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'धर्मेंद्र सबसे ज्यादा फ्लर्ट करते थे', जया प्रदा ने ही-मैन को लेकर कही ऐसी बात, वायरल हुआ वीडियो

Jaya Prada on Dharmendra: बॉलीवुड की दिग्गज एक्ट्रेस जया प्रदा ने अपने लंबे फिल्मी करियर में हिंदी और साउथ सिनेमा के कई बड़े सितारों के साथ काम किया है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बेहद कम उम्र में की थी और देखते ही देखते इंडस्ट्री की टॉप एक्ट्रेसेस में अपनी जगह बना ली. जया प्रदा ने धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, जितेंद्र और कई बड़े कलाकारों के साथ काम किया है. ऐसे में उनके पास फिल्म इंडस्ट्री के पुराने दौर से जुड़े कई दिलचस्प किस्से हैं.

इसी बीच अब कपिल शर्मा के शो का जया प्रदा से जुड़ा एक पुराना वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर फिर से वायरल हो रहा है. इस क्लिप में जया प्रदा अपने फिल्मी करियर के शुरुआती दिनों और उस दौर के बड़े सितारों के साथ काम करने के अनुभवों के बारे में बात करती नजर आ रही हैं. इसी दौरान उन्होंने धर्मेंद्र को लेकर भी एक मजेदार खुलासा किया था. जब उनसे पूछा गया कि इंडस्ट्री के कलाकारों में सबसे ज्यादा फ्लर्ट कौन करता था, तो उन्होंने बिना ज्यादा घुमाए धर्मेंद्र का नाम ले लिया था.

धर्मेंद्र को बताया था सबसे ज्यादा फ्लर्ट करने वाला

दरअसल, कपिल शर्मा के शो में बातचीत के दौरान कपिल ने जया प्रदा से पूछा था कि उस दौर के कलाकारों में सबसे ज्यादा फ्लर्ट कौन करता था. कपिल के सवाल पर जया प्रदा पहले थोड़ा हिचकिचाईं और मजाकिया अंदाज में पूछा कि क्या वो सच में नाम बताएं? जब कपिल ने उन्हें जवाब देने के लिए कहा तो जया प्रदा ने हंसते हुए कहा, “धर्मेंद्र.”

जया प्रदा का ये जवाब सुनकर सेट पर मौजूद लोग हंसने लगे थे. आपको बता दें कि धर्मेंद्र और जया प्रदा ने एक साथ कई फिल्मों में काम किया है और दोनों की ऑन-स्क्रीन जोड़ी को भी दर्शकों ने पसंद किया था. यही वजह है कि जया प्रदा के इस पुराने किस्से का क्लिप एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा में है.

राजेश खन्ना के देर से सेट पर पहुंचने का किस्सा

इसी बातचीत के दौरान जया प्रदा से ये भी पूछा गया कि उस दौर में कौन सा एक्टर सेट पर सबसे ज्यादा देर से पहुंचता था. इस सवाल पर उन्होंने राजेश खन्ना का नाम लिया. जया प्रदा ने बताया कि वो साउथ इंडस्ट्री से थीं और वहां काम करने के दौरान उन्हें सुबह जल्दी सेट पर पहुंचने की आदत थी. उन्होंने कहा कि वो आमतौर पर सुबह 7 बजे तक सेट पर पहुंच जाती थीं. लेकिन जब उन्होंने हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया तो शूटिंग का तरीका उनके लिए काफी अलग था. 

उन्होंने बताया कि हिंदी फिल्मों के सेट पर उन्हें कई बार सुबह 9 बजे बुलाया जाता था. वो समय पर सेट पर पहुंच जाती थीं और मेकअप आदि करके शूटिंग के लिए तैयार हो जाती थीं, लेकिन कई बार राजेश खन्ना काफी देर से सेट पर पहुंचते थे. जया प्रदा ने मजेदार अंदाज में बताया कि राजेश खन्ना कभी-कभी रात के करीब 8 बजे सेट पर पहुंचते थे. सेट पर आने के बाद वो पहले वड़ा पाव खाते थे और फिर एक शॉट देते थे. इसके बाद रात करीब 9 बजे उनका पैक-अप हो जाता था. जया प्रदा का ये किस्सा सुनकर कपिल शर्मा भी हैरान रह गए थे.

