सावधान! वनों की कटाई से बढ़ा महामारी का खतरा, जंगली मच्छर फैला सकते हैं खतरनाक रोग
ब्राजील के समुद्री तट के साथ फैला अटलांटिक फॉरेस्ट कभी पक्षियों, एंफीबियंस, रेपटाइल्स और मछलियों की सैकड़ों प्रजातियों का घर था. लेकिन मानव विकास और वनों की कटाई ने इसे इसकी मूल संरचना के लगभग एक तिहाई तक सीमित कर दिया है. जैसे जैसे इंसान पहले से सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं, वहां का पारिस्थितिकी संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है.
स्टडी क्या कहती है?
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल Frontiers in Ecology and Evolution में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और Oswaldo Cruz Institute के जीवविज्ञानी डॉ. जेरोनिमो एलेंकार के अनुसार, अटलांटिक फॉरेस्ट के अवशेष क्षेत्रों में पकड़े गए मच्छरों ने इंसानों से खून लेने की स्पष्ट प्राथमिकता दिखाई.
मच्छरों के भोजन का पता कैसे लगाया गया?
शोधकर्ताओं ने रियो डी जेनेरियो राज्य के दो संरक्षित क्षेत्रों में लाइट ट्रैप लगाए. इनमें सिटियो रेकांटो प्रेजर्वार और ग्वापियाकू नदी पारिस्थितिक रिजर्व शामिल थे. हाल ही में खून पी चुकी मादा मच्छरों को अलग कर प्रयोगशाला में उनके पेट में मौजूद रक्त से डीएनए निकाला गया. एक विशेष जीन की मदद से यह पहचाना गया कि मच्छरों ने किस प्रजाति को काटा था.
इंसान बने प्रमुख रक्त स्रोत
कुल 1,714 मच्छर 52 प्रजातियों से एकत्र किए गए. इनमें से 145 मादा मच्छरों में रक्त पाया गया. केवल 24 मामलों में रक्त स्रोत की पहचान हो सकी, जिनमें 18 इंसान थे. इसके अलावा कुछ पक्षी, एक उभयचर, एक कैनिड और एक चूहा भी शामिल था. कुछ मच्छरों में मिश्रित भोजन पाया गया, यानी उन्होंने एक से अधिक प्रजातियों को काटा था.
रोग फैलने का बढ़ता खतरा
अध्ययन के सह लेखक और Federal University of Rio de Janeiro के शोधकर्ता डॉ. सर्जियो मचाडो का कहना है कि इतने विविध पारिस्थितिक तंत्र में इंसानों को प्राथमिकता देना रोग संचरण के जोखिम को काफी बढ़ा देता है. इस क्षेत्र में मच्छर पीत ज्वर, डेंगू, जीका, मायारो और चिकनगुनिया जैसे वायरस फैला सकते हैं.
भविष्य की चेतावनी
वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे जैसे प्राकृतिक मेज़बान कम होते जाएंगे, मच्छर इंसानों पर और अधिक निर्भर होंगे. यह स्थिति वन किनारे रहने वाले समुदायों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है. शोधकर्ताओं के अनुसार, मच्छरों की भोजन आदतों को समझना निगरानी, रोकथाम और दीर्घकालिक नियंत्रण रणनीतियों के लिए बेहद जरूरी है.
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जब एक जनरल ने सत्ता को चेताया! आइजनहावर का विदाई भाषण और ‘मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ का सच
नई दिल्ली, 17 जनवरी (आईएएनएस)। अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने जब राष्ट्र के नाम अपना विदाई भाषण दिया, तब बहुत कम लोगों को अंदाजा था कि यह भाषण आने वाले दशकों की अमेरिकी और वैश्विक राजनीति को समझने की एक कुंजी बन जाएगा। एक ऐसे समय में, जब शीत युद्ध अपने चरम पर था और सैन्य शक्ति को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना जा रहा था, आइजनहावर ने जनता को एक असहज लेकिन जरूरी सच से रूबरू कराया।
17 जनवरी 1961 को अपने संबोधन के जरिए उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका में सेना, हथियार उद्योग और राजनीतिक सत्ता के बीच एक ऐसा गठजोड़ उभर चुका है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकता है। इसी चेतावनी को उन्होंने “मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स” नाम दिया।
इस ऐतिहासिक क्षण की गहराई को इतिहासकार जेम्स लेडबेटर अपनी पुस्तक अनवॉरेंटेड इंफ्लुएंस: ड्वाइट डी. आइजनहावर एंड द मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स में विस्तार से समझाते हैं। यह किताब बताती है कि आइजनहावर की चेतावनी अचानक नहीं थी, बल्कि उनके लंबे सैन्य और राजनीतिक अनुभव का निचोड़ थी। द्वितीय विश्व युद्ध के नायक और पांच-सितारा जनरल रहे आइजनहावर भली-भांति जानते थे कि सैन्य शक्ति कितनी आवश्यक है, लेकिन यह भी समझते थे कि जब वही शक्ति व्यापार और राजनीति से जुड़ जाए, तो उसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं।
अपने विदाई भाषण में आइजनहावर ने कहा कि युद्ध के बाद अमेरिका में एक स्थायी हथियार उद्योग खड़ा हो गया है। पहले युद्ध खत्म होने के साथ सेनाएं और उत्पादन कम हो जाते थे, लेकिन अब हथियारों का निर्माण एक निरंतर व्यवसाय बन चुका था। लेडबेटर के अनुसार, आइजनहावर को डर था कि रक्षा कंपनियां अपने आर्थिक हितों के लिए सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं और देश को ऐसे संघर्षों में धकेल सकती हैं, जिनकी वास्तविक आवश्यकता न हो।
यह चेतावनी इसलिए भी असाधारण थी क्योंकि यह किसी शांतिवादी या विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि अमेरिका के सर्वोच्च सैन्य अनुभव वाले राष्ट्रपति ने दी थी। आइजनहावर ने साफ कहा कि लोकतंत्र तभी सुरक्षित रह सकता है, जब जागरूक नागरिक, स्वतंत्र प्रेस और जिम्मेदार संसद इस शक्ति संतुलन पर निगरानी रखें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास पर सरकारी नियंत्रण कमजोर पड़ सकता है, यदि वह केवल सैन्य हितों के अधीन हो जाए।
अनवॉरेंटेड इंफ्लूएंस ये भी बताता है कि उस समय इस भाषण को जितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए था, उतनी नहीं ली गई। इसके बाद के वर्षों में वियतनाम युद्ध, हथियारों की दौड़ और वैश्विक सैन्य हस्तक्षेपों ने आइजनहावर की आशंकाओं को और अधिक प्रासंगिक बना दिया। आज, जब रक्षा उद्योग, टेक्नोलॉजी और राजनीति का रिश्ता पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका है, आइजनहावर का यह भाषण इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी जैसा प्रतीत होता है।
--आईएएनएस
केआर/
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