Explainer: हम दो हमारे दो का दौर खत्म! भारत में तेजी से घट रही जन्म दर; अब जनसंख्या बढ़ाने पर मंथन
Population Control Policy: भारत भले ही दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, लेकिन देश की जनसंख्या की तस्वीर तेजी से बदल रही है. दशकों तक भारत में बढ़ती आबादी को विकास के रास्ते की बड़ी चुनौती माना गया. इसी सोच के तहत परिवार नियोजन, नसबंदी और छोटे परिवार को बढ़ावा देने वाली नीतियां लागू की गईं. 'हम दो, हमारे दो' जैसे अभियान भी इसी सोच का हिस्सा रहे.
लेकिन अब कई राज्यों में हालात बदल चुके हैं. परिवार छोटे हो रहे हैं, प्रजनन दर लगातार घट रही है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद यानी EAC-PM की सितंबर 2026 की वर्किंग पेपर 'The Ghost of Population Past: How Population Control Persists in India' ने इसी बदलती स्थिति पर ध्यान खींचा है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के सामने अब सिर्फ बढ़ती आबादी की चुनौती नहीं है. कई राज्यों में आने वाले वर्षों में कम होती युवा आबादी और बढ़ती बुजुर्ग आबादी ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है.
भारत की प्रजनन दर 2.1 से नीचे पहुंची
रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल प्रजनन दर यानी TFR अब 1.9 है. किसी देश में आबादी को लंबे समय तक स्थिर रखने के लिए 2.1 का प्रजनन दर स्तर सामान्य तौर पर प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है.
आसान भाषा में समझें तो अगर प्रजनन दर लगातार 2.1 से नीचे रहती है, तो आने वाली पीढ़ियों में लोगों की संख्या धीरे-धीरे कम होने की स्थिति बन सकती है.
भारत में हालांकि राज्यों के बीच काफी बड़ा अंतर है. उत्तर प्रदेश में TFR 2.6 और बिहार में 2.9 है. लेकिन इन दोनों राज्यों को छोड़ दें तो बाकी भारत में यह दर करीब 1.6 रह जाती है.
दक्षिण और कुछ अन्य राज्यों में स्थिति और कम है.
- केरल और तमिलनाडु: 1.3
- आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र: 1.4
- कर्नाटक और तेलंगाना: 1.5
- पश्चिम बंगाल: 1.3
- दिल्ली: 1.2
- सिक्किम: 1.0
यानी देश के कई हिस्सों में प्रजनन दर लंबे समय से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी हुई है.
बच्चे कम पैदा हो रहे हैं, फिर आबादी बढ़ क्यों रही है?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है. अगर भारत में बच्चे कम पैदा हो रहे हैं तो देश की कुल आबादी अभी भी क्यों बढ़ रही है? इसका जवाब जनसांख्यिकीय गति यानी Population Momentum में छिपा है.
भारत में पहले की पीढ़ियों में प्रजनन दर काफी ज्यादा थी. उस दौर में पैदा हुई बड़ी आबादी अब युवा या कामकाजी उम्र में है. इसलिए आज प्रजनन दर कम होने के बावजूद कुल आबादी कुछ समय तक बढ़ती रह सकती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आबादी हमेशा बढ़ती रहेगी. जैसे-जैसे कम जन्म वाली नई पीढ़ियां बड़ी होंगी, आबादी की उम्र का ढांचा भी बदलेगा.
जिन राज्यों में प्रजनन दर लंबे समय से कम है, वहां मध्य आयु करीब 35 वर्ष तक पहुंच चुकी है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह करीब 30 वर्ष है. इसका सीधा असर भविष्य में कामकाजी आबादी और बुजुर्गों की संख्या पर पड़ सकता है.
हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या में भी बड़ी गिरावट
भारत में सिर्फ प्रजनन दर ही नहीं घटी है, बल्कि हर साल पैदा होने वाले बच्चों की संख्या भी कम हुई है. रिपोर्ट के अनुसार 2001 में भारत में करीब 2.93 करोड़ बच्चे पैदा हुए थे. 2023 तक यह संख्या घटकर करीब 2.32 करोड़ रह गई. यानी करीब दो दशकों में सालाना जन्मों की संख्या लगभग 20 फीसदी कम हुई. रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में पैदा हुए बच्चों की संख्या करीब 1974 के स्तर के बराबर थी. यह बदलाव बताता है कि भारत की जनसंख्या की कहानी अब सिर्फ बढ़ती संख्या की कहानी नहीं रह गई है.
