Iran-US Tension: ईरान ने अमेरिका के हमले का दिया जवाब, अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और डिस्ट्रॉयर पर दागी मिसाइलें
Iran-US Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच ईरान ने अमेरिकी नौसेना के दो युद्धपोतों को निशाना बनाने का दावा किया है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की एयरोस्पेस फोर्स के मुताबिक, अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और एक डिस्ट्रॉयर पर कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं।
ईरानी सरकारी प्रसारक IRIB के जरिए जारी बयान में IRGC ने आरोप लगाया कि अमेरिकी युद्धपोत ईरानी जहाजों को परेशान कर रहे थे और ईरान के खिलाफ लगाई गई नौसैनिक नाकाबंदी का हिस्सा थे।
ईरान ने क्या दावा किया?
IRGC के मुताबिक, मिसाइल हमले के बाद दोनों अमेरिकी युद्धपोत संघर्ष क्षेत्र से पीछे हटने के लिए मजबूर हुए। ईरानी सेना ने दावा किया कि जहाजों को नुकसान पहुंचा है और एक और हमले की आशंका के कारण उन्होंने इलाका छोड़ दिया।
हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में अमेरिकी युद्धपोतों को हुए कथित नुकसान के ईरानी दावे को फिलहाल दावे के तौर पर ही देखा जा रहा है।
It’s simple: if Iran shoots at U.S. ships, we will destroy (and sink) their oil tankers. All they have to do is not shoot at @USNavy.
— Pete Hegseth (@PeteHegseth) September 5, 2026
Iran’s oil tanker fleet is defenseless — Iran has no navy or air force. Our planes, ships & subs can strike them all, in @CENTCOM & @USPACOM. https://t.co/lr5TaxloBw
होर्मुज में भी बढ़ा तनाव
यह घटनाक्रम रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच सामने आया है। इससे पहले IRGC की नौसेना ने दावा किया था कि उसने होर्मुज से गुजर रहे तीन तेल टैंकरों को निशाना बनाया। ईरान ने इन जहाजों के मार्ग को ‘अनधिकृत’ बताया था।
ईरानी सेना ने क्षेत्र में मौजूद अन्य जहाजों को भी चेतावनी दी कि वे उसके बताए प्रतिबंधित या अनधिकृत समुद्री मार्गों से गुजरने की कोशिश न करें।
ईरान ने US हमलों को बताया कार्रवाई की वजह
IRGC Navy के बयान के मुताबिक, यह कार्रवाई अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े तीन तेल टैंकरों पर किए गए हमले के जवाब में की गई। ईरान का आरोप है कि अमेरिकी सेना ने उसके तीन तेल टैंकरों को निशाना बनाकर नुकसान पहुंचाया। इसके बाद ईरानी बलों ने अमेरिकी हितों से जुड़े जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की।
Pete Hegseth की कड़ी चेतावनी
इस बीच अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने ईरान को सीधी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान ने अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर हमला किया तो अमेरिका उसके तेल टैंकरों को नष्ट कर देगा।
हेगसेथ ने सोशल मीडिया पोस्ट में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर के बयान को साझा करते हुए कहा कि अगर ईरान अमेरिकी जहाजों पर गोली चलाता है तो उसे इसकी बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
हेगसेथ का संदेश साफ था ईरान को अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर हमला नहीं करना चाहिए, वरना उसके तेल टैंकर अमेरिकी कार्रवाई का निशाना बन सकते हैं।
5 सितंबर को भी हुआ था हमला
यह घटनाक्रम उस कार्रवाई के बाद सामने आया है जिसमें US Central Command (CENTCOM) के अनुसार अमेरिकी सेना ने 5 सितंबर को तीन ईरानी क्रूड ऑयल कैरियर्स को निशाना बनाया था।
CENTCOM के मुताबिक, यह कार्रवाई उस समय हुई जब IRGC ने क्षेत्र में गश्त कर रहे दो अमेरिकी नौसैनिक युद्धपोतों की दिशा में बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव और बढ़ने की आशंका बनी हुई है। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और तेल आपूर्ति से जुड़े समुद्री मार्गों पर तनाव का असर क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
Nepal Flood: पहले ही मिल गए थे ग्लेशियर टूटने के संकेत; रिपोर्ट ने बताया कैसे बच सकती थीं 1050+ जानें
Nepal Flood: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद तबाही का मंजर अब भी जारी है। सुरक्षा बलों ने आठ जिलों से और शव बरामद किए हैं, जिसके बाद मृतकों की संख्या 1,050 के पार पहुंच गई है। करीब 4,000 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं, जबकि लगभग 12,000 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
इसी बीच HiRISK की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आपदा से पहले ही ग्लेशियर में होने वाले बदलावों के संकेत मिल गए थे। सैटेलाइट तस्वीरों में हिमस्खलन के संकेत और ग्लेशियर की सतह तक पहुंचती दरार दिखाई दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक बेहतर आपदा तैयारी और प्रभावी अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम से कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
