मकर संक्रांति पर देसी खिचड़ी बनाम मॉडर्न डिटॉक्स, जानें डॉक्टर मीरा पाठक की राय
नई दिल्ली, 14 जनवरी (आईएएनएस)। उत्तर भारत के घरों में मकर संक्रांति आते ही रसोई की खुशबू कुछ अलग ही हो जाती है। सर्दियों में गाजर, मटर, गोभी या फिर अलग-अलग दालों के मेल से बनी गरमागरम खिचड़ी इस पर्व का खास हिस्सा होती है। खिचड़ी सिर्फ स्वाद या परंपरा का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे सेहत से जुड़ा एक गहरा तर्क भी छिपा है।
हाथ से सिलकर बना जहाज भारत से ओमान पहुंचा:18 दिनों में समुद्र यात्रा पूरी की; 2000 साल पुरानी तकनीक से बनाया गया है कौंडिन्य
भारत में हाथ से सिलकर तैयार हुए पारंपरिक जहाज INSV ‘कौंडिन्य’ ने 18 दिन की समुद्री यात्रा के बाद ओमान के मस्कट पहुंचकर अपना ऐतिहासिक सफर पूरा कर लिया। बुधवार को जहाज के मस्कट तट के पास पहुंचने की पुष्टि हुई। जहाज पर कमांडर विकास श्योराण के नेतृत्व में 16 सदस्यीय दल सवार थे। कौंडिन्य 29 दिसंबर, 2025 को गुजरात के पोरबंदर से अपनी पहली विदेशी यात्रा के लिए रवाना हुआ था। यात्रा लगभग 15 दिनों में पूरी होने वाली थी। हालांकि, इसमें 18 दिन लगे। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने स्किपर कमांडर विकास श्योराण और अभियान प्रमुख हेमंत कुमार के साथ एक तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा- इस पल का आनंद ले रहे हैं… हमने कर दिखाया। जहाज के एक अन्य क्रू सदस्य हेमंत ने पोस्ट किया- लैंड अहॉय! मस्कट दिखाई दिया। गुड मॉर्निंग इंडिया, गुड मॉर्निंग ओमान। समुद्री मार्ग से बिना रुके अकेले विश्व का चक्कर लगाने वाले पहले भारतीय, रिटायर्ड नौसेना कमांडर अभिलाष टॉमी ने भी कौंडिन्य की टीम को बधाई दी। कौंडिन्य का डिजाइन अजंता गुफा की एक पेंटिंग पर आधारित INSV ‘कौंडिन्य’ का डिजाइन अजंता गुफाओं की 5वीं सदी की एक पेंटिंग पर आधारित है। गोवा की एक कंपनी ने करीब 2000 साल पुरानी टांका पद्धति से इस जहाज का निर्माण किया है। लकड़ी के तख्तों से बने इस जहाज को नारियल के रेशे से सिला गया है। इसमें कहीं भी कीलों का इस्तेमाल नहीं हुआ है। जहाज में न तो इंजन है और न ही जीपीएस। इसमें चौकोर सूती पाल और पैडल लगे हैं। यह पूरी तरह हवा के सहारे, कपड़े के पाल (सढ़) से चलता है। इस प्रोजेक्ट की कल्पना संजीव सान्याल ने की थी। स्वदेशी रूप से बने इस जहाज के पालों पर गंडभेरुंड और सूर्य के प्रतीक हैं। आगे की ओर सिंह याली की आकृति उकेरी गई है, जबकि डेक पर हड़प्पा शैली का प्रतीकात्मक पत्थर का लंगर लगाया गया है। ये सभी तत्व प्राचीन भारतीय समुद्री परंपराओं को दर्शाते हैं। कौंडिन्य भारत की समुद्री खोज और व्यापार का प्रतीक जहाज का नाम पहली सदी के प्रसिद्ध भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने हिंद महासागर पार कर मेकांग डेल्टा तक यात्रा की थी और वहां एक कंबोडियाई राजकुमारी से शादी की थी। यह जहाज भारत की समुद्री खोज, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपरा का प्रतीक माना जा रहा है। भारत के प्राचीन जहाज निर्माण कौशल को दुनिया के सामने लाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने साल 2023 में प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। जिसके बाद संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और गोवा की निजी बोट बिल्डर कंपनी होड़ी इनोवेशंस के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। जहाज को फरवरी 2025 में गोवा में लॉन्च किया गया। कौंडिन्य दुनिया के किसी भी नौसैनिक जहाज से अलग कौंडिन्य को तैयार करने में नौसेना ने होदी इनोवेशन और पारंपरिक कारीगरों की मदद से कॉन्सेप्ट डेवलपमेंट से लेकर डिजाइन, टेक्निकल वेलिडेशन और कंस्ट्रक्शन तक पूरे प्रोजेक्ट की देखरेख की है। इसके डिजाइन और कंस्ट्रक्शन में कई तरह की टेक्निकल चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। कोई भी पुराना ब्लूप्रिंट या अवशेष न होने के कारण इसकी डिजाइन करना आसान नहीं था। सिले हुए पतवार, लकड़ी के पुर्जे और पारंपरिक स्टीयरिंग मैकेनिज्म से तैयार यह जहाज दुनिया में कहीं भी नौसेना में मौजूद किसी भी जहाज से अलग है। इसे केरल के मास्टर शिपराइट बाबू शंकरन के नेतृत्व में हजारों कारीगरों ने अपने हाथ से तैयार किया है। आधुनिक वेसल (पोत) से अलग इस सिले हुए जहाज में चौकोर पाल और स्टीयरिंग बोर्ड लगा है। स्टीयरिंग बोर्ड का उपयोग पतवार के आविष्कार से पहले जहाज को कंट्रोल करने के लिए किया जाता था।
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