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खोजी पत्रकारिता, जो पत्रकारिता का आधार स्तंभ रही है, आज कमजोर पड़ती दिख रही है: प्रो. केजी सुरेश

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग द्वारा आयोजित “सोशल मीडिया के युग में पत्रकारिता और जनसंचार में बदलते रुझान” विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन शनिवार को “जनसंचार बनाम सोशल मीडिया” विषय पर एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया।

इस सत्र के मुख्य वक्ता इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. के. जी. सुरेश ने स्वयं को सोशल मीडिया का समर्थक बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने जनसंचार को नई दिशा दी है और मीडिया के लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के कारण ऐसे कई मुद्दे सामने आए हैं जो अब तक मुख्यधारा मीडिया की दृष्टि से ओझल थे। इससे पत्रकारिता में नए आयाम स्थापित हुए हैं।

हालांकि, प्रो. सुरेश ने सोशल मीडिया से जुड़ी चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि रील्स संस्कृति के कारण कंटेंट में सतहीपन बढ़ा है। एक मिनट में सब कुछ देखने की लालसा ने गुणवत्ता से समझौता कराया है। आज कंटेंट क्रिएशन का उद्देश्य केवल यूज़र को कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन पर रोकना बन गया है। उन्होंने चिंता जताई कि आज का युवा वर्ग गंभीर समाचार पत्रों से कटकर रील्स संस्कृति में उलझ गया है, जिससे ट्रिवियलाइजेशन बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि आज पॉडकास्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट की गुणवत्ता से अधिक व्यूज़ और मोनेटाइजेशन पर ध्यान दिया जा रहा है, जिससे पत्रकारिता व्यक्ति-केंद्रित होती जा रही है। विषयों के बजाय व्यक्तियों को महत्व देना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। पत्रकारिता को बचाने के लिए व्यक्तित्व-प्रधान दृष्टिकोण से हटकर मुद्दा-प्रधान पत्रकारिता को पुनः स्थापित करना आवश्यक है।

प्रो. सुरेश ने यह भी कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं में आज भी उत्कृष्ट शोधपरक लेखन हो रहा है, लेकिन पाठकों की संख्या घटती जा रही है। खोजी पत्रकारिता, जो पत्रकारिता का आधार स्तंभ रही है, आज कमजोर पड़ती दिख रही है। डिजिटल मीडिया से यह अपेक्षा थी कि वह हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बनेगा, लेकिन टीआरपी और व्यूज़ आधारित प्रवृत्तियों के कारण कई महत्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के नकारात्मक पहलुओं पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता बताते हुए कहा कि पत्रकारिता को सोशल मीडिया से जोड़ते समय निष्पक्षता और फाइव डब्ल्यू एंड वन एच के सिद्धांतों पर विशेष जोर देना होगा।

सत्र के विशिष्ट वक्ता देश के प्रख्यात वरिष्ठ शिक्षाविद पूर्व कुलपति प्रो. के. वी. नागराज ने अपने वक्तव्य में कहा कि सोशल मीडिया आज मोबोक्रेसी का रूप लेता जा रहा है। उन्होंने कहा कि बड़े कारोबारी और कॉरपोरेट घराने विज्ञापनों के माध्यम से मीडिया को नियंत्रित कर रहे हैं। यूट्यूब पत्रकारिता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें जिम्मेदारी और जवाबदेही का अभाव है।

प्रो. नागराज ने कहा कि विकास के नाम पर समाज को पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। तकनीक आज एक राक्षस बनती जा रही है, जिसे नियंत्रित करने के बजाय हम उसे स्वयं पर शासन करने दे रहे हैं। उन्होंने महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा- “समाज से जो श्रेष्ठ है, उसे निकालिए; विचारधारा अत्यंत आवश्यक है।” उनके अनुसार, बिना विचारधारा के संचार का कोई अर्थ नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया हमें एक प्रकार के कोकून में बंद कर रहा है, जहां सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप कम होता जा रहा है। शक्ति और असमानता के संबंध पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जहां शक्ति है, वहां समानता नहीं हो सकती। उन्होंने माना कि मीडिया में सकारात्मक और नकारात्मक- दोनों पहलू मौजूद हैं, लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्व और जवाबदेही के बिना पत्रकारिता अपने उद्देश्य से भटक जाती है।

पैनल चर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि प्रिंट मीडिया आज भी अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है और समाज को दिशा देने में इसकी भूमिका सर्वोपरि बनी हुई है। संगोष्ठी से सार्थक निष्कर्ष निकलने की आशा व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने पत्रकारिता के मूल्यों की पुनर्स्थापना पर बल दिया।

अमेरिका, रूस, नेपाल, बांग्लादेश और मलेशिया के विषय विशेषज्ञों के वक्तव्य, कुल 180 शोध पत्रों का वाचन :-

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “सोशल मीडिया के युग में पत्रकारिता और जनसंचार में बदलते रुझान” के दौरान विभिन्न देशों से आए विषय विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में कुल 180 शोध पत्रों का वाचन किया गया, जिनमें डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया और समकालीन पत्रकारिता से जुड़े विविध पहलुओं पर गंभीर विमर्श हुआ।

अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं के सत्र में बॉयसी यूनिवर्सिटी, अमेरिका की डॉ. इरीना बाबिक ने कहा कि डिजिटल मीडिया ने संचार को अधिक सहभागी और त्वरित बनाया है, किंतु विश्वसनीयता और तथ्यात्मकता बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। उन्होंने मीडिया साक्षरता को समय की अनिवार्य आवश्यकता बताया।

लोमोनोसोव मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी, रूस की डॉ. अन्ना ग्लैडकोवा ने कहा कि सोशल मीडिया ने वैश्विक संवाद को नई गति प्रदान की है, लेकिन एल्गोरिद्म आधारित कंटेंट के कारण समाज में ध्रुवीकरण भी बढ़ रहा है। उन्होंने संतुलित और जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पर बल दिया।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू (नेपाल) के डॉ. कुंदन आर्याल ने कहा कि विकासशील देशों में सोशल मीडिया ने जनभागीदारी को बढ़ावा दिया है, परंतु नैतिक पत्रकारिता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अभाव में यह माध्यम भ्रामक सूचनाओं का कारण भी बन सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ लिबरल आर्ट्स, बांग्लादेश के प्रो-वाइस चांसलर डॉ. जूड विलियम जेनिलो ने कहा कि संचार का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज में संवेदनशीलता और समावेशिता का विकास करना भी है। उन्होंने अकादमिक शोध और मीडिया व्यवहार के बीच मजबूत सेतु बनाने पर जोर दिया।

मलेशियन यूनिवर्सिटी की डॉ. शैरन विल्सन ने कहा कि डिजिटल युग में पत्रकारिता के स्वरूप में तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है। उन्होंने तकनीक के साथ तालमेल रखते हुए मानवीय मूल्यों और सत्यनिष्ठा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के इन सत्रों में प्रस्तुत विचारों ने पत्रकारिता और जनसंचार के भविष्य को लेकर सार्थक चिंतन को नई दिशा प्रदान की।

पैनल चर्चा में उपस्थित वक्ताओं और अतिथियों का स्वागत और सम्मान विभागाध्यक्ष डॉ ज्ञानप्रकाश मिश्र ने अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ व स्मृति चिह्न भेंट कर किया। सत्र की अध्यक्षता कम्युनिकेशन टुडे के संपादक संजीव भानावत ने किया। संचालन सेमिनार के आयोजक सचिव डॉ बाला लखेंद्र ने किया।

इस दौरान प्रमुख रूप से प्रोफेसर ओपी सिंह, प्रोफेसर अंबरीश सक्सेना, प्रोफेसर अनिल उपाध्याय, डॉ रउमाशंकर पांडेय, डॉ शोभना नेरलीकर, डॉ नेहा पांडेय, डॉ धीरेंद्र राय, डॉ संतोष शाह, डॉ स्मिति पाढ़ी सहित सभी प्रतिभागी उपस्थित रहे।

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Al-Falah University का आतंकी कनेक्शन! ED का खुलासा- Red Fort ब्लास्ट के आरोपी को दी नौकरी

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अल-फलाह विश्वविद्यालय के अध्यक्ष और कुलाधिपति जवाद अहमद सिद्दीकी को एक व्यापक आरोपपत्र में मुख्य आरोपी बनाया है, जिसमें एक बड़े नियामक और मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले का आरोप लगाया गया है - जिसमें लाल किला विस्फोट मामले के एक प्रमुख आरोपी को अनिवार्य सत्यापन के बिना विश्वविद्यालय के पद पर नियुक्त करना शामिल है। पिछले साल नवंबर में आतंकी मॉड्यूल के खात्मे के बाद अल-फलाह विश्वविद्यालय जांच के दायरे में आ गया था। दिल्ली बम धमाके के सिलसिले में विश्वविद्यालय से जुड़े चार डॉक्टरों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे, जबकि कई अन्य लोगों से पूछताछ कर उन्हें गिरफ्तार किया गया था। विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, जवाद अहमद सिद्दीकी को भी मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार किया गया था और धमाके से उनके संबंध की भी जांच चल रही थी।

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अभियोजन पक्ष की शिकायत के अनुसार, ईडी का दावा है कि उसने एक विस्तृत योजना का पर्दाफाश किया है जिसमें विश्वविद्यालय और उसके मेडिकल कॉलेज कथित तौर पर फर्जी नियमों का पालन कर रहे थे। कथित उल्लंघनों में फर्जी डॉक्टर और फर्जी मरीज, जाली दस्तावेज और विदेशों में धन का हस्तांतरण शामिल हैं। जांचकर्ताओं का आरोप है कि सिद्दीकी नियुक्तियों, वित्त और नियामकों के साथ व्यवहार पर प्रत्यक्ष और केंद्रीकृत नियंत्रण रखते थे। ईडी सूत्रों का आरोप है कि अल-फलाह विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के मानदंडों को पूरा करने के लिए दर्जनों डॉक्टरों को केवल कागजों पर पूर्णकालिक संकाय सदस्य के रूप में सूचीबद्ध किया था। जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों से पता चलता है कि इनमें से कई संकाय सदस्यों ने कभी भी परिसर में अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभाईं।

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