कम उम्र में शुरू किया था काम

जया प्रदा ने बातचीत में अपने करियर के शुरुआती दिनों को भी याद किया. उन्होंने बताया कि उन्होंने बहुत कम उम्र में फिल्म इंडस्ट्री में काम करना शुरू कर दिया था. उस समय वो लगभग 16-17 साल की थीं और उनके सामने इंडस्ट्री के कई बड़े और दिग्गज सितारे हुआ करते थे. उनके लिए ये अनुभव आसान नहीं था. एक तरफ वो बेहद कम उम्र की थीं, वहीं दूसरी तरफ उनके साथ काम करने वाले कलाकार इंडस्ट्री के बड़े नाम थे. ऐसे में उन्हें कई बार घबराहट भी महसूस होती थी. हालांकि, जया प्रदा के लिए ये दौर मुश्किल होने के साथ-साथ गर्व का भी था. उन्होंने अपने करियर में ऐसे कलाकारों के साथ काम किया, जिन्हें वो खुद एक आइकन के तौर पर देखती थीं.

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Explainer: बुर्का-नकाब बैन या हिजाब भी OUT? मेलोनी के ऐलान से मचा बवाल, इन देशों में पहले से लागू है पाबंदी

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने एक बड़ा ऐलान करते हुए स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने की योजना का खुलासा किया है. दरअसल, उनका यह प्रस्ताव सिर्फ ड्रेस कोड तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें हर क्लास में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने और कुछ अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य करने जैसे प्रावधान भी शामिल हैं.

मेलोनी ने यह ऐलान कहां और कैसे किया?

मेलोनी ने रविवार को रोम में अपनी पार्टी ब्रदर्स ऑफ इटली के युवा मोर्चे के एक बड़े आयोजन में यह प्रस्ताव सार्वजनिक किया. उन्होंने कहा कि छात्राएं स्कूल में खुले चेहरे के साथ आनी चाहिए और किसी भी तथाकथित परंपरा के नाम पर किसी युवती को अपना चेहरा छुपाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. सोशल मीडिया पर उनके इस बयान को महिला समानता और छात्राओं की आजादी से जोड़कर देखा जा रहा है.

इस प्रस्ताव में और क्या-क्या शामिल है?

एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्ताव के तहत हर कक्षा में विदेशी मूल के छात्रों की संख्या पर कानूनी सीमा तय की जाएगी. हालांकि मेलोनी ने अभी यह साफ नहीं किया कि यह सीमा कितनी होगी. इसके अलावा जिन विदेशी छात्रों के परिवारों को स्कूल व्यवस्था में घुलने-मिलने में गंभीर दिक्कतें आ रही हैं उनके अभिभावकों के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य किया जाएगा.

दुनिया में और किन-किन देशों में बुर्का-नकाब बैन है?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूरोप में फ्रांस पहला देश था जिसने 2011 में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले पूरी तरह प्रतिबंधित किए थे. इसके बाद बेल्जियम ने भी उसी साल ऐसा ही कानून लागू किया था. इसके अलावा ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, बुल्गारिया, नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड जैसे यूरोपीय देश भी अलग-अलग स्तर पर ऐसी पाबंदियां लगा चुके हैं. स्विट्जरलैंड में तो 2021 में हुए जनमत संग्रह में करीब 51 प्रतिशत मतदाताओं ने इस बैन के पक्ष में वोट दिया था.

क्या यूरोप के बाहर भी ऐसे प्रतिबंध मौजूद हैं?

कुछ रिपोर्टों के मुताबिक दुनियाभर में करीब दो दर्जन से ज्यादा देशों में चेहरा ढकने वाले परिधानों पर किसी न किसी रूप में पाबंदी है, जिनमें चीन, श्रीलंका, तुर्की, ट्यूनीशिया, मोरक्को और चाड जैसे मुस्लिम-बहुल और गैर-मुस्लिम दोनों तरह के देश शामिल हैं. वहीं, दूसरी तरफ अफगानिस्तान जैसे देशों में बुर्का पहनना अनिवार्य है जो इस पूरे मसले को और उलझा देता है.

भारत में इस तरह के विवाद की क्या मिसाल रही है?

भारत में भी हिजाब को लेकर एक बड़ा विवाद हो चुका है. बता दें कर्नाटक राज्य में शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने को लेकर कुछ साल पहले तीखी बहस छिड़ी थी. जिसमें छात्राओं के ड्रेस कोड और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर अदालत तक मामला पहुंचा था. यह मामला आज भी भारत में धार्मिक पोशाक बनाम शिक्षण संस्थानों के नियमों की बहस का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है.

