गुजरात के Wadia गांव में बच्चियों को देह व्यापार से बचाने के लिए कम उम्र में सगाई की प्रथा
(गुंजन शर्मा) वाडिया (गुजरात), 20 सितंबर बचपन में ‘सगाई’ या देह व्यापार...गुजरात के वाडिया गांव में कई बच्चियों के सामने मानो जीवन की राह इन्हीं दो विकल्पों के बीच सिमटकर रह गई है। देह व्यापार से जुड़ी अपनी पुरानी पहचान का बोझ ढो रहे इस गांव में यह किसी गुजरे दौर की कहानी नहीं, बल्कि आज की हकीकत है। यहां कई परिवार अपनी बेटियों को उस दलदल से बचाने की कोशिश में महज सात साल की उम्र में उनकी सगाई कर देते हैं, जिसमें पीढ़ियों से उनके परिवार की महिलाएं फंसती रही हैं।
अहमदाबाद से करीब 200 किलोमीटर दूर स्थित वाडिया उस भारत से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है, जहां लैंगिक समानता, शिक्षा और बेहतर भविष्य की आकांक्षाओं की बात होती है। यहां की महिलाएं उन भूमिकाओं की बेड़ियां तोड़ने के लिए संघर्ष कर रही हैं, जिन्हें इतिहास और सामाजिक परिस्थितियों ने पीढ़ियों से उनपर थोप रखा है। परंपरागत रूप से घुमंतू समुदाय के इस गांव में महिलाओं को दशकों से देह व्यापार में धकेला जाता रहा है, जबकि परिवार के पुरुष उनके लिए ‘ग्राहक’ तलाशने का काम करते रहे हैं।
यह सिलसिला आज भी पूरी तरह थमा नहीं है। बनासकांठा जिले के करीब 750 लोगों की आबादी वाले इस गांव के कुछ पुरुष हर सुबह पालनपुर-थराद राजमार्ग जाते हैं। वे वहां काम की तलाश में नहीं जाते, बल्कि ट्रक चालकों, राहगीरों और आसपास के गांवों एवं शहरों से आने वाले पुरुषों को अपने गांव की महिलाओं के लिए ‘‘ग्राहक बनाने’’ की कोशिश करते हैं।
भारत में बाल विवाह कानूनी रूप से प्रतिबंधित है, लेकिन वाडिया में कई परिवार अपनी बेटियों की कम उम्र में सगाई को एक तरह का सुरक्षा कवच मानते हैं- एक ऐसा रास्ता, जिससे वे शादी के बाद गांव से बाहर जा सकें और देह व्यापार में धकेले जाने से बच जाएं। विडंबना यह है कि एक कुप्रथा से बचने के लिए परिवारों को दूसरी सामाजिक बुराई का सहारा लेना पड़ रहा है। गांव में पली-बढ़ी 19-वर्षीय एक युवती इस अंतर्विरोध की कहानी अपने भीतर समेटे है।
उसकी मां और दादी देह व्यापार से जुड़ी रही हैं, लेकिन वह अब गांव से दूर एक कॉलेज में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है। अब उसकी शादी हो चुकी है। उसका विवाह जब तय हुआ था, उस समय उसकी आयु महज 11 साल थी।
युवती ने अपना नाम जाहिर न करने की शर्त पर ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘बचपन से मैंने अपने पिता और रिश्तेदारों को अपनी मां और दादी के लिए पुरुष ‘ग्राहकों’ को लाते देखा। मेरी मां ने मुझे बताया था कि ऐसा नहीं था कि उन्हें जबरन इसमें धकेला गया था। गरीबी के कारण यह यहां की सामान्य व्यवस्था बन गई थी और हर कोई उसी के अनुसार चलता था।
इस वजह से मेरी मां को यह भी पक्के तौर पर नहीं पता कि जिन्हें मैं अपना पिता मानती हूं, वही मेरे जैविक पिता हैं।’’ युवती ने कहा, ‘‘लेकिन मेरी मां ने तय किया कि वह मुझे इस रास्ते पर नहीं जाने देंगी। मेरी 11 साल की उम्र में सामूहिक समारोह में सगाई कर दी गई और 18 साल की उम्र में मेरी शादी हुई।’’ यह किसी एक लड़की की कहानी नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ परिवारों की पहल पर सात से 12 साल तक की लड़कियों की आसपास के गांवों या रिश्तेदारी में बाकायदा सगाई कराई जाती है।