आने वाले समय में बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी
प्रजनन दर में लगातार गिरावट का एक बड़ा असर आबादी की उम्र पर पड़ता है. जब बच्चों की संख्या कम होती है और लोग ज्यादा उम्र तक जीवित रहते हैं, तो कुल आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ने लगती है.
उदाहरण के लिए, रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश में 2036 तक 0 से 14 वर्ष की आबादी का हिस्सा 16 फीसदी से नीचे जा सकता है, जबकि 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी करीब 19 फीसदी हो सकती है.
इसका मतलब है कि भविष्य में राज्यों को सिर्फ बच्चों की शिक्षा और युवाओं के रोजगार पर ही नहीं, बल्कि बुजुर्गों की स्वास्थ्य सुविधाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर भी ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है.
दो-बच्चे की नीति पर भी बदल रहा रुख
जिस समय भारत की आबादी तेजी से बढ़ रही थी, उस समय कुछ राज्यों ने दो से ज्यादा बच्चे वाले लोगों पर सरकारी नौकरी, स्थानीय निकाय चुनाव और कुछ सरकारी सुविधाओं से जुड़ी पाबंदियां लगाईं. अब कम प्रजनन दर वाले राज्यों में ऐसी नीतियों पर दोबारा विचार किया जा रहा है.
आंध्र प्रदेश ने नवंबर 2024 में दो-बच्चे से जुड़ी शर्त हटाई. इसके बाद तेलंगाना ने जनवरी 2026, राजस्थान ने मार्च 2026 और मध्य प्रदेश ने जून 2026 में ऐसे नियमों को हटाया. हालांकि, असम जैसे कुछ राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले लोगों के लिए कुछ प्रतिबंध अभी भी लागू हैं.
आंध्र प्रदेश में नीति का रुख कैसे बदला?
आंध्र प्रदेश इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में करीब 70 फीसदी विवाहित महिलाओं की नसबंदी हो चुकी है. पहले राज्य में नसबंदी को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता था. लेकिन अब नीति का रुख बदलता दिखाई दे रहा है. 2026-27 में पुरुष और महिला नसबंदी के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण का प्रावधान नहीं रखा गया. वहीं राज्य के प्रस्तावित जनसंख्या प्रबंधन कार्यक्रम में ज्यादा बच्चों वाले परिवारों को प्रोत्साहन देने की बात कही गई है.
प्रस्ताव के मुताबिक:
- दूसरे बच्चे के जन्म पर एक बार ₹2,000 की सहायता.
- तीसरे बच्चे के लिए पांच साल तक हर महीने ₹1,000 देने का प्रस्ताव.
- तीन या उससे ज्यादा बच्चों वाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाने का प्रस्ताव.
- ऐसे परिवारों को आजीवन स्वास्थ्य बीमा देने की बात.
इन प्रस्तावित प्रोत्साहनों पर सालाना करीब ₹1,000 करोड़ खर्च होने का अनुमान बताया गया है.
तमिलनाडु में दिखा नीति का विरोधाभास
तमिलनाडु में भी जनसंख्या नीति को लेकर बदलाव की तस्वीर दिखाई देती है. अगस्त 2026 में राज्य ने सरकारी महिला कर्मचारियों के लिए तीसरे बच्चे के जन्म पर मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर एक साल कर दिया. लेकिन दूसरी तरफ 2026-27 के बजट में करीब 1.6 लाख महिला नसबंदी के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण का प्रावधान भी था.
EAC-PM के पेपर में इसे बदलती जनसंख्या नीति के बीच एक विरोधाभास के रूप में देखा गया है. यानी एक तरफ ज्यादा बच्चों को प्रोत्साहित करने की कोशिश और दूसरी तरफ नसबंदी को बढ़ावा देने वाली पुरानी व्यवस्था साथ-साथ चल रही है.
