Sonia Gandhi के खिलाफ FIR याचिका खारिज करने का ACJM का आदेश रद्द, 29 सितंबर को फिर सुनवाई
1980 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़े एक अहम कानूनी मामले में, राउज़ एवेन्यू स्थित MP/MLA मामलों की स्पेशल कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें उनके खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया था। एक्टिविस्ट विकास त्रिपाठी की ओर से दायर क्रिमिनल रिविज़न याचिका को मंज़ूरी देते हुए, स्पेशल जज विशाल गोगने ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट का 2025 का खारिज करने वाला आदेश "बिना ठोस कारण वाला" (non-speaking) और "गलत" (perverse) था। उन्होंने मामले को 29 सितंबर को नए सिरे से सुनवाई के लिए निचली अदालत में वापस भेज दिया। एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) के पिछले आदेश को रद्द करते हुए, स्पेशल जज गोगने ने शिकायत को खारिज करने के तरीके में प्रक्रियात्मक और कानूनी खामियों की ओर इशारा किया कोर्ट ने कहा कि जिस आदेश को चुनौती दी गई थी, उसमें शिकायत को खारिज करने के कारण नहीं बताए गए थे और न ही यह स्पष्ट किया गया था कि क्या कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) हुआ है।
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स्पेशल जज ने कहा कि यह आदेश बिना किसी तर्क या कारण के दिया गया है। इसे रद्द किया जाना चाहिए। सेशंस कोर्ट ने नागरिकता के अधिकार क्षेत्र को लेकर निचली अदालत के तर्क की आलोचना करते हुए कहा कि "नागरिकता के संबंध में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के बारे में की गई टिप्पणी अनुचित है। कोर्ट ने सिर्फ़ बिना वेरिफ़ाई की हुई फ़ोटोकॉपी के आधार पर शिकायत को खारिज करने की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि शिकायत को "बिना वेरिफ़ाई किए गए रिकॉर्ड की फ़ोटोकॉपी के आधार पर सिर्फ़ एक दावे" के तौर पर खारिज कर दिया गया था। यह बताते हुए कि वोटर लिस्ट सिर्फ़ भारतीय नागरिकों के लिए होती है, कोर्ट ने उन आरोपों का ज़िक्र किया जिनके मुताबिक अप्रैल 1983 में भारतीय नागरिकता मिलने से पहले ही, 1980 में गांधी का नाम सफ़दरजंग रोड, नई दिल्ली के पते के साथ वोटर लिस्ट में शामिल था।
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कोर्ट ने बताया कि उनका नाम कथित तौर पर 1980 में शामिल किया गया, 1982 में हटा दिया गया और 1983 में फिर से जोड़ दिया गया। यह साफ़ करते हुए कि रिविज़नल कोर्ट मजिस्ट्रेट की ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा सकता, स्पेशल जज ने निचली अदालत को मामले पर व्यवस्थित तरीके से फिर से विचार करने का निर्देश दिया: "रिविज़नल कोर्ट मजिस्ट्रेट कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकता। मामले को वापस भेजा जाता है और इस पर नए सिरे से फ़ैसला किया जाएगा। कोर्ट संबंधित पुलिस अधिकारी से स्टेटस रिपोर्ट मंगाएगी और संबंधित पुलिस अधिकारी की बात सुनने के बाद एक विस्तृत आदेश जारी करेगी।
CGPSC भर्ती मामले में पूर्व सचिव की जमानत याचिका पर Supreme Court ने CBI से मांगा जवाब
उच्चतम न्यायालय ने 2020 से 2022 के दौरान भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) के पूर्व सचिव की ओर से दायर जमानत याचिका पर सोमवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जवाब मांगा। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ जीवन किशोर ध्रुव की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। ध्रुव ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पांच अगस्त के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें इस मामले में उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
सीबीआई ने ध्रुव को पिछले साल सितंबर में गिरफ्तार किया था। कथित अनियमितताओं के समय वह सीजीपीएससी के सचिव पद पर कार्यरत थे। उच्च न्यायालय ने जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक कराने में मदद करने वाले लोग लाखों युवा अभ्यर्थियों के करियर और भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं तथा ऐसा कृत्य हत्या से भी ‘‘अधिक जघन्य’’ है।
सोमवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई और सीबीआई को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इसके एक सप्ताह बाद जवाबी हलफनामा दाखिल कर सकता है। मामले को चार सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार सीजीपीएससी ने 2020 से 2022 के दौरान राज्य सेवा परीक्षा आयोजित की थी। आरोप है कि उस अवधि में याचिकाकर्ता आयोग के सचिव पद पर तैनात थे और आयोग की ओर से आयोजित परीक्षाओं की गोपनीयता बनाए रखना उनकी आधिकारिक जिम्मेदारी थी। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि याचिकाकर्ता ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर गोपनीयता का उल्लंघन किया और अपने बेटों को प्रश्न-पत्र उपलब्ध कराए।
यह भी आरोप है कि इसी आधार पर उनके एक बेटे का चयन उप जिलाधिकारी के पद पर हुआ। उनका बेटा भी इस मामले में आरोपी है। ध्रुव ने इस मामले में जमानत के लिए उच्च न्यायालय का रुख किया था।
उनके वकील ने उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि केवल आयोग के सचिव पद पर होने के कारण उन्हें गलत तरीके से मामले में फंसाया गया है। उनके वकील ने यह भी दलील दी थी कि वह कथित प्रश्नपत्र लीक में न तो शामिल थे और न ही ऐसा कोई सबूत है जो कथित अपराधों में उनकी भागीदारी को साबित करे। ध्रुव के अलावा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष तमन सिंह सोनवानी समेत कई अन्य लोग भी इस मामले में आरोपी हैं।
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