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रॉकेट फोर्स कमांड, मुनीर की अगुवाई में हुई हाई लेवल मीटिंग में पाकिस्तान ने क्या बड़ा कदम उठा लिया?

पाकिस्तानी सेना ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में मिली हार के बाद लंबी दूरी की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए एक नई रॉकेट फोर्स कमांड की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सीएनएन-न्यूज़18 को खुफिया सूत्रों ने बताया कि असीम मुनीर के नेतृत्व में हुए कोर कमांडर्स सम्मेलन ने पिछले महीने इस नई फोर्स की संरचना को मंजूरी दे दी थी और इसके जल्द ही औपचारिक रूप से गठित होने की उम्मीद है। पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने दिसंबर में रॉकेट फोर्स कमांड पर चर्चा की थी और ऑपरेशन सिंदूर में हुए नुकसान के बाद इसे एक उच्च तकनीक से लैस बल के रूप में पेश किया था। इसी में एक रॉकेट फोर्स का भी गठन है। ऑपरेशन सिंदूर और उससे पहले से ही दुनिया भर में में अलग-अलग जगह चल रहे संघर्षों ने दिखाया कि लॉन्ग रेंज वेपन की अहमियत बढ़ रही है। ऑपरेशन सिंदूर में भी आमने-सामने की लड़ाई नहीं हुई थी बल्कि लॉन्ग रेंज वेपन का ही इस्तेमाल हुआ था। खुफिया सूत्रों ने कहा, पाकिस्तान अब अपनी लॉन्ग रेंज स्ट्राइक की क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पिछले साल ही नई ऑर्मी रॉकेट फोर्स कमांड के गठन का ऐलान किया था। सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तानी आर्मी ने अब इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी है। भारत में अभी न्यूक्लियर वेपन वाली स्ट्रैटजिक कमांड है। भारतीय सेना के पास रॉकेट तो हैं, लेकिन कोई कमांड जैसा स्ट्रक्चर नहीं है।

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अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के मद्देनजर भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। इसके जवाब में, पाकिस्तान ने अपने तथाकथित 'ऑपरेशन बुनियान-उन-मारसूस' के तहत ड्रोन, लोइटरिंग मुनिशन्स, लड़ाकू विमानों और मिसाइलों का प्रक्षेपण किया। हालांकि, भारत की सतर्क सेनाओं और अभेद्य वायु रक्षा प्रणाली ने पाकिस्तानी हमलों में से अधिकांश को नाकाम कर दिया, जिनमें नई दिल्ली को निशाना बनाकर दागी गई एक मिसाइल भी शामिल थी। भारत ने चार दिनों तक चले संघर्ष के दौरान पाकिस्तानी वायु सेना के ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए और कई लड़ाकू विमानों को मार गिराया।

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क्या भारत रॉकेट फोर्स बनाने की योजना बना रहा है?

इस बीच, खुफिया सूत्रों ने सीएनएन-न्यूज़18 को बताया कि भारत भी एक अलग रॉकेट फोर्स स्थापित करने पर विचार कर रहा है, हालांकि इसे अभी तक औपचारिक रूप नहीं दिया गया है। वर्तमान में भारत की सामरिक बल कमान परमाणु हथियारों को नियंत्रित करती है, जबकि अन्य सैन्य बल पारंपरिक हथियारों का प्रबंधन करते हैं। विश्व भर में हाल के युद्धों और संघर्षों के बीच लंबी दूरी की क्षमताओं पर केंद्रित एक नए बल के गठन की आवश्यकता महसूस की गई है, जहां लंबी दूरी की मिसाइलों और रॉकेटों ने युद्धक्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाई है। 

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Greenland बनेगा अमेरिका का 51वाँ राज्य? Florida के सांसद ने पेश किया ऐतिहासिक 'एनेक्सेशन बिल', जानें प्रस्तावित कानून में क्या है?

