लखनऊ से कानपुर अब सिर्फ 30 मिनट में, उत्तर प्रदेश को मिलेगा देश का पहला सबसे हाई-टेक एक्सप्रेसवे
पिछले एक दशक में भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में व्यापक बदलाव आया है. नेशनल हाईवे नेटवर्क, जो कभी 90 हजार किलोमीटर के करीब था, अब बढ़कर 1.44 लाख किलोमीटर से अधिक हो गया है. इस बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र उत्तर प्रदेश बनकर उभरा है, जिसे अब 'एक्सप्रेसवे स्टेट' के रूप में नई पहचान मिल रही है.
3 घंटे का सफर अब सिर्फ 30 मिनट में
उत्तर प्रदेश के दो सबसे प्रमुख औद्योगिक और प्रशासनिक केंद्रों, लखनऊ और कानपुर के बीच की दूरी अब कम होने वाली है. 63 किलोमीटर लंबा यह सिक्स-लेन एक्सेस कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे (जिसे भविष्य में 8 लेन तक बढ़ाया जा सकता है) दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को डेढ़ से तीन घंटे से घटाकर मात्र 30 मिनट कर देगा.
सड़क पर क्या क्या मिलेंगे फीचर्स
लखनऊ और कानपुर के बीच बन रहा नया एक्सप्रेसवे अब लगभग तैयार है. 63 किलोमीटर लंबा यह रास्ता न केवल इन दो बड़े शहरों को करीब लाएगा, बल्कि इसे बनाने में ऐसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल हुआ है जो अब तक देश की चुनिंदा सड़कों में ही देखने को मिली हैं. इस एक्सप्रेसवे को बनाने के लिए खास तौर पर डिजिटल मैप (3D मॉडलिंग) और जीपीएस वाली मशीनों की मदद ली गई है, ताकि सड़क की बनावट में कोई कमी न रहे और काम भी तेजी से पूरा हो सके.
एक्सीडेंट से बचाव के लिए कई कार्य
सफर को सुरक्षित बनाने के लिए भी खास इंतजाम किए गए हैं. रात के समय सामने से आने वाले वाहनों की तेज लाइट से आंखों में होने वाली परेशानी को रोकने के लिए सड़क पर एंटी-ग्लेयर (चकाचौंध रोकने वाले) उपकरण लगाए गए हैं. साथ ही, हादसों से बचाव के लिए सड़क के किनारों पर बेहद मजबूत कंक्रीट की दीवारें (न्यू जर्सी बैरियर) बनाई गई हैं.
सुविधा की बात करें तो इस 63 किलोमीटर के दायरे में गाड़ियों के आने-जाने के लिए 3 बड़े रास्ते (इंटरचेंज), 2 फ्लाईओवर और एक रेलवे ओवरब्रिज बनाया गया है. इसके अलावा छोटे-बड़े नालों और रास्तों को पार करने के लिए 25 छोटे पुल भी तैयार किए गए हैं.
आधुनिक तकनीक और सख्त सुरक्षा मानक
इस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी खासियत इसका एडवांस ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ATMS) है. सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए 120 किमी/घंटा से अधिक की रफ्तार पर स्वतः चालान की व्यवस्था की गई है. इसके अलावा, यात्रियों के लिए दो आधुनिक रेस्ट एरिया, मजबूत ड्रेनेज सिस्टम और पैदल यात्रियों के लिए अंडरपास भी बनाए गए हैं.
निर्माण की चुनौतियां और 'प्रीकास्ट' का समाधान
इस प्रोजेक्ट का निर्माण आसान नहीं था. भूमि अधिग्रहण और मानसून के दौरान जलभराव जैसी बाधाओं से निपटने के लिए प्रीकास्ट टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया. आधुनिक एंबैंकमेंट और सबग्रेड सुधार तकनीकों ने यह सुनिश्चित किया कि मिट्टी की समस्या निर्माण की गति को न रोक सके.
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Laalo Krishna Sada Sahaayate Exclusive Interview: डायरेक्टर से जानें क्या है फिल्म की फिलोसोफी
Laalo Krishna Sada Sahaayate Film Interview: लालो फिल्म के डायरेक्टर और स्टारकास्ट ने हाल ही में न्यूज़ नेशन और फिल्मीअड्डा से खास बातचीत की. इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में डायरेक्टर ने बताया कि लालो सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि एक थेरेपी है. डायरेक्टर ने आगे कहा कि डे वन से ही उनका एक ही सपना था कि वो एक ऐसी फिल्म बनाएं जो सीधे लोगों के दिल तक पहुंचे. डायरेक्टर ने यह भी बताया कि इस फिल्म की एक ही फिलोसोफी है-“कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो”, और पूरी कहानी इसी विचार पर आधारित है. इंटरव्यू के दौरान कास्ट ने भी बताया कि इस फिल्म के जरिए वे पूरे इंडिया में गुजरात को रिप्रेजेंट कर रहे हैं और उन्हें पूरी उम्मीद है कि इंटरनेशनल स्टेज पर जाकर यह फिल्म इंडिया के लिए ऑस्कर तक का सफर तय करेगी. साथ ही उन्होंने यह भी माना कि फिल्म को सिर्फ गुजराती ऑडियंस ही नहीं बल्कि हिंदी बेल्ट से भी जबरदस्त प्यार मिल रहा है, जो यह साबित करता है कि आज के समय में कंटेंट ही असली हीरो होता है. वहीं फिल्म के एक्टर करण जोशी ने बताया कि लालो उनकी डेब्यू फिल्म है, जिससे उन्होंने न सिर्फ एक्टिंग बल्कि जिंदगी के कई लेसंस भी सीखे. इंटरव्यू के आखिर में निर्देशक और पूरी कास्ट ने कहा कि लालो सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि एक चमत्कार है, और ऑडियंस से मिल रहे अनएक्सपेक्टेड प्यार ने उन्हें भावुक और बेहद खुश कर दिया है.
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