बिहार : बीएयू सबौर में ‘अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस’ पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित
भागलपुर, 19 सितंबर (आईएएनएस)। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर, भागलपुर में इंडियन सोसाइटी ऑफ एग्रोनॉमी (आईएसए), बीएयू सबौर चैप्टर के तत्वावधान में ‘अंतर्राष्ट्रीय सस्य वैज्ञानिक दिवस’ के अवसर पर एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य विषय विकसित भारत 2047 के लिए सस्य विज्ञान की पुनर्कल्पना था।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों, वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों एवं स्नातकोत्तर छात्रों ने भाग लिया तथा भविष्य की कृषि को अधिक टिकाऊ, जलवायु-अनुकूल, संसाधन-कुशल एवं तकनीक-आधारित बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया।
कार्यशाला के अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. एके. सिंह, निदेशक अनुसंधान एवं अध्यक्ष, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर ने कहा, वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इसके लिए ऐसी सस्य तकनीकों का विकास आवश्यक है, जो उत्पादकता एवं किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ मृदा, जल एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित करें।
उन्होंने वैज्ञानिकों से कृषि में नवाचार एवं तकनीकी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
डॉ. संजय कुमार, डीन, पीजीएस एवं सचिव, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर ने उच्च शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य के कृषि वैज्ञानिकों को जलवायु-स्मार्ट सस्य विज्ञान, सटीक कृषि एवं डिजिटल कृषि तकनीकों से दक्ष बनाना समय की मांग है।
डॉ. राजेश कुमार, निदेशक प्रशासन एवं उपाध्यक्ष, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर ने विश्वविद्यालय की ओर से अनुसंधान एवं नवाचार को हरसंभव सहयोग प्रदान करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को कृषक खेतों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी कृषि प्रसार तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया।
डॉ. एस. आचार्य, कोषाध्यक्ष, आईएसए बीएयू सबौर चैप्टर ने चैप्टर की गतिविधियों एवं संगठनात्मक रूपरेखा पर प्रकाश डाला तथा कार्यक्रम में उपस्थित पदाधिकारियों, वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों एवं छात्रों के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यशाला में टिकाऊ कृषि, मृदा स्वास्थ्य एवं जलवायु अनुकूलन, संसाधन-उपयोग दक्षता, डिजिटल एवं सटीक कृषि, ड्रोन एवं आधुनिक कृषि तकनीक, फसल विविधीकरण तथा कृषि में नवाचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर तकनीकी चर्चा हुई।
कार्यशाला में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बदलते जलवायु परिदृश्य, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव और बढ़ती खाद्य मांग के बीच सस्य विज्ञान को पारंपरिक उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर टिकाऊ, तकनीक-सक्षम एवं किसान-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना होगा।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों की सक्रिय भागीदारी रही। कार्यक्रम ने विकसित भारत 2047 के लिए कृषि अनुसंधान, शिक्षा और नवाचार की नई दिशा तय करने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
--आईएएनएस
डीके/एबीएम
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गांधी सागर में अब 4 चीते होंगे, कूनो से मादा चीता लाने की तैयारी, CM मोहन यादव छोड़ेंगे
मध्यप्रदेश में चीतों का कुनबा बढ़ाने की तैयारी के तहत अब गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में कूनो से एक और मादा चीता लाने पर विचार किया जा रहा है। दरअसल वन विभाग करीब छह साल की निर्वा और बोत्सवाना मूल की करीब तीन साल की मादा चीता में से किसी एक को गांधी सागर भेजने की तैयारी कर रहा है। 18 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में चीतों की संख्या 56 हो चुकी है जिनमें 53 कूनो और तीन गांधी सागर में हैं।
दरअसल गांधी सागर में अभी तीन चीते मौजूद हैं। इनमें दक्षिण अफ्रीका से लाए गए नर चीते प्रभास और पावक को अप्रैल 2025 में अभयारण्य में छोड़ा गया था। इसके बाद सितंबर 2025 में कूनो से मादा चीता धीरा को गांधी सागर लाया गया। अब यहां चौथा चीता लाने की तैयारी है और वन विभाग की ओर से एक मादा चीता के नाम पर विचार किया जा रहा है।
CM डॉ. मोहन यादव के हाथों नई मादा चीता को छोड़ा जाएगा
वहीं अधिकारियों के मुताबिक कूनो से निर्वा या बोत्सवाना मूल की करीब तीन साल की किसी मादा चीता को गांधी सागर भेजा जा सकता है। अंतिम फैसला संबंधित स्तर पर लिया जाना है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों नई मादा चीता को गांधी सागर में छोड़े जाने की तैयारी बताई गई है। चीतों को रखने के लिए गांधी सागर में करीब 64 वर्ग किलोमीटर का सुरक्षित इलाका तैयार किया गया है। इस क्षेत्र में बाड़े, निगरानी और चीतों की सुरक्षा से जुड़े जरूरी इंतजाम किए गए हैं। यहां पहले से मौजूद चीतों की निगरानी भी वन विभाग की टीम कर रही है।
प्रोजेक्ट चीता में गांधी सागर की बढ़ी भूमिका
दरअसल गांधी सागर को कूनो के बाद देश में चीतों के लिए दूसरे प्रमुख ठिकाने के तौर पर विकसित करने की प्रक्रिया अप्रैल 2025 में शुरू हुई थी। इसी दौरान दक्षिण अफ्रीका से लाए गए प्रभास और पावक को यहां छोड़ा गया। बाद में कूनो की मादा धीरा को भी गांधी सागर भेजा गया। अब एक और मादा के आने से यहां चीतों की संख्या चार हो जाएगी। प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत में चीतों को अलग-अलग उपयुक्त इलाकों में बसाने पर काम किया जा रहा है। इसका मकसद केवल एक ही इलाके में चीतों को रखने के बजाय उनके लिए दूसरे सुरक्षित ठिकाने तैयार करना भी है। गांधी सागर इसी योजना का हिस्सा है। जानकारी के मुताबिक 18 सितंबर 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत में कुल 56 चीते हैं। इनमें 53 चीते कूनो नेशनल पार्क में और तीन गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में हैं। नई मादा चीता के आने के बाद गांधी सागर में यह संख्या चार हो जाएगी।
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