गांव में एक तरह का अलिखित नियम बन चुका है कि जिन लड़कियों की सगाई या शादी हो गई है, उन्हें देह व्यापार में नहीं धकेला जाएगा। चंद्रा सरानिया नाम की एक महिला ने कहा, ‘‘जब मैंने अपनी बेटी की शादी कराने की बात कही तो मुझसे कहा गया कि यहां की लड़कियों की यही नियति है और मुझे इसके खिलाफ नहीं जाना चाहिए। मैंने अपनी बेटी की 12 साल की उम्र में सगाई कर दी और 18 साल की उम्र में उसकी शादी हो गई।’’ चंद्रा को महज 15 साल की उम्र में देह व्यापार में धकेल दिया गया था।
अब वह एक छोटी डेरी चलाती है। सरकार ने उसके परिवार को 1963 में खेती के लिए जमीन आवंटित की थी, लेकिन गांव में सिंचाई की सुविधा नहीं होने के कारण खेती आजीविका का भरोसेमंद साधन नहीं बन सकी और चंद्रा को देह व्यापार में शामिल होना पड़ा। चंद्रा ने इसी कमाई से अपने तीन बच्चों- दो बेटों और एक बेटी- की परवरिश की, लेकिन उसने मन में ठान लिया था कि उसका अतीत उसके बच्चों, खासकर बेटी, के भविष्य की दिशा तय नहीं करेगा।
गांव में 2012 में उस समय बदलाव की किरण दिखाई दी, जब गैर-सरकारी संगठनों ने कुछ परिवारों को अपनी बेटियों को देह व्यापार में नहीं धकेलने के लिए राजी किया और गांव में पहली बार सामूहिक विवाह समारोह आयोजित किया गया। तब से वाडिया में हर साल इस तरह के विवाह या सगाई समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। गैर-सरकारी संगठन ‘विचरता समुदाय समर्थन मंच’ (वीएसएसएम) की संस्थापक मित्तल पटेल ने कहा कि परिवारों को अपनी बेटियों को देह व्यापार में न धकेलने के लिए राजी करना आसान नहीं था, लेकिन लगातार कोशिशों से बदलाव आया है।
उन्होंने कहा कि सगाई के बाद लड़के का परिवार भी लड़की की सुरक्षा को लेकर सजग हो जाता है और इससे कम उम्र की लड़कियों को देह व्यापार में धकेले जाने से रोकने में मदद मिली है। पटेल के अनुसार, कुछ कार्यकर्ताओं को आशंका है कि कम उम्र में सगाई कराने की यह व्यवस्था बाल विवाह को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन देह व्यापार में धकेले जाने और सम्मानजनक जीवन की संभावना से वंचित रह जाने की तुलना में ऐसी सगाई परिवारों को बेहतर विकल्प नजर आती है। वाडिया की यह कहानी केवल आज की परिस्थितियों की नहीं है।
इसका एक सिरा इतिहास और लोककथाओं से भी जुड़ा है। लोककथाओं के अनुसार, सरानिया समुदाय एक घुमंतू जनजाति है, जो कभी मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ चलता था। पुरुष ढाल और तलवार जैसे हथियारों की धार तेज करते थे जबकि महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं।
कहा जाता है कि 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद सरानिया समुदाय के लोगों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया और दूसरे विकल्पों के अभाव में कई परिवारों ने देह व्यापार का सहारा लिया। दशकों बाद वाडिया बदलाव की ओर बढ़ तो रहा है, लेकिन अतीत की परछाइयां अब भी उसका पीछा कर रही हैं।
वाराणसी में 30 लाख के इनामी नक्सली Brijesh Ganjhu ढेर, जानें कैसे हुआ एनकाउंटर?
