सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता व्यक्ति
तकनीक ने मनुष्य को संवाद के ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव लगती थी। अब एक क्लिक पर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से संपर्क स्थापित हो जाता है। हजारों मित्र, सैकड़ों समूह, लगातार आती सूचनाएं और हर क्षण सक्रिय रहने वाली आभासी दुनिया ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि मनुष्य पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गंभीर सामाजिक विडंबना भी आकार ले रही है, संपर्क बढ़ रहे हैं, संवाद घट रहा है और भीड़ बढ़ने के बावजूद मनुष्य भीतर से अकेला होता जा रहा है। उसे आत्मीयता भरे शब्दों की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन दुनिया के व्यक्ति केवल ज्ञान देने तक ही सीमित रहते हैं, साथ चलने को कोई तैयार नहीं होता।
सोशल मीडिया ने दूरी अवश्य कम की है, लेकिन निकटता की परिभाषा बदल दी है। पहले किसी अपने से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता था। आमने-सामने बैठकर बातचीत होती थी, चेहरे के भाव पढ़े जाते थे और मौन भी संवाद का हिस्सा होता था। अब किसी के जीवन में हमारी उपस्थिति कई बार केवल एक ‘लाइक’, एक इमोजी या कुछ शब्दों की टिप्पणी तक सीमित हो गई है। जन्मदिन पर दर्जनों शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लेकिन संकट की घड़ी में कंधा देने वाला व्यक्ति तलाशना कठिन हो रहा है। इसी कारण आज हर कोई अकेलेपन की गहराई में लगातार घुसता ही जा रहा है। यह बात सच है कि जो व्यक्ति से मिल सकता है, उसे तकनीक कभी नहीं दे सकती।
यह स्थिति केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवार और समाज की संरचना पर भी दिखाई दे रहा है। एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। भोजन की मेज पर बातचीत के बजाय सूचनाओं की जांच होती है। बच्चे माता-पिता के साथ समय बिताने के बजाय डिजिटल मनोरंजन में डूबे रहते हैं और माता-पिता भी अपनी आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। परिणाम यह है कि घर भौतिक रूप से साथ होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इसी से परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं, और यही परिवार टूटने का एक बड़ा कारण भी है। इससे भी व्यक्ति अवसाद की ओर अग्रसर होता जाता है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने मनुष्य को स्वयं को प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व मंच दिया, लेकिन स्वयं को समझने का अवसर कम कर दिया। यहां हर व्यक्ति अपने जीवन का चुना हुआ हिस्सा प्रदर्शित करता है। दूसरों के जीवन की दिखाई देने वाली चमक जब लगातार हमारी आंखों के सामने रहती है, तो अनजाने में तुलना शुरू हो जाती है। हमें लगता है कि दूसरे हमसे अधिक सफल, अधिक खुश और अधिक संतुष्ट हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन अक्सर संपूर्ण जीवन नहीं, उसका चयनित अंश होता है। जीवन वही सार्थक है, जिसमें समाज और परिवार का साथ हो। किसी भी प्रकार की तुलना करना हानिकारक ही है। यही तुलना धीरे-धीरे आत्मसंतोष को प्रभावित करती है। व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविक उपलब्धियों के बजाय दूसरों की आभासी उपलब्धियों से स्वयं को मापने लगता है। लाइक और कमेंट सामाजिक स्वीकृति के नए पैमाने बन जाते हैं। पोस्ट पर प्रतिक्रिया कम मिले तो बेचैनी और अधिक मिले तो क्षणिक संतोष प्राप्त होता है। यह चक्र व्यक्ति को बाहरी मान्यता पर निर्भर करता जाता है। विडंबना यह है कि हजारों लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी अपने मन की बात कहने के लिए एक विश्वसनीय व्यक्ति की तलाश कर सकता है।
समाज के सामने एक दूसरी चुनौती संवाद की गुणवत्ता की है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है, लेकिन हर अभिव्यक्ति संवाद नहीं होती। संवाद में सुनना भी शामिल है, जबकि डिजिटल संसार में प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी कई बार सुनने की क्षमता को पीछे छोड़ देती है। असहमति होते ही बहस व्यक्तिगत आरोपों में बदल जाती है। विचारों का आदान प्रदान धीरे-धीरे विचारों की टकराहट में बदलने लगता है। इससे सामाजिक विश्वास कमजोर होता है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि समस्या सोशल मीडिया स्वयं नहीं है। तकनीक एक साधन है, उसका