दक्षिण को निर्णय-निर्माण में अधिक प्रभावी आवाज देता है तो इसकी नींव मजबूत मानी जाएगी। भारत के सामने इस अवसर को आकार देने की बड़ी जिम्मेदारी है। उसे ब्रिक्स को किसी देश या शक्ति के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय विकास, सहयोग और बहुधु्रवीयता का व्यावहारिक मंच बनाना होगा। तब ब्रिक्स केवल 11 देशों की इमारत नहीं रहेगा बल्कि ऐसी विश्व व्यवस्था की आधारशिला बन सकता है, जिसमें वैश्विक दक्षिण दर्शक नहीं, बल्कि निर्णय का सक्रिय भागीदार हो।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)

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Asian Games India Medal Tally LIVE: 44 साल बाद भारत ने मैराथन में जीता मेडल, सावन बरवाल ने रचा इतिहास

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