बुक रिव्यू- घरेलू महिला से बिजनेस वुमन तक का सफर:25 महिलाओं की ये सच्ची कहानियां, जिंदगी को देखने का नजरिया बदल देंगी
किताब का नाम: सात रंग के सपने लेखिका: रश्मि बंसल अनुवाद: उर्मिला गुप्ता प्रकाशक: युवान बुक्स मूल्य: 399 रुपए समाज अक्सर महिलाओं को घर–परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित करके देखता है। आज भी महिलाओं के लिए कारोबार शुरू करना, बड़े फैसले लेना और रिस्क उठाना आसान नहीं है। लेकिन रश्मि बंसल की किताब 'सात रंग के सपने' इसी सोच को चुनौती देती है। इसमें 25 भारतीय महिला उद्यमियों की सच्ची कहानियां हैं। किसी ने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां उठाने के लिए कारोबार शुरू किया, किसी ने सुरक्षित नौकरी छोड़कर उद्यमिता चुनी और किसी ने समाज की बंदिशों के बावजूद अपना रास्ता बनाया। ये कहानियां बताती हैं कि हर महिला की शुरुआत अलग होती है और आगे बढ़ने का रास्ता भी। किताब में क्या है? यह किताब तीन हिस्सों में बंटी है- लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा। हर भाग में अलग–अलग परिस्थितियों में कारोबार शुरू करने वाली महिलाओं की कहानियां हैं। किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें सफलता का कोई एक तय फार्मूला नहीं है। हर कहानी अपने तरीके से आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है। किताब की सबसे असरदार बात इस किताब की सबसे असरदार बात यह है कि रश्मि बंसल सफलता को किसी एक पैमाने से नहीं मापतीं। यहां हर महिला की उपलब्धि उसकी परिस्थितियों, फैसलों और संघर्ष के हिसाब से अलग है। हर कहानी सफलता का नया अर्थ गढ़ती है। यही बात इस किताब को दूसरी प्रेरक किताबों से अलग बनाती है। भाषा और लिखने का ढंग रश्मि बंसल की लेखन शैली सरल और कन्वर्सेशनल है। वे महिलाओं की उपलब्धियों को सिर्फ आंकड़ों या बिजनेस ग्रोथ तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि उनके फैसलों, असफलताओं और संघर्षों को भी बराबर जगह देती हैं। इसलिए हर कहानी किसी बिजनेस केस स्टडी की बजाय एक इंसानी सफर जैसी लगती है। हिंदी अनुवाद उर्मिला गुप्ता ने किया है। अनुवाद सहज और प्रवाहपूर्ण है। पढ़ते समय कहीं भी भाषा ट्रांसलेटेड नहीं लगती है। मूल भाव और कहानियों की सेंसिटिविटी भी बनी रहती है। यही वजह है कि किताब हिंदी पाठकों के लिए भी उतनी ही प्रभावशाली बन जाती है। किताब की खूबियां किताब की कमजोरियां यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? 'सात रंग के सपने' पढ़ने की सबसे बड़ी वजह यह है कि यह सफलता को नए नजरिए से देखने का मौका देती है। किताब बताती है कि उद्यमिता सिर्फ बड़े निवेश, ऊंची डिग्री या बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। सही अवसर, लगातार मेहनत और अपने फैसलों पर भरोसा भी सफलता की मजबूत नींव बन सकते हैं। यह किताब यह भी समझाती है कि महिलाओं को सफल होने के लिए किसी तय नेतृत्व शैली की नकल करने की जरूरत नहीं है। वे अपनी परिस्थितियों, अपनी प्राथमिकताओं और अपने तरीके से भी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकती हैं। इसी वजह से यह आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता पर आधारित प्रेरक पुस्तक बन जाती है। यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? अगर आप अपना काम शुरू करना चाहते हैं या कोई नया कदम उठाने से हिचकते हैं, तो यह किताब आपको आगे बढ़ने का भरोसा देती है। इसमें महिलाओं के अनुभव बताते हैं कि सही फैसला, लगातार मेहनत और धैर्य से बड़ी मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। ग्राफिक