उपयोग उसे उपयोगी या नुकसानदेह बनाता है। सोशल मीडिया ने आपदा के समय सहायता पहुंचाने, ज्ञान साझा करने, रोजगार और व्यवसाय के अवसर पैदा करने तथा दूर रह रहे परिवारों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समस्या तब पैदा होती है जब साधन जीवन का विकल्प बनने लगे। इसलिए समाधान तकनीक से पलायन नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। परिवारों को प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित करना होगा, जब मोबाइल और अन्य स्क्रीन किनारे रखकर केवल एक-दूसरे से बात की जाए। बच्चों के साथ संवाद को केवल उनकी पढ़ाई और अनुशासन तक सीमित न रखकर उनके विचारों, मित्रताओं, भय और सपनों तक ले जाना होगा। बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया में शामिल करने के साथ-साथ उनके अनुभवों को सुनने के लिए भी समय देना होगा।
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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें ‘कनेक्टेड’ होने और ‘जुड़े’ होने के अंतर को समझना होगा। कनेक्शन तकनीक बनाती है, संबंध मनुष्य बनाता है। हजारों संपर्कों की सूची किसी एक सच्चे मित्र का स्थान नहीं ले सकती। सैकड़ों प्रतिक्रियाएं उस एक आत्मीय बातचीत का विकल्प नहीं बन सकतीं, जिसमें सामने वाला हमारी बात केवल सुनता ही नहीं, समझता भी है।
आज आवश्यकता सोशल मीडिया छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके बीच अपनी सामाजिक संवेदनशीलता बचाए रखने की है। हमें फिर से पड़ोसी से परिचय, मित्र से मुलाकात, परिवार के साथ भोजन और बिना किसी स्क्रीन के बातचीत जैसी छोटी-छोटी मानवीय परंपराओं को जीवन में स्थान देना होगा। क्योंकि मनुष्य को केवल सूचना नहीं, उसे आत्मीयता भी चाहिए। उसे केवल दर्शक नहीं, श्रोता चाहिए, केवल फॉलोअर नहीं, साथी चाहिए। यदि तकनीक हमें हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन हजारों संपर्कों के बीच अपने लोगों से हमारा वास्तविक संबंध कमजोर न हो।
सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता समाज हमारी नियति नहीं है। यह एक चेतावनी है। तकनीक हमारे हाथ में रहे, जीवन पर उसका नियंत्रण न हो, यही संतुलन आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
- सुरेश हिंदुस्तानी
'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए!
भारत और चीन के रिश्तों में दिल्ली में जो नई गर्माहट दिखाई दे रही है, उसे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार या दो नेताओं की मुस्कान की तस्वीरों से समझना बड़ी भूल होगी। असली कहानी इससे कहीं ज्यादा कठोर है। सात साल बाद भारत आए शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि गलवान के बाद दोनों देशों ने टकराव को खत्म नहीं किया है, लेकिन अब वे उसे नियंत्रित करने और अपने-अपने हितों के लिए रिश्ते को फिर से व्यवस्थित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। मोदी का भाषण रोक कर शी से पूछना— “Is it okay?”, एक मानवीय कूटनीतिक क्षण था, लेकिन उसके पीछे की रणनीति कहीं अधिक गंभीर है।
दिल्ली में मोदी-शी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य था— “Differences should not become disputes.” मोदी ने साफ किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही संबंधों के आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है। दोनों देशों ने सीमा विवाद के न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई, साथ ही पुराने समझौतों का पालन करने पर जोर दिया। व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन, बाजार तक भरोसेमंद पहुंच और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। यानी बातचीत अब केवल सीमा पर सैनिकों की दूरी घटाने तक सीमित नहीं है; दोनों देश रिश्तों का पूरा ढांचा दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन यहां सबसे जरूरी सवाल है कि चीन अचानक भारत की तरफ क्यों देख रहा है? देखा जाये तो जवाब चीन की इच्छा से ज्यादा बदलती वैश्विक परिस्थितियों में छिपा है। अमेरिका की बढ़ती संरक्षणवादी व्यापार नीति, टैरिफ का दबाव, पश्चिम और चीन के बीच तकनीकी संघर्ष तथा वैश्विक सप्लाई चेन का पुनर्गठन बीजिंग के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे समय में भारत को लंबे समय तक केवल रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर चलना चीन के लिए महंगा पड़ सकता है। भारत दुनिया का विशाल बाजार है, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और ग्लोबल साउथ में उसका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