आपदा से पहले दिखे थे ग्लेशियर में बदलाव के संकेत
HiRISK रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियर के ढहने से पहले सैटेलाइट तस्वीरों में कई अहम संकेत मौजूद थे। इनमें हिमस्खलन के शुरुआती संकेत और ग्लेशियर की सतह की ओर बढ़ती दरार शामिल थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों पर अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम हाल में स्थापित किए गए थे, लेकिन ग्लेशियर से जुड़े खतरों के लिए मौके पर कोई ऑपरेशनल अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम मौजूद नहीं था।
रासुवागढ़ी बॉर्डर पर नहीं मिल पाता पर्याप्त समय
नेपाल-चीन सीमा पर रासुवागढ़ी चेकपॉइंट के आसपास शुरुआती हिमस्खलन बेहद तेजी से हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य नदी-आधारित चेतावनी प्रणाली से यहां मिलने वाला समय बहुत कम होता और इतने कम समय में लोगों को सुरक्षित निकालना मुश्किल हो सकता था।
हालांकि, नीचे की ओर जाने पर जहां चेतावनी के लिए 10 मिनट या उससे ज्यादा समय मिल सकता था, वहां बेहतर क्षमता वाले व्यापक अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम काफी लोगों की जान बचाने में मदद कर सकते थे।
भूकंपीय संकेत से भी मिल सकती है शुरुआती चेतावनी
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण बिंदु सामने आया है। ग्लेशियर से हुए बड़े पैमाने के मलबे के खिसकने से 4 से अधिक तीव्रता का भूकंपीय संकेत दर्ज हुआ था।
रिपोर्ट के मुताबिक भविष्य में बड़े इलाकों में भूकंपीय संकेतों पर आधारित अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम विकसित करने में ऐसे संकेतों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे ग्लेशियर और दूसरे अचानक होने वाले भू-खतरों के बारे में समय रहते चेतावनी देने की क्षमता बढ़ सकती है।
नेपाल में 1,050 से ज्यादा मौतें, 4 हजार लोग लापता
अधिकारियों के मुताबिक सुरक्षा बलों ने आठ जिलों में अतिरिक्त शव बरामद किए हैं। इसके बाद बाढ़ और उससे जुड़ी आपदा में मृतकों की संख्या 1,050 से ज्यादा हो गई है।
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) के अनुसार करीब 4,000 लोग अभी भी लापता हैं, जबकि लगभग 12,000 लोगों को रेस्क्यू किया जा चुका है। आपदा प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान अभी भी जारी है।
भारत ने 163 नागरिकों को निकाला
नेपाल में राहत और बचाव अभियान के बीच भारत भी अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में जुटा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार अब तक 163 भारतीय नागरिकों को बाढ़ प्रभावित इलाकों से सुरक्षित निकाला गया है। पिछले अपडेट के बाद पांच और भारतीयों को बाहर निकाला गया है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि भारत नेपाल के अधिकारियों के साथ समन्वय बनाकर राहत और बचाव कार्य जारी रखे हुए है। इसके अलावा मंगलवार को 151 भारतीय नागरिक चीन से बाहर निकले, जिन्हें प्रभावित इलाकों से सुरक्षित निकालने की प्रक्रिया के तहत सहायता दी गई।
काठमांडू पहुंची 19 सदस्यीय भारतीय फोरेंसिक टीम
भारत की 19 सदस्यीय विशेष फोरेंसिक टीम रविवार से काठमांडू में काम कर रही है। टीम आपदा के बाद जरूरी फोरेंसिक कार्यों में स्थानीय अधिकारियों की मदद कर रही है। वहीं, भारत की एक विशेष टनल रेस्क्यू टीम को चिलिमे में हाइड्रोपावर टनलों में तलाश और बचाव अभियान के लिए तैनात किया गया है।
सुरंगों में रेस्क्यू टीम के सामने बड़ी चुनौती
चिलिमे की हाइड्रोपावर टनलों में बचाव अभियान आसान नहीं है। टीम को बेहद संकरे रास्तों, दुर्गम इलाके और विशेष उपकरणों के इस्तेमाल में आ रही सीमाओं जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
टनल के भीतर जमीन दलदली होने के कारण भी अभियान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। भारतीय टीम ने स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए कुछ नए तरीके अपनाए और अस्थायी फ्लोट की मदद से सुरंग के अंदर आगे बढ़ने में सफलता हासिल की। रेस्क्यू टीम अब भी सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश जारी रखे हुए है।
अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम पर उठे सवाल
नेपाल की इस आपदा ने एक बार फिर पहाड़ी और ग्लेशियर प्रभावित क्षेत्रों में अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम की जरूरत को सामने ला दिया है। HiRISK रिपोर्ट के मुताबिक अगर खतरे के संकेतों को समय रहते प्रभावी चेतावनी में बदला जाता और निचले इलाकों में मजबूत आपदा प्रबंधन व्यवस्था होती, तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
इस हादसे के बाद भविष्य में ग्लेशियर, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ की निगरानी के लिए सैटेलाइट और भूकंपीय संकेतों को अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम से जोड़ने पर जोर बढ़ सकता है।
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