में देखिए यह किताब किन लोगों के लिए है- किताब के बारे में मेरी राय कुल मिलाकर, 'सात रंग के सपने' सिर्फ सफल महिला उद्यमियों की कहानियों का संग्रह नहीं है। यह उन फैसलों, संघर्षों और छोटे-छोटे साहसिक कदमों की किताब है, जो किसी साधारण शुरुआत को असाधारण उपलब्धि में बदल देते हैं। यही बात इसे पढ़ने के बाद लंबे समय तक याद रखती है। …………………………….. ग्राफिक- विपुल शर्मा …………………………… ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- भारतीय राजनीति में लोहिया का योगदान:आजादी की लड़ाई से लेकर समाजवादी आंदोलन तक, लोहिया को समझने के लिए पढ़ें ये किताब भारत की राजनीति में कुछ नेता ऐसे रहे हैं, जिन्हें उनके समय से कहीं ज्यादा बाद की पीढ़ियों ने समझने की कोशिश की। डॉ. राममनोहर लोहिया उन्हीं में से एक हैं। वे भारतीय राजनीति, समाज और लोकतंत्र को अपने अलग नजरिए से देखने वाले विचारक थे। पूरी खबर पढ़ें…
पेरेंटिंग- बच्चे के बाद बढ़ी जिम्मेदारियां और थकान:बढ़ रहे झगड़े, अपने लिए वक्त नहीं, पेरेंटिंग और रिश्ते में कैसे बनाएं बैलेंस
सवाल- मैं 36 साल का हूं और मुंबई में रहता हूं। मेरा 4 साल का बेटा है। उसके जन्म के बाद से हमारी जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। अब हमारा ज्यादातर समय उसकी देखभाल, स्कूल, खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों में निकल जाता है। दिन खत्म होते-होते हम दोनों इतना थक जाते हैं कि एक-दूसरे से ठीक से बात करने की भी ऊर्जा नहीं बचती। हमारे बीच अब छोटी-छोटी बातों पर बहस होने लगी है। कभी-कभी बच्चे के सामने भी गुस्सा निकल जाता है। मुझे लगता है कि हम अच्छा पेरेंट बनने की कोशिश में अच्छा जीवनसाथी होना भूलते जा रहे हैं। क्या पेरेंटिंग का लगातार बना रहने वाला तनाव पति-पत्नी के रिश्ते को कमजोर कर सकता है? दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाएं? एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- बच्चे का जन्म किसी भी परिवार में सबसे खुशी का पल होता है। लेकिन यह भी सच है कि बच्चे के आने के बाद पति-पत्नी की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। पहले जो समय एक-दूसरे के लिए होता था, उसकी जगह अब बच्चे की जरूरतें ले लेती हैं। नींद पूरी नहीं होती, जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, आर्थिक और मानसिक दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में कई दंपती यह महसूस करते हैं कि वे अच्छे माता-पिता बनने की कोशिश में अच्छे जीवनसाथी होना कहीं पीछे छोड़ रहे हैं। आप जिस स्थिति से गुजर रहे हैं, यह बहुत नॉर्मल है। मनोविज्ञान में इसे पेरेटिंग स्ट्रेस या पेरेंटल बर्नआउट की शुरुआत माना जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने बच्चे से प्यार नहीं करते। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि लंबे समय तक लगातार जिम्मेदारियां निभाने के कारण आपकी भावनात्मक ऊर्जा कम होती जा रही है। अगर इस तनाव को समय रहते न समझा जाए तो इसका असर सिर्फ पति-पत्नी के रिश्ते पर नहीं, बल्कि बच्चे के इमोशनल डेवलपमेंट पर भी पड़ सकता है। रिसर्च कहती है कि बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित माहौल वही है, जहां उसके मम्मी-पापा एक-दूसरे के साथ सम्मान, सहयोग और अपनापन दिखाते हैं। क्यों होता है पेरेंटल बर्नआउट? अक्सर पति-पत्नी सोचते हैं कि पहले वे ऐसे नहीं थे। अब हर छोटी बात पर बहस क्यों हो जाती है? यहां असल में समस्या हमेशा वह छोटी घटना नहीं होती, बल्कि उसके पीछे जमा हुई कई महीनों–सालों की थकान होती है। उदाहरण के लिए- इन