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Hindi Diwas 2026: विश्व में हिन्दी का बढ़ता प्रभाव

वर्तमान में हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्व के कई देशों में अपना परचम स्थापित कर रही है। यह हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय होने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आज भारतीय मूल के व्यक्ति हिंदी के विस्तार में अभूतपूर्व योगदान दे रहे हैं। इतना ही नहीं अमेरिका, चीन सहित विश्व के लगभग 11 देशों में हिन्दी के समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि हिंदी भारतीय संस्कृति, संवेदना और आत्मीयता का वैश्विक स्वर बनती जा रही है। यह भाषा भारत की मिट्टी से जन्म लेकर आज विश्व के अनेक देशों में संवाद, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बन रही है। हिन्दी की यह यात्रा केवल शब्दों के विस्तार की यात्रा नहीं है, यह भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है, जिसने सदियों से सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दिया है।
 
हिन्दी की शक्ति उसके विशाल शब्द भंडार और उसकी आत्मीयता में भी है। यह भाषा सहजता से लोगों को जोड़ती है। भारत से बाहर बसे भारतीय समुदायों ने हिन्दी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, गुयाना तथा दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में भारतीय मूल के लोगों ने हिन्दी के सांस्कृतिक प्रकाश को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया है।

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मॉरीशस हिन्दी की वैश्विक यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। वहाँ हिन्दी का अध्ययन विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में होता है। साहित्यिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आयोजनों और भारतीय परंपराओं से जुड़े कार्यक्रमों में हिन्दी का विशेष स्थान दिखाई देता है। मॉरीशस में हिन्दी का विस्तार यह प्रमाणित करता है कि भाषा भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकलकर भावनाओं और संस्कारों की जीवंत धारा है। फिजी में हिन्दी का एक विशिष्ट रूप ‘फिजियन हिन्दी’ के रूप में विकसित हुआ है। भारतीय मूल के लोगों के बीच यह संवाद और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम बनी। यह हिन्दी की उस विशेष क्षमता को दर्शाती है, जिसमें वह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में पहुँचकर स्थानीय परिवेश के साथ संवाद करते हुए अपना नया स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सूरीनाम, गुयाना तथा त्रिनिदाद और टोबैगो में भी भारतीय मूल के समुदायों ने हिन्दी को धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराओं के साथ जोड़े रखा। इन देशों में हिन्दी का महत्व भारतीय विरासत की स्मृति के रूप में भी है। भजन, रामायण-पाठ, सांस्कृतिक आयोजन और भारतीय पर्व हिन्दी को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आज के समय में हिन्दी का प्रभाव भारतीय मूल के समुदाय से बाहर निकल रहा है, की आबादी तक सीमित नहीं है। आज यह अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में हिन्दी सीखने और समझने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। भारतीय सिनेमा, टेलीविजन, डिजिटल माध्यम, संगीत और सोशल मीडिया ने हिन्दी को वैश्विक स्तर पर नई दृश्यता प्रदान की है। आज भारत से जुड़ने की इच्छा रखने वाला विश्व का युवा वर्ग हिन्दी के शब्दों और अभिव्यक्तियों से परिचित हो रहा है।

विश्व के देशों में हिन्दी के प्रकाशन लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। जिनमें फिजी में शांतिदूत हिन्दी साप्ताहिक, मॉरीशस में आर्योदय, वसंत, इंद्रधनुष आदि, यहाँ हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास 1909 से मिलता है। इसी प्रकार अमेरिका में हिन्दी जगत, कर्मभूमि, नवरंग टाइम्स, भारत समाचार, नमस्ते यूएसए, सेतु, विश्वा आदि हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख मिलता है। कनाडा में सरस्वती पत्र सहित हिन्दी के साहित्यिक, सांस्कृतिक प्रकाशन हो रहे हैं। ब्रिटेन में पुरवाई, न्यूज़ीलैंड में भारत-दर्शन, ऑस्ट्रेलिया में ऑस्ट्रेलियांचल सहित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, संयुक्त अरब अमीरात में अभिव्यक्ति, अनुभूति आदि, नेपाल में तरंग को पहला हिन्दी साप्ताहिक और जय नेपाल को पहला हिन्दी दैनिक बताया गया है। 