सरकार दे रही बिना एक रुपया खर्च किए सोलर पैनल

इस ऐलान पर प्रतिक्रियाएं कैसी आ रही हैं?

एक तरफ कुछ मुस्लिम संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने इसे मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाने वाला और बंटवारा पैदा करने वाला कदम बताया है. वहीं, दूसरी तरफ इटली में कुछ उदारवादी मुस्लिम समूहों ने बीते वर्षों में इसी तरह के प्रस्तावों का स्वागत करते हुए इसे महिला अधिकारों की जीत भी बताया था. इससे साफ है कि मुस्लिम समुदाय के भीतर भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं है.

क्या इस्लामी नियमों को लेकर भी कोई चुनौती दी गई है?

मेलोनी सरकार का तर्क है कि पूर्ण चेहरा-ढकाव को किसी परंपरा या रिवाज के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता और यह सीधे तौर पर महिलाओं की आजादी से जुड़ा मसला है. सरकार पहले से ही जबरन विवाह और कथित 'वर्जिनिटी टेस्ट' जैसी प्रथाओं पर भी सख्त कानून बनाने की बात कर चुकी है जिसे वह धार्मिक कट्टरता और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के खिलाफ अपनी लड़ाई का हिस्सा बताती है.

बुर्का और नकाब में फर्क क्या है और हिजाब को क्यों नहीं छुआ गया?

बुर्का पूरे शरीर को सिर से पैर तक ढकने वाला परिधान है, जिसमें आंखों के ऊपर भी जाली जैसा कपड़ा होता है. वहीं, नकाब चेहरे को ढकता है लेकिन आंखों का हिस्सा खुला छोड़ देता है. इसके उलट हिजाब सिर और गर्दन को ढकता है लेकिन चेहरा पूरी तरह खुला रहता है. मेलोनी के प्रस्ताव में साफ किया गया है कि यह प्रतिबंध सिर्फ चेहरा ढकने वाले परिधानों पर लागू होगा, हिजाब पर नहीं.

क्या इटली में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने का यह पहला कदम है?

जानकारी के मुताबिक इटली में पहले से ही 2010 से एक दिशानिर्देश लागू है, जिसके तहत किसी भी कक्षा में गैर-इतालवी नागरिकता वाले छात्रों की संख्या 30 प्रतिशत तक सीमित रखने की सलाह दी गई है. हालांकि इस नियम का पालन हमेशा सख्ती से नहीं हुआ है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक इटली के स्कूलों में गैर-इतालवी नागरिकता वाले छात्रों की हिस्सेदारी करीब 11.6 प्रतिशत है और इनकी कुल संख्या करीब 9 लाख 30 हजार के आसपास आंकी गई है.

क्या यह कानून तुरंत लागू हो जाएगा?

यह प्रस्ताव अभी सिर्फ ऐलान के स्तर पर है और जल्द ही इटली की कैबिनेट के सामने रखा जाएगा. इसके बाद इसे संसद से भी मंजूरी लेनी होगी. जिसके लिए 60 दिन के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होगी. यह अभी कानून नहीं बना है बल्कि प्रस्ताव के तौर पर ही सामने आया है.

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इससे पहले भी इटली में ऐसी कोई कोशिश हुई थी?

बता दें इससे पहले जुलाई 2026 में मेलोनी की पार्टी ने संसद में एक बिल पेश किया था जिसमें सार्वजनिक स्थानों, दफ्तरों, दुकानों और शिक्षण संस्थानों समेत पूरे देश में बुर्का-नकाब पर प्रतिबंध लगाने और उल्लंघन पर 300 से 3000 यूरो तक जुर्माने का प्रस्ताव था. उस बिल को 'इस्लामिक अलगाववाद' के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा बताया गया था और इसमें मस्जिदों की फंडिंग को भी नियमित करने की बात कही गई थी.

क्या इस मुद्दे पर इटली में राजनीतिक दबाव भी है?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इटली में 2027 में आम चुनाव होने हैं और इमिग्रेशन का मुद्दा इस चुनाव में केंद्र में रहने की उम्मीद है. मेलोनी को अपनी ही विचारधारा के एक और कट्टर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी रिटायर्ड जनरल रॉबर्टो वन्नाची से चुनौती मिल रही है जो प्रवासन को लेकर और भी सख्त कदमों की मांग करते रहे हैं. माना जा रहा है कि यही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा मेलोनी को इस तरह के सख्त फैसलों की तरफ धकेल रही है.

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