छोटी-छोटी घटनाओं पर प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा इसलिए हो जाती है क्योंकि दोनों पहले से ही भावनात्मक रूप से थके हुए होते हैं। चाइल्ड साइकोलॉजी बताती है कि जब माता-पिता लगातार तनाव में रहते हैं तो बच्चे के लिए उनकी भावनात्मक उपलब्धता (इमोशनल ऐवेलबिलिटी) भी कम हो जाती है। वे जल्दी चिड़चिड़े हो सकते हैं, उनका धैर्य कम हो सकता है और बच्चे की मामूली गलती पर भी उन्हें ज्यादा गुस्सा आ सकता है। पेरेंटल बर्नआउट का बच्चे पर असर 4 साल की उम्र में बच्चा शब्दों से ज्यादा घर का माहौल पढ़ता है। अगर वह बार-बार देखता है कि- तो वह खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। कई बच्चे ऐसे माहौल में- क्या अच्छा पेरेंट बनने के लिए खुद को भूलना जरूरी? नहीं। यही सबसे बड़ी गलतफहमी है। कई माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे की हर जरूरत पूरी करना ही अच्छी पेरेंटिंग है। लेकिन शोध बताते हैं कि बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत भावनात्मक रूप से उपलब्ध और बैलेंस्ड माता-पिता की होती है, न कि हर समय खुद को थका देने वाले माता-पिता की। इसलिए याद रखें- ''खुश माता-पिता ही बच्चे की सबसे मजबूत नींव होते हैं।'' संतुलन कैसे बनाएं? बच्चे की हेल्दी परवरिश के लिए पेरेंटिंग की जिम्मेदारियों और बतौर कपल एक–दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। उतना ही जरूरी, जितना पेड़ में रोज पानी डालना। इसलिए इसे स्वार्थ नहीं, बल्कि अपनी बेसिक जिम्मेदारी समझें। 1. अपने रिश्ते को भी ‘परिवार की जरूरत’ मानें पति-पत्नी अपने रिश्ते को प्राथमिकता देें, क्योंकि जब पति-पत्नी के बीच प्यार और जुड़ाव होता है तो परिवार भी मजबूत होता है। बच्चा प्यार और सुरक्षा महसूस करता है। उसका मेंटल–इमोशनल डेवलपमेंट बेहतर होता है। 2. रोज सिर्फ 15 मिनट एक-दूसरे के लिए निकालें यह समय- यह समय सिर्फ एक-दूसरे के लिए हो। इस समय में एक-दूसरे से पूछिए- सुनने में यह एक छोटी-सी आदत लगती है। इससे भावनात्मक दूरियां कम होती हैं। आपसी प्रेम और ख्याल बढ़ता है। 3. जिम्मेदारियां बराबर बांटें जब एक व्यक्ति को लगता है कि सारा बोझ उसी पर है, तब नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए हर हफ्ते बैठकर तय करें- काम बांटना सिर्फ सुविधा नहीं, रिश्ते में सम्मान भी बढ़ाता है। 4. बच्चे के सामने एक-दूसरे को दोष न दें अगर किसी बात पर मतभेद है तो बाद में अकेले में बात करें। बच्चे के सामने एक–दूसरे को दोष न दें, आरोप न लगाएं। मतभेद को भी शांति से जाहिर करें। बच्चा माता-पिता के रिश्ते और संवाद के तरीके से ही स्वस्थ संवाद सीखता है। 5. खुद का भी ध्यान रखें सेल्फ केयर कोई लग्जरी नहीं है। अगर आप लगातार थके हुए रहेंगे तो धैर्य भी कम होगा। इसलिए- जब माता-पिता मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं, तो बच्चा भी अधिक सुरक्षित महसूस करता है। कब एक्सपर्ट की मदद लेनी चाहिए? अगर- तो कपल काउंसलिंग या फैमिली थेरेपी लेने में देर नहीं करनी चाहिए। याद रखें बच्चे को सिर्फ अच्छे माता-पिता नहीं, बल्कि ऐसे माता-पिता चाहिए, जो एक-दूसरे के साथ सम्मान, सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखें। पति-पत्नी का रिश्ता और पेरेंटिंग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाले स्तंभ हैं। जब आप अपने रिश्ते की देखभाल करते हैं, तो दरअसल अपने बच्चे के भावनात्मक भविष्य को भी सुरक्षित बना रहे होते हैं। ************ ग्राफिक्स- अजीत सिंह …………………… पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 