आज के डिजिटल युग ने हिन्दी के विस्तार को अभूतपूर्व गति दी है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने भाषा की भौगोलिक सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। हिन्दी में समाचार, साहित्य, शिक्षा, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान और सामाजिक संवाद की सामग्री बड़ी मात्रा में उपलब्ध है। सोशल मीडिया के माध्यम से हिन्दी लिखने और पढ़ने वालों का नया वर्ग सामने आया है। हिन्दी अब केवल मुद्रित पृष्ठों की भाषा न होकर मोबाइल स्क्रीन, डिजिटल मंच और वैश्विक संवाद का भी प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। हिन्दी के वैश्विक विस्तार में भारतीय साहित्य की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और हरिवंश राय बच्चन जैसे रचनाकारों ने हिन्दी को ऐसी साहित्यिक ऊँचाई प्रदान की, जिसने भाषा को मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति बना दिया। हिन्दी साहित्य में जीवन, प्रकृति, परिवार, संघर्ष, आध्यात्मिकता और मानवता के विविध रंग मिलते हैं। यही व्यापकता हिन्दी को विश्व के पाठकों से जोड़ने की क्षमता प्रदान करती है। हिन्दी की वैश्विक प्रतिष्ठा में विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसी संस्थागत पहल का भी विशेष योगदान है। ऐसे मंच हिन्दी के विद्वानों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों को एक साथ लाते हैं। इससे हिन्दी के अध्ययन, अध्यापन, साहित्य और अंतरराष्ट्रीय विस्तार पर गंभीर विमर्श को गति मिलती है।

आज आवश्यकता हिन्दी को केवल भावनाओं की भाषा मानने की नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, व्यापार और वैश्विक संवाद की समर्थ भाषा के रूप में विकसित करने की है। नई तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुवाद प्रणाली और डिजिटल शिक्षा हिन्दी के लिए नए अवसर लेकर आए हैं। यदि इन क्षेत्रों में हिन्दी की शब्दावली, तकनीकी सामग्री और उच्च स्तरीय शिक्षण संसाधनों का निरंतर विस्तार किया जाए तो हिन्दी की वैश्विक उपयोगिता और बढ़ सकती है।

हिन्दी का भविष्य उसके बोलने वालों की संख्या से अधिक उसकी उपयोगिता और गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। दुनिया में अनेक भाषाएँ अपनी विशिष्ट पहचान के साथ आगे बढ़ रही हैं। हिन्दी भी अपनी वैज्ञानिक क्षमता, साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक शक्ति के आधार पर विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान और अधिक सुदृढ़ कर सकती है। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका भी हिन्दी के लिए नए द्वार खोल रही है। आज विश्व भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति, तकनीक, लोकतंत्र और शांति की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देख रहा है। ऐसे समय में हिन्दी भारत की आवाज को दुनिया तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन सकती है।

हिन्दी का वैश्विक विस्तार भाषायी सह अस्तित्व और सांस्कृतिक संवाद का विषय है। भारत की परंपरा सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान करती है। हिन्दी इसी भावना के साथ विश्व की भाषाओं के बीच अपना स्थान बना सकती है। आज हिन्दी भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर अनेक महाद्वीपों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। आने वाला समय हिन्दी के लिए और अधिक संभावनाओं से भरा है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम हिन्दी को गर्व के साथ अपनाएँ, उसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ें और दुनिया के साथ संवाद की भाषा बनाएँ। हिन्दी भारत की आवाज है, भारतीय संस्कृति की संवेदना है और विश्व के साथ भारत के आत्मीय संवाद का एक सशक्त माध्यम है। जिस भाषा में करोड़ों लोगों के सपने, संवेदनाएँ और जीवन की धड़कनें व्यक्त होती हैं, उसका वैश्विक आकाश निश्चित रूप से और विस्तृत होगा।

- डॉ. वन्दना सेन
(लेखिका भारतीय भाषा मंच, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की प्रान्त संयोजक हैं)

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मौत का इंतजार करती इमारतें और गहरी नींद सोता प्रशासन

दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में जो हृदयविदारक घटना घटित हुई है, वह केवल एक पांच मंजिला इमारत के भरभराकर गिरने की घटना नहीं बल्कि राजधानी की उस व्यवस्था का ढ़हना है, जिसकी नींव नागरिकों की सुरक्षा, कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी होनी चाहिए थी। जिस इमारत में कुछ घंटे पहले तक देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवा अपने भविष्य के सपने बुन रहे थे, देखते ही देखते वह ईंट, सीमेंट और लोहे के मलबे में बदल गई। धूल का गुबार तो छंट जाएगा, मलबा भी हट जाएगा, सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी लेकिन उन परिवारों के जीवन में जो शून्य पैदा हुआ है, वह कभी नहीं भर सकेगा। ‘हॉस्टल डेज’ नामक लड़कों के लिए बने पीजी की इस पांच मंजिला इमारत में हादसे के वक्त कई छात्र अपने कमरों में थे, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है। बताया जा रहा है कि इमारत लगभग 40-50 वर्ष पुरानी थी और हादसे के समय बेसमेंट में मरम्मत तथा खुदाई का काम चल रहा था। यही तथ्य इस त्रासदी को और भयावह बना देता है।

सवाल केवल यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी बल्कि असली सवाल यह है कि इतनी पुरानी और संवेदनशील इमारत में बेसमेंट की खुदाई और निर्माण संबंधी गतिविधियां आखिर चल कैसे रही थी? हर बड़े भवन हादसे के बाद एक ही कहानी दोहराई जाती है। प्रशासन कहता है कि जांच होगी, कुछ छोटे अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद पूरा मामला फाइलों के नीचे दब जाता है। फिर किसी दूसरे इलाके में कोई और इमारत गिरती है, कहीं आग लगती है, कोई बेसमेंट मौत का कुआं बन जाता है और हम फिर वही प्रश्न पूछते रह जाते हैं कि आखिर जिम्मेदार कौन है? सच तो यह है कि भारत के शहरों में कोई बहुमंजिला अवैध निर्माण रातों-रात खड़ा नहीं होता। जमीन का उपयोग बदलता है, नक्शा बनता है, निर्माण शुरू होता है, मंजिलें बढ़ती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन मिलते हैं और अंततः उस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक विभागों और अधिकारियों की भूमिका होती है। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन को कुछ पता ही नहीं था, जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान बहाना है।

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यदि कोई इमारत नियमों के विरुद्ध बन रही थी तो निर्माण के दौरान संबंधित नगर निगम अधिकारी कहां थे? यदि वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थी तो फायर विभाग ने सुरक्षा का आकलन क्यों नहीं किया? बिजली और पानी के कनेक्शन किस आधार पर मिले? पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नजर उस भवन पर क्यों नहीं पड़ी? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था तो फिर हादसा हुआ कैसे? यही वे प्रश्न हैं, जिनका जवाब केवल ठेकेदार या किसी छोटे कर्मचारी को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। सत्य निकेतन की त्रासदी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दिल्ली में पीजी संस्कृति तेजी से बढ़ी है। देशभर से राजधानी में पढ़ने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और रोजगार तलाशने आने वाले हजारों युवा ऐसी इमारतों में रहते हैं, जहां कमरे छोटे हैं, गलियां संकरी हैं, सीढ़ियां संकरी हैं और सुरक्षा मानकों की स्थिति अक्सर संदिग्ध रहती है। मकान मालिक के लिए कमरों की संख्या बढ़ाना कारोबार है लेकिन उस कमरे में रहने वाला छात्र अपने सपने लेकर वहां आता है। जब छह कमरों की अनुमति वाली इमारत में 25 से अधिक कमरे बना दिए जाते हैं, जब बेसमेंट को पार्किंग के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब एक ही निकास मार्ग पर सैंकड़ों लोगों की सुरक्षा निर्भर कर दी जाती है, तब यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं रहता, यह मानव जीवन के साथ खिलवाड़ बन जाता है।

