पेरेंटिंग- परीक्षा में बेटे के मार्क्स अच्छे नहीं:कहीं उसका IQ कमजोर तो नहीं, कैसे पता लगाएं, क्या IQ टेस्ट कराना ठीक है
सवाल- मैं बैंगलोर से हूं। मेरा 12 साल का बेटा क्लास 6 में है। मैथ और साइंस में उसके बहुत मार्क्स बहुत कम आते हैं। मेरे दोस्तों ने सुझाया कि बच्चे का IQ टेस्ट कराओ, ताकि पता चले कि उसके इंटेलिजेंस का लेवल क्या है। लेकिन मुझे डर है कि इस टेस्ट से उसका कॉन्फिडेंस कम न हो जाए। क्या बच्चों का IQ टेस्ट कराना चाहिए? क्या इससे सचमुच फायदा होगा? बिना प्रेशर डाले बच्चे को पढ़ाई के लिए कैसे प्रेरित करें? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी इस दुविधा को पूरी तरह समझ सकती हूं। बतौर पेरेंट बच्चे के स्कूल मार्क्स देखकर चिंता होना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि 12 साल की उम्र में एवरेज मार्क्स आना कोई असामान्य बात नहीं है। इस उम्र में बच्चे सीखने की प्रक्रिया में होते हैं और मैथ व साइंस जैसे विषयों में परेशानी बहुत आम है। हालांकि सही मार्गदर्शन, धैर्य और सपोर्ट मिलने पर यही बच्चे आगे चलकर बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं। बच्चे के कम मार्क्स के पीछे कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। जैसेकि- इसलिए केवल एवरेज मार्क्स के आधार पर बच्चे को जज करना या उस पर दबाव बनाना सही नहीं है। इसके अलावा हो सकता है कि आपका बेटा अन्य विषयों या किसी दूसरे क्षेत्रों में बहुत अच्छा हो। कई बच्चे म्यूजिक, पेंटिंग, खेल या किसी क्रिएटिव फील्ड में कमाल करते हैं। इसलिए सबसे पहले बच्चे की रुचियों और उसकी क्षमताओं को समझने की कोशिश कीजिए। अक्सर माता-पिता यही गलती करते हैं। वे बच्चों को अपनी इच्छानुसार डॉक्टर, इंजीनियर और IAS वगैरह बनाना चाहते हैं। इस कोशिश में वे बच्चे की रुचियों, क्षमताओं और स्वभाव को नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि पढ़ाई के शुरुआती दौर में बच्चे को दिशा देने से ज्यादा, उन्हें समझने और भावनात्मक रूप से सपोर्ट करने की जरूरत होती है। बच्चे जैसे हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार करना पेरेंटिंग की पहली सीढ़ी है। हर बच्चे की अपनी एक पहचान होती है और अपनी खास रुचियां होती हैं। पेरेंटिंग का मतलब उसे किसी तय ढांचे में ढालना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उन्हें निखरने का मौका देना है। इसी सोच के साथ आगे बढ़िए और पेरेंटिंग की कुछ प्राइमरी जिम्मेदारियों पर ध्यान दीजिए। अब आते हैं IQ टेस्ट यानी ‘इंटेलिजेंस कोशेंट’ टेस्ट के सवाल पर कि ये क्या है, कैसे काम करता है, कब जरूरी है और अगर स्कोर कम आए तो क्या करें? तो चलिए, स्टेप-बाय-स्टेप इसे समझते हैं। इंटेलिजेंस क्या है? इंटेलिजेंस वह क्षमता है, जिससे बच्चा सोचता-समझता है, समस्या का समाधान करता है और नए हालात में खुद को ढालता है। कोई बच्चा पढ़ाई में तेज होता है, कोई खेल में, कोई म्यूजिक या आर्ट में, तो कोई लोगों को समझने और उनसे जुड़ने में। हर बच्चे की इंटेलिजेंस अलग होती है। उसे सिर्फ किताबों और मार्क्स से नहीं मापा जा सकता है। यह बहुत सारी क्षमताओं का मेल है। जैसेकि- IQ टेस्ट क्या है? IQ टेस्ट यानी ’इंटेलिजेंस कोशेंट’ टेस्ट से बच्चे की सोचने-समझने, तर्क करने और समस्या सुलझाने की क्षमता का पता लगाया जाता है। यह टेस्ट मुख्य रूप से लॉजिकल थिंकिंग, मैथमैटिकल अंडरस्टैंडिंग, मेमोरी और प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल को मापता