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में रविवार सुबह उत्तर प्रदेश एटीएस और रामनगर पुलिस की टीम ने मुठभेड़ में 30 लाख रुपये के इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता को मार गिराया। मुठभेड़ रामनगर थाना क्षेत्र के लंका मैदान के पास हुई। पुलिस के मुताबिक, बृजेश प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी यानी टीपीसी का कमांडर था।
बृजेश पर कुल 30 लाख रुपये का इनाम घोषित था। इसमें झारखंड सरकार की ओर से 25 लाख रुपये और एनआईए की ओर से 5 लाख रुपये शामिल थे। वह कई मामलों में वांछित था।
मुगलसराय की ओर जा रहा था बृजेश
पुलिस के मुताबिक, एटीएस को बृजेश के वाराणसी में होने की जानकारी मिली थी। वह अपने एक साथी के साथ मोटरसाइकिल से टेंगरा मोड़ से मुगलसराय की तरफ जा रहा था।
टीम ने उसे रोकने की कोशिश की। पुलिस का कहना है कि बृजेश ने रुकने के बजाय गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद पुलिस की जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी। घायल हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
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दो पुलिसकर्मियों की बुलेटप्रूफ जैकेट पर लगी गोली
मुठभेड़ के दौरान एटीएस के उपाधीक्षक विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट पर भी गोलियां लगीं। दोनों पुलिसकर्मी सुरक्षित रहे। पुलिस ने घटनास्थल से सबूत जुटाने और मुठभेड़ की पूरी घटना की जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
डीजीपी ने क्या कहा?
उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्ण ने बृजेश गंझू के एनकाउंटर पर कहा, "आज सुबह एक नक्सली कमांडर के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई, जिस पर कुल 30 लाख रुपये का इनाम था। इसमें दूसरे राज्यों की ओर से 25 लाख रुपये और एनआईए की ओर से 5 लाख रुपये का इनाम था। इस कार्रवाई में उसकी मौत हो गई।"
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस की अपराधियों और माफिया के खिलाफ "जीरो टॉलरेंस की नीति" है और इसी नीति के तहत लगातार कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
#WATCH | Lucknow, Uttar Pradesh: On the encounter of Brijesh Ganjhu, alias Gopal Singh, the chief of the Tritiya Prastuti Committee (TPC), DGP Rajeev Krishna says, "This morning, a police encounter took place with a Naxal commander who carried a total bounty of Rs 30… pic.twitter.com/h4cxAW19uQ
— ANI (@ANI) September 20, 2026
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टीपीसी का कमांडर था बृजेश
बृजेश गंझू झारखंड के चतरा जिले का रहने वाला था और प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी से जुड़ा था। पुलिस और जांच एजेंसियों के मुताबिक, वह संगठन में कमांडर की भूमिका में था और उसके खिलाफ कई मामले दर्ज थे। एनआईए भी उसे कई मामलों में वांछित बता चुकी थी। पुलिस के मुताबिक, उसके खिलाफ हिंसा और अन्य आपराधिक गतिविधियों से जुड़े मामले थे।
30 लाख का था इनाम
बृजेश की गिरफ्तारी के लिए झारखंड सरकार ने 25 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। इसके अलावा एनआईए ने 5 लाख रुपये का इनाम रखा था। इस तरह उस पर कुल 30 लाख रुपये का इनाम था।
मुठभेड़ के बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां घटनास्थल की जांच कर रही हैं। साथ ही बृजेश के साथ मौजूद बताए जा रहे उसके साथी की तलाश भी की जा रही है।
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