Greenland पर Donald Trump के रुख से डेनमार्क और अमेरिका में बढ़ा तनाव
नाटो के सहयोगी डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र, ग्रीनलैंड पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी के बारे में पहली बार 2019 में सार्वजनिक रूप से पता चला। यहां उन घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा है जिनके कारण वॉशिंगटन और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच संकट पैदा हुआ। अगस्त, 2019 : अपने पहले कार्यकाल के दौरान, ट्रंप ने अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड खरीदने में दिलचस्पी दिखाई, लेकिन कहा कि यह ‘‘अभी प्राथमिकता वाली बात नहीं है।’’ डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने इसे ‘‘बेतुकी चर्चा’’ कहकर खारिज कर दिया।
इसके बाद ट्रंप ने कहा कि उन्होंने डेनमार्क की अपनी यात्रा रद्द कर दी क्योंकि फ्रेडरिकसेन ने उनके विचार को खारिज करते हुए ‘‘भद्दा’’ बयान दिया था। 22 दिसंबर, 2024: अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से कुछ सप्ताह पहले निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड में फिर रुचि दिखाई और कहा कि ‘‘ग्रीनलैंड का स्वामित्व और नियंत्रण अमेरिका के लिए बेहद जरूरी है।’’ ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री म्यूट बोरोप एगेडे ने कहा कि ‘‘हम बिक्री के लिए नहीं हैं और कभी बिक्री के लिए नहीं होंगे।’’ 7 जनवरी, 2025: ट्रंप के बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने ग्रीनलैंड का दौरा किया। निर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण हासिल करने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की संभावना से वह इनकार नहीं करेंगे।
11 मार्च, 2025: ग्रीनलैंड में नए संसद चुनाव हुए, जिसमें जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन की डेमोक्राटिट पार्टी को जीत मिली। इसके बाद संसद की सभी पांच पार्टियों ने अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की बात का विरोध किया। 27 मार्च, 2025: ग्रीनलैंड की संसद की पांच में से चार पार्टियों ने नीलसन के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनाने पर सहमति जताई।
28 मार्च, 2025: अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने उत्तर-पश्चिमी ग्रीनलैंड स्थित अमेरिकी पिटुफिक अंतरिक्ष अड्डे का दौरा किया और आरोप लगाया कि डेनमार्क द्वीप की सुरक्षा में पर्याप्त निवेश नहीं कर रहा है। 29 मार्च, 2025: डेनमार्क के विदेश मंत्री ने अमेरिका की आलोचना के लहजे पर आपत्ति जताई। ट्रंप ने कहा कि वह ‘‘सैन्य बल के विकल्प को कभी खत्म नहीं करते।’’ 27 अगस्त, 2025: डेनमार्क के विदेश मंत्रालय ने कोपेनहेगन में अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब किया।
यह कदम एक डेनिश प्रसारक की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया, जिसमें ट्रंप से जुड़े कम से कम तीन लोगों पर ग्रीनलैंड में गुप्त प्रभाव अभियान चलाने का आरोप लगाया गया था। 21 दिसंबर, 2025: ट्रंप ने लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए अमेरिकी विशेष दूत नियुक्त करने की घोषणा की। लैंड्री ने कहा कि ‘‘ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने’’ के लिए काम करना सम्मान की बात होगी।
22 दिसंबर, 2025: डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा नहीं करेगा। डेनमार्क विदेश मंत्री ने अमेरिकी राजदूत को तलब करने की बात कही। 4 जनवरी, 2026: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका द्वारा हटाए जाने के बाद ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की चर्चा फिर तेज हुई।
5 जनवरी, 2026: डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी सैन्य कब्जा नाटो के अंत के समान होगा। 6 जनवरी, 2026: यूरोप के प्रमुख नेताओं ने फ्रेडरिक्सन के साथ मिलकर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन किया। व्हाइट हाउस ने कहा कि ट्रंप के लिए ‘‘अमेरिकी सेना का इस्तेमाल हमेशा एक विकल्प है।’’ 8 जनवरी, 2026: ट्रंप ने एक साक्षात्कार में कहा कि वह, अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे रखने की व्यापक अनुमति देने वाली उस संधि का केवल इस्तेमाल नहीं करना चाहते, बल्कि वह पूरे ग्रीनलैंड पर अधिकार चाहते हैं।
13 जनवरी, 2026: ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री नीलसन ने कहा कि अगर अमेरिका और डेनमार्क में से किसी एक को चुनना पड़ा तो ग्रीनलैंड ‘‘अभी डेनमार्क को चुनेगा।’’ 14 जनवरी, 2026: डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्रियों ने वाशिंगटन में जे डी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुलाकात की। दोनों पक्ष एक कार्य समूह बनाने पर सहमत हुए, लेकिन इसके उद्देश्य को लेकर डेनमार्क और व्हाइट हाउस के बयानों में अंतर रहा। डेनमार्क ने आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की योजना घोषित की और कुछ यूरोपीय सहयोगियों ने सुरक्षा आकलन के लिए ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने की बात कही।
16 जनवरी, 2026: ट्रंप ने कहा कि जो देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण का समर्थन नहीं करेंगे, उन पर शुल्क लगाया जा सकता है। 17 जनवरी, 2026: ट्रंप ने ग्रीनलैंड मुद्दे पर अमेरिका का विरोध करने वाले आठ यूरोपीय देशों पर फरवरी से 10 प्रतिशत शुल्क लगाने की घोषणा की। 21 जनवरी, 2026: यूरोपीय देशों पर लगाए जाने वाले प्रस्तावित शुल्क को ट्रंप ने वापस ले लिया।