यही वजह है कि चीन भारत के साथ संबंधों को “रणनीतिक और दीर्घकालिक” नजरिए से देखने की बात कर रहा है। चीनी पक्ष ने खुद कहा है कि दोनों देश एक-दूसरे की ताकतों से सीख सकते हैं और साझा विकास को आगे बढ़ा सकते हैं। चीन के लिए यह केवल भारत से कारोबार बढ़ाने का मामला नहीं है; यह उस बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश भी है, जिसमें BRICS की भूमिका बढ़ रही है।
यहां व्यापार सबसे बड़ा दबाव-बिंदु भी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में चीन से भारत का आयात करीब 131.62 अरब डॉलर, जबकि निर्यात केवल 19.47 अरब डॉलर रहा। यानी करीब 112 अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा। चीन भारत के कुल आयात का लगभग 19.2 प्रतिशत हिस्सा देता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर उपकरण, बैटरियां, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक सामान में भारत की चीनी निर्भरता बहुत बड़ी है। दूसरी ओर भारत चाहता है कि चीन अपने बाजार को भारतीय उत्पादों के लिए ज्यादा खोले।
यही विरोधाभास रिश्तों की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी। भारत चीन से व्यापार बंद नहीं कर सकता, लेकिन ऐसा व्यापार भी स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें चीन लगातार बेचता रहे और भारत केवल खरीदता रहे। इसलिए अगला चरण trade expansion नहीं, trade rebalancing का होना चाहिए। भारतीय MSMEs को BRICS की सप्लाई चेन में जोड़ना, चीन से केवल finished goods लेने के बजाय उत्पादन और value chains में हिस्सेदारी बढ़ाना और निवेश को भारतीय manufacturing capacity से जोड़ना इस दिशा में निर्णायक हो सकता है।
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लेकिन असली कांटा अभी भी सीमा है। 2020 के गलवान संघर्ष ने भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई। इसके बाद सैनिक तनाव कम हुआ, लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ। अरुणाचल प्रदेश, LAC पर सैन्य तैनाती, चीन-पाकिस्तान समीकरण और संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी गतिविधियां अभी भी भारत की चिंताओं में हैं। इसलिए दिल्ली का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि व्यापार और सहयोग आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन सीमा पर शांति की कीमत पर नहीं।
फिर आता है critical minerals का सवाल। मोदी ने शी की मौजूदगी में ही technology और critical minerals की “weaponisation” के खिलाफ चेतावनी दी। यह सीधा नाम लेकर हमला नहीं था, लेकिन संदेश साफ था। चीन rare-earth refining में 90 प्रतिशत से अधिक वैश्विक क्षमता नियंत्रित करता है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, AI और advanced manufacturing के दौर में यह आर्थिक ताकत ही नहीं, रणनीतिक leverage भी है।
इसलिए भारत-चीन की नई गर्माहट को दोस्ती की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। यह ज्यादा सही तरीके से managed competition है। जहां दोनों देश जानते हैं कि वे एक-दूसरे को हरा नहीं सकते, लेकिन एक-दूसरे को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। शी का दिल्ली आना, मोदी-शी की बातचीत, व्यापारिक संपर्कों का खुलना और BRICS में साथ काम करने की कोशिशें बताती हैं कि रिश्ते अब फिर से पटरी पर लाए जा रहे हैं। लेकिन पटरी अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हुई है। एक गलत सीमा-संघर्ष, व्यापार पर एकतरफा दबाव या रणनीतिक अविश्वास इस पूरी प्रक्रिया को फिर पीछे धकेल सकता है। Xi का BRICS डिनर में शामिल न होना भी इसी सावधानी की याद दिलाता है। हालांकि उनकी अनुपस्थिति का आधिकारिक कारण नहीं बताया गया और इसे किसी राजनीतिक संकेत के रूप में स्थापित करना उचित नहीं होगा।
बहरहाल, दिल्ली में इस बार मोदी ने संकेत दे दिया है कि सहयोग होगा, व्यापार होगा, BRICS में साझेदारी होगी, लेकिन सीमा, संप्रभुता, बाजार पहुंच और रणनीतिक स्वायत्तता पर भारत अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा।
-नीरज कुमार दुबे
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