केंद्रीय कर्मचारियों की चमकेगी किस्मत, 8वें वेतन आयोग में बेसिक सैलरी और भत्तों पर हुआ बड़ा मंथन
8th Pay Commission: केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन ढांचे को नए सिरे से तय करने के लिए आठवें वेतन आयोग की गतिविधियां तेज हो चुकी हैं. हाल ही में चंडीगढ़ में आयोजित की गई एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी है. यह अहम बैठक 16 सितंबर को शुरू हुई थी और तीन दिनों तक लगातार गहन विचार विमर्श के बाद 18 सितंबर को संपन्न हो गई. इस बैठक में विभिन्न कर्मचारी संगठनों और आयोग के प्रतिनिधियों के बीच कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों से जुड़े कई गंभीर विषयों पर बातचीत हुई.
चंडीगढ़ की इस अहम चर्चा के बाद अब आयोग की अगली बैठक देश के आईटी शहर बेंगलुरु में आयोजित की जाएगी. इन सभी बैठकों के दौरान सबसे बड़ा और चर्चित मुद्दा हमेशा फिटमेंट फैक्टर ही बना रहता है. कर्मचारी और पेंशनर्स से जुड़े संगठन सरकार और आयोग के सामने लगातार यह मांग रख रहे हैं कि इस बार के वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर को अधिक से अधिक रखा जाए ताकि कर्मचारियों को वास्तविक लाभ मिल सके.
कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और फिटमेंट फैक्टर का सीधा गणित
वेतन आयोग के तहत किसी भी कर्मचारी की नई बेसिक सैलरी तय करने में फिटमेंट फैक्टर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अगर इसे आसान गणित के जरिए समझें तो पूरा ढांचा साफ हो जाता है. मान लीजिए कि आठवां वेतन आयोग कर्मचारियों के लिए 2.75 का फिटमेंट फैक्टर तय करता है.
इस स्थिति के लागू होते ही केंद्रीय कर्मचारियों की वर्तमान न्यूनतम बेसिक सैलरी 18000 रुपये से बढ़कर सीधे 49500 रुपये हो जाएगी. इसके विपरीत यदि आयोग कर्मचारी संगठनों की मांगों पर पूरी तरह सहमति जताते हुए फिटमेंट फैक्टर को 3.5 के स्तर पर निर्धारित कर देता है, तो न्यूनतम बेसिक सैलरी उछलकर सीधे 63000 रुपये के स्तर पर पहुंच जाएगी.
इन दोनों स्थितियों के बीच सीधा 13500 रुपये का बड़ा अंतर देखने को मिलता है. यही मुख्य वजह है कि सभी कर्मचारी यूनियन और संगठन एकजुट होकर सरकार से अधिक से अधिक फिटमेंट फैक्टर लागू करने का दबाव बना रहे हैं. अगर पुराने वेतन आयोगों के इतिहास पर नजर डालें तो छठे वेतन आयोग के समय 1.86 का फिटमेंट फैक्टर तय किया गया था. वहीं सातवें वेतन आयोग के दौरान इसे बढ़ाकर 2.57 कर दिया गया था. अब आठवें वेतन आयोग से कर्मचारियों को उम्मीद है कि सरकार इस बार 3.5 के आंकड़े को छूने की कोशिश करेगी ताकि कर्मचारियों के हाथों में बेहतर तनख्वाह आ सके.
महंगाई भत्ते के नियमों और गणना पद्धति में सुधार की वकालत
वेतन वृद्धि के अलावा इस बैठक में महंगाई भत्ते यानी डीए को लेकर भी कई बुनियादी बदलावों की मांग रखी गई है. नेशनल काउंसिल ज्वाइंट कंसल्टेटिव मशीनरी ने आयोग के सामने यह बात रखी है कि डीए तय करने के लिए मौजूदा 12 महीने के औसत की व्यवस्था को बदला जाना चाहिए.
इसकी जगह पर पिछले 6 महीने के औसत प्राइस इंडेक्स को आधार बनाया जाए. संगठनों का कहना है कि 6 महीने का औसत लेने से बाजार में बढ़ती महंगाई को तेजी से और अधिक सटीकता से ट्रैक किया जा सकेगा, जिससे कर्मचारियों को समय रहते महंगाई का उचित लाभ मिल सकेगा.
इसके साथ ही एक और बेहद अहम मांग यह उठाई गई है कि जैसे ही महंगाई भत्ता 25 प्रतिशत के आंकड़े पर पहुंचे, वैसे ही उसे सीधे मूल वेतन में जोड़ दिया जाए यानी उसका विलय कर दिया जाए. वर्तमान नियमों में केंद्रीय कर्मचारियों के लिए ऐसा कोई स्वतः विलय का नियम लागू नहीं है. इसके अलावा कुछ कर्मचारी यूनियनों ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि साल में केवल दो बार यानी जनवरी और जुलाई में डीए बढ़ाने के बजाय इसे हर तिमाही यानी साल में कुल चार बार बढ़ाया जाना चाहिए. ऐसा होने से दैनिक जीवन में तेजी से बढ़ते खर्चों से निपटने में कर्मचारियों को भारी मदद मिलेगी.
फैमिली यूनिट पांच करने और अन्य भत्तों में बदलाव की मांग
कर्मचारियों की न्यूनतम जरूरत और वेतन तय करने में फैमिली यूनिट का नियम बहुत बड़ा आधार बनता है. वर्तमान व्यवस्था में केवल तीन सदस्यों को एक फैमिली यूनिट माना जाता है, जिसमें कर्मचारी, जीवनसाथी और बच्चे शामिल होते हैं. कर्मचारी संगठनों का पुरजोर तर्क है कि अब फैमिली यूनिट की संख्या को 3 से बढ़ाकर 5 किया जाना चाहिए. इसके पीछे बहुत ठोस वजह यह है कि हर कर्मचारी के ऊपर अपने वृद्ध माता पिता के भरण पोषण, देखभाल और इलाज की पूरी जिम्मेदारी होती है. इसलिए माता पिता को भी इस गणना में शामिल करना सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद जरूरी है.