उन्होंने कहा कि नाटो महासचिव मार्क रूटे के साथ आर्कटिक सुरक्षा पर ‘‘भविष्य के समझौते की रूपरेखा’’ पर सहमति बनी है। 28 जनवरी, 2026: अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच आर्कटिक सुरक्षा समझौते को लेकर तकनीकी बातचीत शुरू हुई। 21 फरवरी, 2026: ट्रंप ने कहा कि वह ग्रीनलैंड में एक अस्पताल जहाज भेजेंगे।
उन्होंने दावा किया कि वहां कई लोग बीमार हैं और उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा नहीं मिल रही है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री नीलसन ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज किया- ‘‘नहीं धन्यवाद।’’ 7 जुलाई, 2026: नाटो शिखर सम्मेलन से पहले ट्रंप ने फिर कहा कि ग्रीनलैंड ‘‘डेनमार्क के बजाय अमेरिका के नियंत्रण में होना चाहिए।’’ फ्रेडरिक्सन ने दोहराया कि ग्रीनलैंड ‘‘बिक्री के लिए नहीं है’’ और कहा कि हमला होने की स्थिति में डेनमार्क नाटो क्षेत्र के हर हिस्से की रक्षा करेगा। 18 सितंबर, 2026: ट्रंप ने घोषणा की कि ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी मजबूत करने के लिए एक समझौता हुआ है।
डेनमार्क के अधिकारियों ने इस पर सतर्क आशावाद जताया। फ्रेडरिक्सन ने कहा कि प्रस्तावित समझौता डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है।
UN में ऐसा गरजे जयशंकर, मनमर्जी करने वाले देशों को दे डाली चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन के सबसे बड़े मंच से भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर दुनिया की तथाकथित महाशक्तियों को सीधा और कड़ा आईना दिखाया है। न्यूयॉर्क में चल रहे 81वें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान आयोजित पार्टनर्स फॉर मल्टीलटरलिज्म समिट में दुनिया भर के दर्जनों देशों के शीर्ष राजनयिक और वैश्विक नेता मौजूद थे। इस उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन को भारत ने खुद सह प्रायोजित किया था। इस मंच से जयशंकर ने साफ कर दिया कि दुनिया आज जिस दौराहे पर खड़ी है, वहां खोखली बयानबाजी नहीं बल्कि ठोस फैसलों की दरकार है। डॉक्टर जयशंकर ने अपने संबोधन की शुरुआत में ही वैश्विक व्यवस्था के संकट को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया दशकों से एक स्वाभाविक रिबैलेंसिंग की तरफ बढ़ रही थी। लेकिन बड़े देशों के बीच की अंधी प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव और प्रत्यक्ष युद्धों ने हालात को बेहद खतरनाक बना दिया है। जयशंकर ने दो टूक चेतावनी दी कि यदि इस बेलगाम टकराव को तुरंत नहीं रोका गया तो दशकों से बनी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
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जयशंकर ने विश्व नेताओं के सामने उन वास्तविक समस्याओं को रखा जो आज आम जनता की जिंदगी को प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने दुनिया के सामने खड़े चार एफ क्राइसिस पर कड़ा रुख अपनाया। इसमें फ्यूल यानी ईंधन, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और तेल संकट से जुड़ी समस्या है। फ़ूड यानी खाद्य सुरक्षा, युद्ध और प्रतिबंधों के चलते भुखमरी और अनाज की कमी से जुड़ा मुद्दा है। फर्टिलाइजर यानी उर्वरक खाद की किल्लत से जुड़ी समस्या है। जिससे गरीब देशों की खेती प्रभावित हो रही है और फाइनेंस यानी वित्त विकासशील देशों पर बढ़ते कर्ज और फंडिंग की कमी से जुड़ा संकट है। जयशंकर ने स्पष्ट कहा कि यह चार एफ संकट अपने आप ठीक नहीं होगा। इसके लिए दुनिया की बड़ी ताकतों को स्वार्थ से ऊपर उठकर जिम्मेदारी लेनी होगी। इतना ही नहीं विदेश मंत्री ने सप्लाई चेन के एकाधिकार और व्यापारिक ब्लैकमेलिंग के खतरे पर भी सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जहां भी सप्लाई चेन में रुकावट डालने या किसी एक देश के दबदबे का खतरा हो वहां दुनिया को डीरिस्किंग यानी जोखिम कम करने और डायवर्सिफाइंग यानी सप्लाई चेन में नए विकल्प तलाशने और उसका विविधकरण करने पर जोर देना होगा। इसके साथ ही उन्होंने नई तकनीकों जैसे एआई और साइबर स्पेस के लिए कड़े नियम और गार्ड रेल्स बनाने की भी वकालत की ताकि इन तकनीकों का दुरुपयोग ना हो सके।
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एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की कार्यशैली में सुधार की जरूरत पर भी जोर देते हुए रिफॉर्मड मल्टीलटरलिज्म यानी सुधारवादी बहुपक्षवाद की मांग को दोहराया। उन्होंने ज्यादा भागीदारी और पारदर्शी तरीके से फैसले लेने की जरूरत बताई ताकि वैश्विक संस्थाएं आज की बदलती दुनिया की चुनौतियों का ज्यादा प्रभावी ढंग से सामना कर सकें। उन्होंने कहा कि बंद कमरों में लिए जाने वाले फैसले अब नहीं चलेंगे। जब तक सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों और कानूनों का पूरी ईमानदारी से पालन नहीं होगा और निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी व समावेशी नहीं होगी तब तक संयुक्त राष्ट्र की साख बहाल नहीं हो सकती। सैकड़ों देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में डॉ. एस जयशंकर का यह कड़ा संदेश साबित करता है कि भारत अब केवल श्रोता नहीं है बल्कि दुनिया की दिशा तय करने वाला एक निडर और स्पष्ट नेतृत्वकर्ता बनकर उभर चुका है।
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