है। हालांकि IQ टेस्ट में इमोशनल इंटेलिजेंस, क्रिएटिविटी, सोशल स्किल्स और टैलेंट जैसे कई पहलू नहीं शामिल होते हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) के मुताबिक, IQ टेस्ट इंटेलिजेंस के सिर्फ कुछ हिस्सों को ही मापता है। यह बच्चे के आसपास के वातावरण, सीखने की प्रक्रिया और पहले से मिली जानकारी से प्रभावित होता है। IQ टेस्ट क्या मापता है? IQ टेस्ट की शुरुआत वर्ष 1905 में फ्रांस के साइकोलॉजिस्ट अल्फ्रेड बिने और थियोडोर साइमन ने की थी। इसका मकसद बच्चों की स्कूल रेडिनेस जांचना था। यानी बच्चा सीखने के लिए कितना तैयार है। समय के साथ यह साफ हुआ कि IQ स्कोर कई बातों से प्रभावित होता है। जैसे बच्चे का माहौल, भाषा, एक्सपोजर और उस दिन का मूड। इसलिए IQ को बच्चे की स्मार्टनेस का पूरा पैमाना मानना सही नहीं है। एक अच्छा स्टैंडर्डाइज्ड IQ टेस्ट बच्चे की कई क्षमताओं को परखता है। इसे नीचे दिए ग्राफिक से समझिए- IQ टेस्ट कब कराना चाहिए? IQ टेस्ट हर बच्चे के लिए जरूरी नहीं है। अगर बच्चा सिर्फ एवरेज नंबर लाता है, फोकस में दिक्कत है या उसे मैथ मुश्किल लगती है तो IQ टेस्ट की जरूरत नहीं है। हालांकि कुछ स्थितियों में IQ टेस्ट कराना सही माना जाता है। भारत में कुछ IQ टेस्ट किए जाते हैं, जो भारतीय बच्चों और उनके माहौल को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। ध्यान रखें, ऑनलाइन IQ टेस्ट भरोसेमंद नहीं होते हैं। टेस्ट का सही और सटीक मूल्यांकन हमेशा प्रशिक्षित साइकोलॉजिस्ट द्वारा ही किया जाना चाहिए। IQ स्कोर कैसे समझें? IQ स्कोर को एक इंडिकेटर की तरह समझना चाहिए, जजमेंट की तरह नहीं। यह बताता है कि बच्चा सोचने-समझने, तर्क करने और कुछ खास तरह की जानकारी को कितनी तेजी से प्रोसेस करता है। लेकिन यह नहीं बताता कि बच्चा कितना क्रिएटिव है या किस फील्ड में बेहतर कर सकता है। इसलिए IQ स्कोर को सिर्फ बच्चे की प्रोफाइल के एक हिस्से की तरह देखना चाहिए। नीचे दिए ग्राफिक से IQ स्कोर इंटरप्रिटेशन समझिए- IQ स्कोर लो आए तो क्या करें? अगर बच्चे का IQ स्कोर थोड़ा कम आए तो इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चा कमजोर है। यह बस यह बताता है कि उसे किस क्षेत्र में सपोर्ट की जरूरत है। हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एजुकेशन की एक रिसर्च के मुताबिक, पॉजिटिव रीइनफोर्समेंट से बच्चों की परफॉर्मेंस लगभग 25% तक बेहतर होती है। वहीं ज्यादा प्रेशर और स्ट्रेस उनके सीखने की प्रक्रिया को ब्लॉक कर देता है। इसलिए बच्चों के साथ धैर्य, समझ और प्रोत्साहन बेहद जरूरी है। इसके लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखें। अंत में यही कहूंगी कि आपका बेटा 12 साल का है। इस उम्र में अगर पेरेंट्स का सही सपोर्ट मिले तो बच्चे बहुत तेजी से सीखते हैं। अगर वह हेल्दी है, सामान्य तरीके से सीख रहा है तो IQ टेस्ट की कोई जरूरी नहीं है। आपका लक्ष्य बच्चे को स्मार्ट साबित करना नहीं, बल्कि स्मार्ट तरीके से सीखने में मदद करना होना चाहिए। ........................ पेरेंटिंग से जुड़ी ये स्टोरी भी पढ़िए पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा पॉकेट मनी मांगता है: क्योंकि उसके दोस्तों को मिलती है, क्या इतने छोटे बच्चे को पैसे देना ठीक है? जब बच्चा अपने दोस्तों को पॉकेट मनी लाते हुए देखता है तो तुलना करना स्वाभाविक है। ऐसे में उसे डांटें नहीं, बल्कि समझाएं कि हर परिवार के नियम, जरूरतें और आर्थिक स्थिति अलग होती है। पूरी खबर पढ़िए...