दिल्ली में अतीत की त्रासदियां भी हमें बार-बार चेताती रही हैं। 1997 का उपहार सिनेमा अग्निकांड हो या हाल के वर्षों में सामने आए बेसमेंट, कोचिंग सेंटर और व्यावसायिक इमारतों से जुड़े हादसे, हर घटना के बाद सुरक्षा मानकों पर सवाल उठे। बंद दरवाजे, अवरुद्ध निकास, अवैध निर्माण, अग्निशमन उपकरणों की अनुपलब्धता और प्रशासनिक उदासीनता बार-बार त्रासदियों की पृष्ठभूमि में दिखाई देती रही है। फिर भी व्यवस्था की स्मृति इतनी कमजोर है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि सस्पेंशन हमेशा छोटे कर्मचारी का ही क्यों होता है? यदि किसी इलाके में वर्षों तक अवैध निर्माण चलता रहा, यदि नियमों के विपरीत इमारतें खड़ी होती रही और उनमें पीजी, कोचिंग सेंटर, दुकानें या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलती रही तो उस पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसने इसे होने दिया। तत्कालीन अवैध निर्माण प्रभारी, संबंधित वरिष्ठ अधिकारी, जोनल स्तर के जिम्मेदार अधिकारी और संबंधित विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच क्यों न हो? यदि मिलीभगत प्रमाणित होती है तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में कठोर क्यों न हो?

समस्या किसी एक इमारत की नहीं है। दिल्ली और देश के तमाम शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं लेकिन भीतर से मौत के जाल में बदल चुकी हैं। कहीं बेसमेंट में अवैध निर्माण है, कहीं बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, कहीं संकरी सीढ़ियां, कहीं बंद खिड़कियां, कहीं लोहे की ग्रिलें और कहीं एक ही प्रवेश-निकास द्वार। अग्निशमन उपकरण कई जगह केवल निरीक्षण के समय दिखाने के लिए रखे जाते हैं और आपातकालीन निकास कागजों पर मौजूद रहते हैं, वास्तविकता में नहीं। ऐसी स्थिति में हादसा होने पर दमकल की गाड़ियां भी संकरी गलियों में फंस जाती हैं। बचाव दल के पास पहुंचने का रास्ता नहीं होता और अंदर फंसे लोगों के पास बाहर निकलने का रास्ता नहीं होता। फिर कुछ ही मिनटों में एक इमारत कब्रिस्तान में बदल जाती है।

अब जरूरत केवल दोषी खोजने की नहीं, व्यवस्था बदलने की है। दिल्ली की सभी पुरानी बहुमंजिला और व्यावसायिक इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। पीजी, हॉस्टल, कोचिंग सेंटर और बेसमेंट में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अनिवार्य जांच होनी चाहिए। फायर एनओसी की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध हो। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना लगाकर उसे वैध बनाने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। गंभीर उल्लंघन वाली इमारतों को तत्काल सील और आवश्यकतानुसार ध्वस्त किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए। किसी दुर्घटना के बाद दो-चार छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर देना प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, अक्सर जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन जाता है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या भ्रष्ट आचरण के कारण लोगों की जान जोखिम में पड़ी है तो उसके विरुद्ध कठोर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। पद जितना बड़ा हो, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।

सत्य निकेतन का मलबा केवल ईंट-पत्थरों का ढ़ेर नहीं है। उसके नीचे प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता, भवन सुरक्षा के नियमों और नागरिकों के भरोसे की भी परीक्षा हो रही है। इस त्रासदी को ‘हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ा अपराध होगा। हादसा वह होता है, जिसे रोका न जा सके लेकिन जिस दुर्घटना की जमीन अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से तैयार होती है, उसे केवल हादसा कहना सच्चाई को छोटा करना है। यदि इस बार भी जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई, छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े जिम्मेदार बच निकले और कुछ लाख रुपये के मुआवजे को न्याय का विकल्प बना दिया गया तो अगली त्रासदी केवल समय की प्रतीक्षा करेगी। तब फिर कोई इमारत गिरेगी, कोई परिवार उजड़ेगा, कोई बच्चा मलबे में दबेगा और हम फिर पूछेंगे कि आखिर असली गुनहगार कौन है? जबकि सच हम सभी जानते होंगे। गुनहगार केवल वह व्यक्ति नहीं होगा, जिसने अवैध निर्माण किया बल्कि गुनहगार वह पूरा तंत्र होगा, जिसने उसे बनने दिया, चलने दिया और तब तक आंखें बंद रखी, जब तक मलबे ने चीखना शुरू नहीं कर दिया। अब समय चीख सुनने का नहीं, व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)

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