अमेरिकी राजनीति में एक चौंकाने वाले घटनाक्रम के तहत, फ्लोरिडा के रिपब्लिकन सांसद रैंडी फाइन (Randy Fine) ने मंगलवार को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (US House of Representatives) में एक विधेयक पेश किया है। इस विधेयक का उद्देश्य दुनिया के सबसे बड़े द्वीप, ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका का 51वाँ राज्य बनाना है। रैंडी फाइन ने औपचारिक रूप से ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट पेश किया, जिसका मकसद अमेरिकी सरकार को ग्रीनलैंड के विलय और आखिरकार उसे राज्य का दर्जा देने के लिए कानूनी अधिकार देना है। सांसदों ने इस कदम को आर्कटिक में बढ़ते चीनी और रूसी प्रभाव का मुकाबला करने के लिए महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन इस प्रस्ताव ने पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ा विरोध और भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा दिया है।

नया बिल ट्रंप को ज़रूरी कदम उठाने का अधिकार देगा

पास होने के बाद, नया बिल राष्ट्रपति ट्रंप को ग्रीनलैंड को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में बातचीत करने या हासिल करने के लिए "जो भी ज़रूरी कदम उठाने" का अधिकार देगा और आखिरकार अमेरिकी राज्य का दर्जा देने के लिए ज़रूरी सुधारों पर कांग्रेस को पूरी रिपोर्ट देने का निर्देश देगा।

रैंडी फाइन ने यह बिल इसलिए पेश किया है ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को डेनमार्क के क्षेत्र ग्रीनलैंड को हासिल करने और आखिरकार उसे संयुक्त राज्य अमेरिका का हिस्सा बनाने के लिए ज़रूरी कदम उठाने की अनुमति मिल सके।

फाइन ने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिकी सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आर्कटिक में स्थित है और व्यापार, सैन्य आवाजाही और ऊर्जा परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रमुख शिपिंग मार्गों को नियंत्रित कर सकता है। उन्होंने कहा, "अमेरिका उस भविष्य को ऐसे शासनों के हाथों में नहीं छोड़ सकता जो हमारे मूल्यों से नफरत करते हैं और हमारी सुरक्षा को कमजोर करना चाहते हैं।"
 

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अमेरिका को उन देशों को अनुमति नहीं देनी चाहिए जो अमेरिकी मूल्यों का विरोध करते हैं-
फाइन ने यह भी चेतावनी दी कि अमेरिका को उन देशों को ग्रीनलैंड पर प्रभाव हासिल करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए जो अमेरिकी मूल्यों या सुरक्षा हितों का विरोध करते हैं। इससे पहले, राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड में अपनी दिलचस्पी दोहराई थी, इसे अमेरिकी रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए "पूरी तरह से ज़रूरी" बताया था और कहा था कि बीजिंग और मॉस्को के साथ बढ़ते वैश्विक मुकाबले के बीच वाशिंगटन को "ग्रीनलैंड की ज़रूरत है"।

वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया

हालांकि अमेरिका के भीतर इस प्रस्ताव पर चर्चा गर्म है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कड़ा प्रतिरोध मिल रहा है:

डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्थिति: ग्रीनलैंड वर्तमान में डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त (Autonomous) क्षेत्र है। डेनमार्क के अधिकारियों ने पहले भी ऐसे किसी भी विचार को सिरे से खारिज कर दिया था, यह कहते हुए कि "ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।"

भू-राजनीतिक तनाव: इस विधेयक ने नाटो (NATO) सहयोगियों के बीच तनाव पैदा कर दिया है। यूरोपीय संघ के कई नेताओं ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन और 'पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता' का उदाहरण बताया है।
 

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निष्कर्ष: रैंडी फाइन का यह बिल पारित हो या न हो, इसने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है और आर्कटिक क्षेत्र को भविष्य के 'भू-राजनीतिक संघर्ष' के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया है।

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