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भीषण बम धामके से दहला पाक, उड़ गई मस्जिद, 15 की मौत

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा प्रांत के कोहाट जिले में आज नमाज के दौरान एक जोरदार धमाका हुआ। यह विस्फोट खैबर पख्तूनवा के ओल्ड पुलिस लाइन के पास हुआ जिसके कारण इलाके में अफरातफरी मच गई और शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक इस हादसे में अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। हालांकि यह शुरुआती जानकारी है। यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। पाकिस्तानी पुलिस और चश्मदीदों के अनुसार विस्फोटक से लदा एक वाहन कथित तौर पर ओल्ड पुलिस लाइन के गेट से टकरा गया। जिसके बाद यह भयानक धमाका हुआ। विस्फोट के बाद इलाके में गोलीबारी की आवाजें भी सुनी गई। यह हमला इतना भयानक था कि मस्जिद के बाहर एक गहरा गड्ढा बन गया। मस्जिद का बाहरी हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और एक दीवार ढह गई। 

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इसके अलावा आसपास की कई अन्य इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा है। खैबर पख्तवा में इस घटना की सूचना मिलते ही वहां के स्थानीय टीम सुरक्षा बल मौके पर पहुंचे। घायलों को कोहाट के जिला मुख्यालय अस्पताल पहुंचाया गया। जहां लगभग 25 घायलों को ले जाने के बाद अस्पताल में इमरजेंसी घोषित कर दी गई। घायलों में कई पुलिसकर्मी शामिल हुए। सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को घेर लिया और ओल्ड पुलिस लाइंस के पास सर्च एंड क्लीयरेंस ऑपरेशन चलाया गया। एतिहादत के तौर पर कोहाट हंगूर रोड को यातायात के लिए बंद कर दिया गया और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गई। 
पाकिस्तानी अधिकारी फिलहाल धमाके की परिस्थितियों और इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने में जुटे हैं। हालांकि आपको बता दें पाकिस्तान के लिए इस तरह के खूनी हमले अब कोई नई बात नहीं रह गई। देश के कई हिस्सों में खासकर खैबर पख्तनवा और बलूचिस्तान में इस तरह के हमले-आम बात हो चुके हैं। सुरक्षा बल,पुलिस चौकी, मस्जिद और आम नागरिक को निशाना बनाकर किए जाने वाले बम धमाके वहां की दैनिक हकीकत बन चुकी है। आतंकवाद के खिलाफ लंबी लड़ाईयों और कहीं ना कहीं यह घटना एक बार फिर इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को जो फंडिंग और पनाह दी थी, आज वही नासूर उसी के गले की फाज बन चुका है।

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दशकों तक पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी पाकिस्तान की सरकार ने अच्छे और बुरे आतंकवादियों का खेल खेला। दूसरे देशों में अशांति फैलाने के लिए आतंकवादियों को पालापोसा और उन्हें सुरक्षित ठिकाने दिए। लेकिन अब वही आतंकी बीते कुछ सालों से पाकिस्तान में इस तरह के हमलों को अंजाम दे रहे हैं।
 

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सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता व्यक्ति

तकनीक ने मनुष्य को संवाद के ऐसे साधन उपलब्ध करा दिए हैं, जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक असंभव लगती थी। अब एक क्लिक पर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से संपर्क स्थापित हो जाता है। हजारों मित्र, सैकड़ों समूह, लगातार आती सूचनाएं और हर क्षण सक्रिय रहने वाली आभासी दुनिया ने यह भ्रम पैदा कर दिया है कि मनुष्य पहले से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक गंभीर सामाजिक विडंबना भी आकार ले रही है, संपर्क बढ़ रहे हैं, संवाद घट रहा है और भीड़ बढ़ने के बावजूद मनुष्य भीतर से अकेला होता जा रहा है। उसे आत्मीयता भरे शब्दों की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन दुनिया के व्यक्ति केवल ज्ञान देने तक ही सीमित रहते हैं, साथ चलने को कोई तैयार नहीं होता।

सोशल मीडिया ने दूरी अवश्य कम की है, लेकिन निकटता की परिभाषा बदल दी है। पहले किसी अपने से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता था। आमने-सामने बैठकर बातचीत होती थी, चेहरे के भाव पढ़े जाते थे और मौन भी संवाद का हिस्सा होता था। अब किसी के जीवन में हमारी उपस्थिति कई बार केवल एक ‘लाइक’, एक इमोजी या कुछ शब्दों की टिप्पणी तक सीमित हो गई है। जन्मदिन पर दर्जनों शुभकामनाएं मिल जाती हैं, लेकिन संकट की घड़ी में कंधा देने वाला व्यक्ति तलाशना कठिन हो रहा है। इसी कारण आज हर कोई अकेलेपन की गहराई में लगातार घुसता ही जा रहा है। यह बात सच है कि जो व्यक्ति से मिल सकता है, उसे तकनीक कभी नहीं दे सकती।

