SGPC ने आतिशी की सिख गुरुओं के लिए टिप्पणियों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने हाल ही में दिल्ली विधानसभा के समाप्त हुए शीतकालीन सत्र में आम आदमी पार्टी (आप) की नेता आतिशी द्वारा सिख गुरुओं के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी की शुक्रवार को एक प्रस्ताव पारित कर निंदा की है।
अधिकारियों ने बताया कि एसजीपीसी की कार्यसमिति की बैठक की अध्यक्षता इसके अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने की। इस बैठक में दिल्ली विधानसभा में विपक्ष की नेता आतिशी द्वारा कथित तौर पर की गई अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया और आम आदमी पार्टी की वरिष्ठ नेता के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू करने का निर्णय लिया गया।
पिछले साल गुरु तेग बहादुर के 350वें शहादत दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर छह जनवरी को दिल्ली विधानसभा सत्र में चर्चा के बाद आतिशी द्वारा सिख गुरुओं के प्रति कथित तौर पर अनादर का मुद्दा एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील हो गया है, जिसमें दिल्ली में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और पंजाब में आम आदमी पार्टी शामिल हैं।
धामी ने कहा, “दिल्ली विधानसभा में एक निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा सिख गुरुओं के बारे में अपमानजनक का प्रयोग सिख भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। आम आदमी पार्टी के नेता के इस निंदनीय रवैये के लिए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पीठासीन अधिकारी लोगों की आवाज के अंतिम संरक्षक होते हैं: Radhakrishnan
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि विचारों की विविधता के बीच शालीनता और गरिमा के साथ बहस, संवाद और चर्चा को सुगम बनाना विश्वभर की विधायिकाओं के पीठासीन अधिकारियों की साझा और प्राथमिक जिम्मेदारी है।
राधाकृष्णन ने राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के 28वें सम्मेलन के इतर यहां उनके सम्मान में भोज का आयोजन किया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक संविधान सदन (पुराना संसद भवन) साढ़े सात दशकों से अधिक समय से भारत के जीवंत और समृद्ध संसदीय लोकतंत्र का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन राष्ट्रमंडल लोकतंत्रों को एकजुट करने वाले सामूहिक सद्भाव और साझा उद्देश्य की भावना को दर्शाता है। उन्होंने भारत की सभ्यतागत विचारधारा से प्रेरित संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान द्वारा एक साथ आगे बढ़ने के महत्व पर जोर दिया।
संसदीय अध्यक्षों और पीठासीन संवैधानिक अधिकारियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने विचारों की विविधता के बीच शालीनता और गरिमा के साथ बहस, संवाद और चर्चा को सुगम बनाने की साझा और प्राथमिक जिम्मेदारी पर जोर दिया।
राज्यसभा के सभापति ने कहा कि राष्ट्रमंडल देशों की भौगोलिक स्थिति, संस्कृति और ऐतिहासिक अनुभव भिन्न हैं, फिर भी वे समान संसदीय लोकाचार और लोकतांत्रिक सिद्धांतों एवं मूल्यों के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता से बंधे हैं।
उन्होंने कहा कि पीठासीन अधिकारी विधायिका की गरिमा और लोगों की आकांक्षापूर्ण आवाज के अंतिम संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं, जिन्हें लोकतंत्र के पवित्र सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यवस्थित आचरण के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाये रखने का दायित्व सौंपा गया है।
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