समाज की सोच सरकार की नीतियों से पहले बदल गई
भारत में छोटे परिवार की सोच सिर्फ सरकारी अभियानों की वजह से नहीं बदली है. शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, रोजगार और जीवनशैली में बदलाव ने भी परिवार के आकार को प्रभावित किया है.
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के मुताबिक ज्यादातर भारतीयों की आदर्श परिवार आकार की पसंद पहले ही दो या उससे कम बच्चों तक पहुंच चुकी है.
SRS 2024 के मुताबिक पहले बच्चे के जन्म के समय औसत उम्र 28.4 वर्ष हो गई है. 2011 में यह 21.2 वर्ष थी. यानी आज लोग पहले की तुलना में शादी और बच्चे पैदा करने में ज्यादा समय ले रहे हैं और छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं.
EAC-PM ने पुरानी नीतियों में बदलाव की सलाह दी
रिपोर्ट में कहा गया है कि कम प्रजनन दर वाले राज्यों में पुरानी जनसंख्या नियंत्रण नीतियों की समीक्षा की जरूरत है.
रिपोर्ट में प्रमुख सुझाव हैं:
- नसबंदी कराने पर मिलने वाले प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ और मजदूरी के नुकसान के मुआवजे को खत्म करना.
- दो बच्चों तक परिवार सीमित रखने से जुड़े ASHA प्रोत्साहनों में बदलाव करना.
- सरकारी नौकरी और स्थानीय निकाय चुनावों में दो-बच्चे की शर्त के आधार पर अयोग्यता खत्म करना.
- कम प्रजनन दर वाले राज्यों में मिशन परिवार विकास की भूमिका को बदलना.
- सरकारी नीतियों से 'जनसंख्या नियंत्रण', 'जनसंख्या घटाने' और 'प्रजनन दर कम करने' जैसी भाषा को हटाने पर विचार करना.
क्या परिवार नियोजन भी खत्म करने की बात है?
यह अंतर समझना जरूरी है. रिपोर्ट परिवार नियोजन को खत्म करने की बात नहीं करती. गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता, महिलाओं का स्वास्थ्य और बच्चों के बीच सुरक्षित अंतर आज भी जरूरी हैं.
रिपोर्ट का मुख्य तर्क यह है कि परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण एक जैसी चीजें नहीं हैं. परिवार नियोजन का मकसद लोगों को अपनी इच्छा और स्वास्थ्य जरूरत के अनुसार परिवार का आकार तय करने में मदद करना है. वहीं जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य पूरी आबादी की प्रजनन दर को कम करना होता है.
भारत के लिए अब चुनौती क्या है?
भारत की जनसंख्या की कहानी अब बदल रही है. कुछ राज्यों में अभी भी आबादी और प्रजनन दर ज्यादा है, जबकि कई राज्यों में बच्चे कम पैदा हो रहे हैं और बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है.
इसलिए आने वाले समय में भारत के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं होगा कि 'देश में कितने लोग हैं?' बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि 'देश में कितने युवा हैं, कितने लोग काम करने की उम्र में हैं और कितने बुजुर्ग हैं?'
युवा आबादी कम होने का असर रोजगार बाजार, उद्योग और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है. वहीं बुजुर्ग आबादी बढ़ने से स्वास्थ्य, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ सकता है.
कई हिस्सों में बदल चुकी है स्थिति
कुल मिलाकर भारत में कभी तेजी से बढ़ती आबादी को बड़ी चुनौती माना जाता था. उसी दौर में परिवार छोटा रखने, नसबंदी और दो-बच्चे की नीतियों पर जोर दिया गया. लेकिन आज देश के कई हिस्सों में स्थिति बदल चुकी है. प्रजनन दर 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जा चुकी है, सालाना जन्मों की संख्या घट रही है और कई राज्यों में बुजुर्ग आबादी का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है.
ऐसे में EAC-PM की रिपोर्ट का संदेश यह है कि भारत की जनसंख्या नीति को पुराने दौर की चिंताओं के बजाय आज की वास्तविक जनसांख्यिकीय स्थिति के हिसाब से तैयार करने की जरूरत है. इसका मतलब परिवार नियोजन खत्म करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी नीतियां लोगों की पसंद, स्वास्थ्य और बदलती आबादी की जरूरतों के अनुरूप हों.
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