यह स्थिति केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव परिवार और समाज की संरचना पर भी दिखाई दे रहा है। एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। भोजन की मेज पर बातचीत के बजाय सूचनाओं की जांच होती है। बच्चे माता-पिता के साथ समय बिताने के बजाय डिजिटल मनोरंजन में डूबे रहते हैं और माता-पिता भी अपनी आभासी दुनिया में व्यस्त रहते हैं। परिणाम यह है कि घर भौतिक रूप से साथ होते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। इसी से परिवार के सदस्यों के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं, और यही परिवार टूटने का एक बड़ा कारण भी है। इससे भी व्यक्ति अवसाद की ओर अग्रसर होता जाता है।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने मनुष्य को स्वयं को प्रस्तुत करने का अभूतपूर्व मंच दिया, लेकिन स्वयं को समझने का अवसर कम कर दिया। यहां हर व्यक्ति अपने जीवन का चुना हुआ हिस्सा प्रदर्शित करता है। दूसरों के जीवन की दिखाई देने वाली चमक जब लगातार हमारी आंखों के सामने रहती है, तो अनजाने में तुलना शुरू हो जाती है। हमें लगता है कि दूसरे हमसे अधिक सफल, अधिक खुश और अधिक संतुष्ट हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला जीवन अक्सर संपूर्ण जीवन नहीं, उसका चयनित अंश होता है। जीवन वही सार्थक है, जिसमें समाज और परिवार का साथ हो। किसी भी प्रकार की तुलना करना हानिकारक ही है। यही तुलना धीरे-धीरे आत्मसंतोष को प्रभावित करती है। व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविक उपलब्धियों के बजाय दूसरों की आभासी उपलब्धियों से स्वयं को मापने लगता है। लाइक और कमेंट सामाजिक स्वीकृति के नए पैमाने बन जाते हैं। पोस्ट पर प्रतिक्रिया कम मिले तो बेचैनी और अधिक मिले तो क्षणिक संतोष प्राप्त होता है। यह चक्र व्यक्ति को बाहरी मान्यता पर निर्भर करता जाता है। विडंबना यह है कि हजारों लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाला व्यक्ति भी अपने मन की बात कहने के लिए एक विश्वसनीय व्यक्ति की तलाश कर सकता है।

समाज के सामने एक दूसरी चुनौती संवाद की गुणवत्ता की है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है, लेकिन हर अभिव्यक्ति संवाद नहीं होती। संवाद में सुनना भी शामिल है, जबकि डिजिटल संसार में प्रतिक्रिया देने की जल्दबाजी कई बार सुनने की क्षमता को पीछे छोड़ देती है। असहमति होते ही बहस व्यक्तिगत आरोपों में बदल जाती है। विचारों का आदान प्रदान धीरे-धीरे विचारों की टकराहट में बदलने लगता है। इससे सामाजिक विश्वास कमजोर होता है।

यहां यह समझना आवश्यक है कि समस्या सोशल मीडिया स्वयं नहीं है। तकनीक एक साधन है, उसका उपयोग उसे उपयोगी या नुकसानदेह बनाता है। सोशल मीडिया ने आपदा के समय सहायता पहुंचाने, ज्ञान साझा करने, रोजगार और व्यवसाय के अवसर पैदा करने तथा दूर रह रहे परिवारों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समस्या तब पैदा होती है जब साधन जीवन का विकल्प बनने लगे। इसलिए समाधान तकनीक से पलायन नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण उपयोग में है। परिवारों को प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित करना होगा, जब मोबाइल और अन्य स्क्रीन किनारे रखकर केवल एक-दूसरे से बात की जाए। बच्चों के साथ संवाद को केवल उनकी पढ़ाई और अनुशासन तक सीमित न रखकर उनके विचारों, मित्रताओं, भय और सपनों तक ले जाना होगा। बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया में शामिल करने के साथ-साथ उनके अनुभवों को सुनने के लिए भी समय देना होगा।

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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें ‘कनेक्टेड’ होने और ‘जुड़े’ होने के अंतर को समझना होगा। कनेक्शन तकनीक बनाती है, संबंध मनुष्य बनाता है। हजारों संपर्कों की सूची किसी एक सच्चे मित्र का स्थान नहीं ले सकती। सैकड़ों प्रतिक्रियाएं उस एक आत्मीय बातचीत का विकल्प नहीं बन सकतीं, जिसमें सामने वाला हमारी बात केवल सुनता ही नहीं, समझता भी है।

आज आवश्यकता सोशल मीडिया छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके बीच अपनी सामाजिक संवेदनशीलता बचाए रखने की है। हमें फिर से पड़ोसी से परिचय, मित्र से मुलाकात, परिवार के साथ भोजन और बिना किसी स्क्रीन के बातचीत जैसी छोटी-छोटी मानवीय परंपराओं को जीवन में स्थान देना होगा। क्योंकि मनुष्य को केवल सूचना नहीं, उसे आत्मीयता भी चाहिए। उसे केवल दर्शक नहीं, श्रोता चाहिए, केवल फॉलोअर नहीं, साथी चाहिए। यदि तकनीक हमें हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन हजारों संपर्कों के बीच अपने लोगों से हमारा वास्तविक संबंध कमजोर न हो।

सोशल मीडिया की भीड़ में अकेला होता समाज हमारी नियति नहीं है। यह एक चेतावनी है। तकनीक हमारे हाथ में रहे, जीवन पर उसका नियंत्रण न हो, यही संतुलन आधुनिक समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

- सुरेश हिंदुस्तानी

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