पारिवारिक इकाई के अलावा कर्मचारियों के करियर में स्थिरता को रोकने के लिए चयन वेतनमान के नियमों में संशोधन की बात कही गई है. मौजूदा नियमों के अनुसार चयन वेतनमान का लाभ पाने के लिए कर्मचारी को 10 साल तक इंतजार करना पड़ता है, जिसे घटाकर हर 5 साल में लागू करने का सुझाव दिया गया है.
इसके साथ ही आवास किराया भत्ता यानी एचआरए को भी वर्तमान बाजार के अनुसार बढ़ाने की मांग उठाई गई है. संगठनों का कहना है कि निचले और शुरुआती स्तर पर सेवा देने वाले कर्मचारियों को अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा मकान के किराए पर खर्च करना पड़ता है, इसलिए शुरुआती स्तर के कर्मचारियों के लिए एचआरए की दरों में विशेष बढ़ोतरी की जानी चाहिए ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें.
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Burka-Hijab Ban: इटली में बैन होगा बुर्का और नकाब, खुद मेलोनी ने की घोषणा
Burka-Hijab Ban: इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने रविवार को स्कूलों में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की. मेलोनी ने कहा कि उनकी सरकार जल्द ही इससे संबंधित प्रस्ताव कैबिनेट के सामने पेश करेगी. प्रस्ताव में स्कूलों में चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर रोक लगाने के साथ-साथ कक्षाओं में विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने की योजना भी शामिल है.
मेलोनी ने यह घोषणा अपनी पार्टी ब्रदर्स ऑफ इटली की युवा शाखा के एक कार्यक्रम में की. उन्होंने कहा कि इटली में पढ़ने वाले छात्रों को देश की भाषा, संस्कृति और नियमों को समझना जरूरी है. सरकार का तर्क है कि स्कूलों में बच्चों के बीच बेहतर सामाजिक और भाषाई एकीकरण के लिए यह कदम उठाया जा रहा है.
स्कूलों में चेहरा ढकने पर रोक
प्रस्तावित नियम के तहत स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने पर रोक लगाई जाएगी. बुर्का ऐसा परिधान है, जो शरीर और चेहरे को ढकता है, जबकि नकाब चेहरे को ढकता है और आम तौर पर केवल आंखें दिखाई देती हैं. मेलोनी ने कहा कि स्कूल में छात्रों का चेहरा खुला होना चाहिए. हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह प्रस्ताव हिजाब पर प्रतिबंध के समान नहीं है. हिजाब आम तौर पर सिर और गर्दन को ढकता है, जबकि चेहरा खुला रहता है. Reuters की रिपोर्ट में भी मेलोनी के प्रस्ताव को मुख्य रूप से बुर्का और नकाब जैसे चेहरे को ढकने वाले परिधानों से संबंधित बताया गया है.
विदेशी छात्रों की संख्या भी होगी सीमित
मेलोनी सरकार स्कूलों में विदेशी छात्रों की संख्या को लेकर भी नया नियम लाने की तैयारी कर रही है. इसके तहत हर कक्षा में विदेशी छात्रों की अधिकतम संख्या तय करने का प्रस्ताव है. हालांकि, प्रधानमंत्री ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि एक कक्षा में कितने विदेशी छात्रों को अनुमति दी जाएगी. इसके साथ ही ऐसे विदेशी छात्रों के माता-पिता के लिए इतालवी भाषा सीखना अनिवार्य करने का प्रस्ताव भी है, जिनके बच्चों को स्कूल व्यवस्था में शामिल होने में गंभीर कठिनाई हो रही है. मेलोनी का कहना है कि इटली में अपना भविष्य बनाने की इच्छा रखने वाले लोगों को इतालवी भाषा और संस्कृति को समझना चाहिए.
इटली में पहले से चल रही है बहस
इटली में प्रवासन और प्रवासियों के सामाजिक एकीकरण का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है. भूमध्यसागर के रास्ते बड़ी संख्या में प्रवासियों के पहुंचने के कारण यह मुद्दा सरकारों के सामने महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है. धार्मिक प्रतीकों, नागरिकता और सांस्कृतिक एकीकरण को लेकर भी देश में अलग-अलग मत हैं.
आंकड़ों के अनुसार, इटली के स्कूलों में गैर-इतालवी नागरिक छात्रों की हिस्सेदारी करीब 11.6 प्रतिशत है. विदेशी छात्रों की संख्या को लेकर पहले से भी कुछ नियम मौजूद हैं और नए प्रस्ताव के जरिए सरकार इस व्यवस्था को और कानूनी रूप देना चाहती है.
कानून बनने के लिए आगे की प्रक्रिया बाकी
मेलोनी की घोषणा के बाद प्रस्ताव को पहले सरकार के सामने रखा जाएगा. इसके बाद इसे कानून का रूप देने के लिए संसदीय प्रक्रिया से गुजरना होगा. रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार से मंजूरी मिलने के बाद संसद की स्वीकृति जरूरी होगी. इसलिए फिलहाल इसे प्रस्तावित नियम के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि ऐसा कानून जो उसी समय पूरे देश में लागू हो गया हो. इटली सरकार के इस कदम से स्कूलों में धार्मिक पहनावे, प्रवासी छात्रों के एकीकरण और शिक्षा व्यवस्था को लेकर बहस आगे बढ़ने की संभावना है.
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