सिर्फ पैसे की बरामदगी पर भ्रष्टाचार की सजा नहीं, High Court ने 10 साल पुराने केस में दी राहत
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रिश्वत के एक दस साल पुराने मामले में शिक्षा विभाग के एक अधिकारी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ रिश्वत के पैसे (दागदार नोट) मिलने से ही किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि यह साफ़ तौर पर साबित न हो कि रिश्वत की मांग की गई थी। जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने 2017 के ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सूरजपुर ज़िले में ज़िला शिक्षा अधिकारी के दफ़्तर में तैनात अकाउंटेंट 41 वर्षीय मुरली प्रसाद चौधरी को सज़ा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने यह आदेश 18 सितंबर को बिलासपुर में दिया।
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चौधरी ने स्पेशल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था। अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा अवैध रिश्वत की मांग करना ही इस अपराध का मुख्य आधार है, और जब तक अभियोजन पक्ष इस मांग को बिना किसी संदेह के साबित नहीं कर देता, तब तक आरोपी से केवल रिश्वत के नोट बरामद होने के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आदेश के अनुसार, 'माँ सरस्वती शिक्षा समिति' के प्रेसिडेंट-मैनेजर मोहित राम राजवाड़े, संस्था द्वारा चलाए जा रहे एक स्कूल की मान्यता के सिलसिले में 2014 में DEO ऑफिस गए थे। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि 20 जून 2014 को चौधरी ने राजवाड़े से 15,000 रुपये की मांग की और उनसे तुरंत 5,000 रुपये देने को कहा, जिसमें से कथित तौर पर 4,900 रुपये का भुगतान किया गया।
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इसके बाद राजवाड़े 21 जून 2014 को बिलासपुर के एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) गए और लिखित शिकायत दर्ज कराई। जांच-पड़ताल के दौरान, उनसे चौधरी के साथ हुई बातचीत को रिकॉर्ड करने के लिए कहा गया। अभियोजन पक्ष ने इन्हीं बातचीत को आधार बनाया, जिसमें कथित रिश्वत की रकम को घटाकर 8,000 रुपये करने की बात कही गई थी।
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य के खिलाफ न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ कथित तौर पर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट फैलाने के मामले में आपराधिक अवमानना के मामले की सुनवाई 16 नवंबर को तय की। न्यायमूर्ति नवीन चावला और अरुण भारद्वाज की पीठ ने केजरीवाल और अन्य प्रतिवादियों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया। अदालत ने वकील अशोक चैतन्य द्वारा केजरीवाल और अन्य, जिनमें AAP नेता गोपाल राय और पत्रकार सौरभ दास शामिल हैं। उसके खिलाफ न्यायमूर्ति शर्मा के खिलाफ कथित तौर पर सुनियोजित सोशल मीडिया अभियान चलाने के आरोप में दायर एक अलग अवमानना याचिका की सुनवाई के लिए भी 16 नवंबर की तारीख निर्धारित की।
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सुनवाई के दौरान, केजरीवाल के सीनियर वकील ने कहा कि उन्हें अभी तक अवमानना मामले का आधार बनने वाली पूरी सामग्री नहीं मिली है। बेंच ने रजिस्ट्री को वह सामग्री उपलब्ध कराने का निर्देश दिया, जिसे अधूरा बताया गया था और कहा अगर कोई जवाब देना हो, तो उसे चार हफ़्ते में दाखिल किया जाए। 19 मई को, जस्टिस शर्मा द्वारा शुरू किए गए स्वतः संज्ञान वाले अवमानना मामले में हाई कोर्ट ने केजरीवाल और अन्य नेताओं को नोटिस जारी किया था और उन्हें अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया था। कोर्ट ने सीनियर वकील राजदीपा बेहूरा को 'एमिकस क्यूरी' के तौर पर भी नियुक्त किया था। जस्टिस शर्मा ने 14 मई को केजरीवाल, सिसोदिया, सिंह और अन्य AAP नेताओं (जिनमें दुर्गेश पाठक, सौरभ भारद्वाज और विनय मिश्रा शामिल हैं) के ख़िलाफ़ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी। यह कार्यवाही आबकारी नीति मामले के संबंध में उनके ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर की गई "अपमानजनक" पोस्ट को लेकर की गई थी।
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जज ने एक्स यूज़र देवेश विश्वकर्मा के ख़िलाफ़ भी अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी। बाद में वकील अशोक चैतन्य ने अवमानना की एक अलग याचिका दायर की। अपने अवमानना आदेश में जस्टिस शर्मा ने कहा कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री ने कानूनी रास्ते अपनाने के बजाय सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ सोची-समझी बदनामी की मुहिम चलाई। उन्होंने यह भी कहा कि सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई की याचिका पर अब दूसरी बेंच सुनवाई करेगी। जज ने उन लोगों की कई सोशल मीडिया पोस्ट पर आपत्ति जताई जिन पर अवमानना का आरोप है। उन्होंने कहा कि इन पोस्ट में उन पर राजनीतिक निष्ठा और जुड़ाव का आरोप लगाया गया और वाराणसी के एक शिक्षण संस्थान में दिए गए उनके भाषण के एक गुमराह करने वाले एडिटेड वीडियो के ज़रिए उन्हें निशाना बनाया गया। उन्होंने इस मामले की अदालती कार्यवाही के क्लिप्स के बड़े पैमाने पर फैलने का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों पर अवमानना का आरोप है, वे एक समानांतर नैरेटिव (अलग कहानी) बना रहे हैं और चुप रहना न्यायिक संयम नहीं, बल्कि एक ताकतवर मुक़दमेबाज़ के सामने घुटने टेकना है।
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