जरूरत की खबर- तिल, गुड़, मूंगफली को क्यों कहते सुपरफूड:संक्रांति पर खाने की परंपरा, विटामिन्स से भरपूर, जानें हेल्थ बेनिफिट्स
मकर संक्रांति यानी ठंड की विदाई का संदेश। इस दिन भगवान सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसे भारत में त्योहार के रूप में मनाया जाता है। हर राज्य में इसे अलग-अलग नाम से मनाया जाता है- कहीं पोंगल, कहीं खिचड़ी तो कहीं मकर संक्रांति, लोहड़ी और उत्तरायण। देश के हर हिस्से में इसके नाम जरूर अलग हैं पर पूरे देश में इस दिन तिल और गुड़ खाने की परंपरा एक जैसी ही है। इस दिन मूंगफली भी खाई जाती है। तिल, गुड़ और मूंगफली, तीनों चीजें सुपरफूड हैं। इनसे बनी चीजें खाने में जितनी स्वादिष्ट होती हैं, सेहत के लिए भी उतनी फायदेमंद होती हैं। तिल और मूंगफली में प्रोटीन, विटामिन और ओमेगा 6 जैसे न्यूट्रिएंट्स होते हैं। वहीं गुड़ में आयरन, मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे महत्वपूर्ण मिनरल्स होते हैं। इसलिए ‘जरूरत की खबर’ में मकर संक्रांति पर खाए जाने वाले तिल, गुड़ और मूंगफली की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- तिल-गुड़ के लड्डू खाने की परंपरा मकर संक्रांति के दिन लोग तिल और गुड़ के लड्डू खाते हैं। पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्र में शाम को घर के सभी लोग अलाव जलाकर गीत गाते हैं और मूंगफली खाते हैं। ये सभी चीजें खाना सर्दियों में बेहद फायदेमंद है। ये हैं सर्दियों के सुपरफूड इन तीनों सुपरफूड्स की तासीर गर्म होती है। इसलिए इन्हें सर्दियों का सुपरफूड भी कहते हैं। इनकी न्यूट्रिशनल वैल्यू इन्हें और खास बनाती है। आइए सभी चीजों की न्यूट्रिशनल वैल्यू और फायदे जानते हैं। गुड़ की न्यूट्रिशनल वैल्यू गुड़ में सुक्रोज और फ्रुक्टोज के रूप में शुगर होता है। इसलिए इसका स्वाद मीठा होता है और इसे खाने से तुरंत एनर्जी मिलती है। गुड़ में शरीर के लिए जरूरी विटामिन A, C और E होते हैं। इसमें आयरन समेत कई जरूरी मिनरल्स भी होते हैं। ग्राफिक में देखिए: गुड़ खाने के 10 बड़े फायदे तिल की न्यूट्रिशनल वैल्यू तिल में भरपूर मात्रा में कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन और पोटेशियम जैसे मिनरल्स होते हैं। इसमें विटामिन B6 भी होता है। शरीर की रोजाना जरूरत के कितने मिनरल्स तिल खाने से मिलते हैं, ग्राफिक में देखिए: तिल खाने के 10 बड़े फायदे मूंगफली की न्यूट्रिशनल वैल्यू मूंगफली में प्रोटीन, फैट समेत कई हेल्दी न्यूट्रिएंट्स होते हैं। कई जरूरी विटामिन और मिनरल्स भी होते हैं। ग्राफिक में देखिए: मूंगफली खाने के 10 बड़े फायदे तिल, गुड़ और मूंगफली से जुड़े कुछ कॉमन सवाल और उनके जवाब सवाल: क्या तिल और मूंगफली में मौजूद फैट से दिल की सेहत खराब होती है? जवाब: नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होता है। लोगों को इस बात का भ्रम है कि फैट से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जबकि असल में ट्रांस फैट, सैचुरेटेड फैट से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। तिल और मूंगफली में मौजूद हेल्दी फैट हमें सेहतमंद बनाता है। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, तिल और मूंगफली में मौजूद हेल्दी फैट कोलेस्ट्रॉल और ट्रायग्लिसराइड्स को कम करने में मददगार है। इससे हार्ट हेल्थ इंप्रूव होती है। सवाल: क्या तिल और मूंगफली खाने से बाल झड़ने लगते हैं? जवाब: नहीं, यह सच नहीं है। इसके उलट तिल और मूंगफली खाने से हेयरफॉल रुक सकता है। इनके सेवन से बालों के विकास में भी मदद मिलती है। तिल में मौजूद ओमेगा-3, ओमेगा-6 और ओमेगा-9 फैटी एसिड से स्काल्प के ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। इससे बालों की जड़ों को जरूरी पोषक तत्व और ऑक्सीजन मिलता है। तिल और मूंगफली में भरपूर मात्रा में कॉपर, फास्फोरस, जिंक, आयरन, विटामिन B1 और मैग्नीशियम होता है। इससे स्काल्प हेल्दी रहता है और हेयरफॉल कम होता है। सवाल: क्या तिल और मूंगफली खाने से कुछ नुकसान भी हो सकते हैं? जवाब: हां, कुछ लोगों को मूंगफली और तिल से एलर्जी हो सकती है। तिल की एलर्जी के कारण उल्टी हो सकती है और ब्रीदिंग प्रॉब्लम हो सकती है। इससे कब्ज हो सकता है और अपेंडिक्स में दर्द हो सकता है। तिल में साइकोएक्टिव कंपाउंड THC होता है। यह ड्रग्स टेस्ट होने पर सामने आ सकता है। इसलिए ज्यादातर प्रोफेशनल स्पोर्ट्स पर्सन तिल खाने से बचते हैं। मूंगफली खाने से कुछ लोगों को एनाफिलेक्सिस नाम का गंभीर एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है। कई बार यह लाइफ थ्रेटनिंग भी होता है। इसके कारण स्किन में रैशेज हो सकते हैं और सूजन हो सकती है। ब्लड प्रेशर अचानक कम हो सकता है। इससे स्टमक इन्फेक्शन हो सकता है। सांस लेने में समस्या हो सकती है। सवाल: क्या डायबिटिक लोग तिल, गुड़ और मूंगफली से बनी चीजें खा सकते हैं? जवाब: डायबिटिक लोग तिल और मूंगफली बहुत आराम से खा सकते हैं। इसका हेल्दी फैट इंसुलिन स्पाइक और शुगर लेवल को कंट्रोल रखने में भी मददगार है। हालांकि उन्हें गुड़ और गुड़ से बनी चीजें बिल्कुल नहीं खानी चाहिए। डायबिटीज में लो ग्लाइसेमिक फूड खाने की सलाह दी जाती है, जबकि गुड़ हाई ग्लाइसेमिक फूड है। इससे शुगर स्पाइक हो सकता है। ……………… ये खबर भी पढ़िए जरूरत की खबर- सर्दियों में बढ़ती टूथ सेंसिटिविटी: दांतों में ये 5 संकेत दिखें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं, 15 टूथ केयर टिप्स सर्दियों में दांतों में सेंसिटिविटी की शिकायतें अचानक ज्यादा हो जाती हैं। बाहर की ठंडी हवा मुंह में जाती है तो दांतों में तेज झनझनाहट और चुभन महसूस होती है। अक्सर लोग इसे हल्के में लेते हैं। आगे पढ़िए..
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