भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान हर समय थका हुआ महसूस करता है। ऑफिस वर्क के दौरान वह हमेशा थका-थका महसूस करता है। कई बार अच्छी नींद और अच्छा खान-पान के बाद भी इंसान थका हुआ महसूस करता है। जब थकान और सुस्ती बढ़ जाती है और काम पर असर डालने लगती है। कई बार ऑफिस में फोकस नहीं बन पाता है। पढ़ने वाले बच्चों का मन में पढ़ाई नहीं लगता है। इस थकान से छुटकारा पाने के लिए लोग चाय, कॉफी या एनर्जी ड्रिंक्स का सेवन करते हैं। हालांकि इनका असर कुछ देर तक ही रहता है।
अगर आप चाहते हैं कि आपका शरीर पूरा समय ऊर्जा से बना रहे है, तो दिमाग तेज चले और मूड भी बेहतर बना रहे, तो इसका सबसे आसान और प्राकृतिक उपाय योग है। प्रतिदिन आप इन योगासनों को जरुर ट्राई करें। यह आपके शरीर को लचीला बनाए रखने में मदद करेगी।
सूर्य नमस्कार के साथ करें दिन की शुरुआत
अपने दिन की शुरुआत सूर्य नमस्कार से करें। इसको करने से आपके पूरे शरीर की मांसपेशियों को एक्टिव करता है। इससे रक्त संचार बेहतर होता है, शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ती है और मेटाबॉलिज्म तेज होता है। आप सुबह खाली पेट 5 से 10 राउंड सूर्य नमस्कार जरुर करें। यह आपके शरीर को तुरंत एक्टिव बनाएगा।
ताड़ासन के कई फायदे
यह योगासन रोजाना करने से काफी फायदेमंद रहता है। ताड़ासन शरीर को ऊपर की तरफ खिंचाव करता है, इससे रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है और शरीर का पॉश्चर भी सुधारता है।
- ताड़ासन करने से कमर, कंधे और गर्दन की समस्याएं देखने को मिलती है।
- इस आसान के करने से शरीर संतुलित बना रहता है और मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होता है।
- सुबह के समय इस योगासन को जरुर करें। इससे मन शांत रहता है, तनाव कम होता है और पूरे दिन के लिए सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
भुजंगासन से शरीर रहता है एक्टिव
भुजंगासन या कोबरा पोज शरीर में ऊर्जा भरने वाला एक प्रभावी योगासन है। इस आसन में पेट के बल लेटकर शरीर के ऊपरी हिस्से को ऊपर उठाते हैं, जिससे रीढ़ की हड्डी और पीठ की मांसपेशियों में खिचाव आता है।
- अगर आप दिनभर कुर्सी बैठे रहते हैं, तो पीठ दर्द और अकड़न की समस्या बढ़ती जा रही है। तो इस योगासन के करने से सभी समस्याएं दूर होगी।
- भुजंगासन करने से छाती को खोलता है, फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बेहतरीन बनाता है।
- स्ट्रेस और चिंता को कम करने में मददगार माना जाता है।
वृक्षासन बढ़ाता है फोकस
अगर आप शरीर और मन दोनों को संतुलित करना चाहते हैं, तो एक पैर पर खड़े होकर संतुलन बनाए। ये योगा शरीर की स्थिरता और मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक है।
- वृक्षासन योग करने से पैरों की मांसपेशियों मजबूत होती हैं और शरीर का संतुलन बेहतर होता है।
- यह दिमाग को केंद्रित रखने में भी मदद करता है।
- इस योगासन करने से तनाव, चिंता और वर्क प्रेशर के दबाव के बीच वृक्षासन मानसिक शांति प्रदान की जाती है।
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बरसात के मौसम के साथ ही मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इस दौरान डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया जैसी बीमरियां फैलती हैं। डेंगू होने पर व्यक्ति को बुखार, बदन दर्द और सिर दर्द के लक्षण महसूस होते हैं। इसके अलावा, प्लेटलेट्स भी तेजी से कम हो जाती है।
जब डेंगू गंभीर हो जाता है, तो कुछ मामलों में शरीर के दूसरों अंगों को भी प्रभावित कर देता है। बता दें कि, इससे ब्रेन और नर्वस सिस्टम से संबंधित जटिलताएं दुर्लभ लेकिन गंभीर हो सकती हैं। इसमें एन्सीफ्लोपैथी, एन्सीफ्लाइटिस, दौरे पड़ना और इंट्राक्रानियल ब्लीडिंग जैसी समस्याएं शामिल हैं।
हालांकि, कुछ मामलों में इस्केमिक स्ट्रोक या हेमोरेजिक स्ट्रोक भी रिपोर्ट हुए हैं। लेकिन यह समझना बेहद जरुरी है कि डेंगू होने का मतलब ब्रेन स्ट्रोक होना नहीं है। ज्यादातर मरीज बिना इस स्थिति के ठीक हो जाते हैं।
क्या डेंगू से ब्रेन और नर्वस सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं?
कुछ गंभीर मामलों में ब्रेन और नर्वस सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं, हालांकि ऐसा कम मामलों में होता है। डेंगू वायरस इंफेक्शन के दौरान नर्वस सिस्टम अलग-अलग तरीकों से प्रभावित हो सकते हैं। कुछ जोखिम सीधा न्यूरोलॉजिक्ल के साथ जुड़े हो सकते हैं, बल्कि कुछ गंभीर मामलों ब्लीडिंग, शॉक, मेटाबॉलिक असमानताएं या अंग के खराब होने के कारण दिखाई दे सकती हैं।
सीडीसी के अनुसार, डेंगू के गंभीर मामलों में सबसे ज्यादा ब्लीडिंग और अंगों का काम न करना, जिसमें चेतना में भी कमी देखने को मिलती हैं, यह सभी गंभीर बीमारी के संकेत हैं।
डेंगू और स्ट्रोक के बीच क्या संबंध है?
दरअसल, डेंगू और स्ट्रोक का संबंध मुख्य तौर पर दो तरह से समझा जाता है, जिसमें ब्रेन में ब्लीडिंग और ब्रेन की ब्लड वैसल्स में ब्लॉकेज के कारण इस्केमिक स्ट्रोक।
एनसीबीआई के मुताबिक, डेंगू की गंभीर स्थिति में प्लेटलेट्स तेजी से कम हो सकते हैं और ब्लड क्लॉटिंग सिस्टम को भी प्रभावित कर देता। वहीं गंभीर बीमारी के दौरान होने वाले अन्य बदलाव ब्लीडिंग का जोखिम बढ़ा सकते हैं। जबकि डिहाइड्रेशन, शॉक और जमावट असामान्यताएं जैसे कारक भी रक्त संचार को प्रभावित करते हैं।
डेंगू में कौन से जोखिम ब्रेन से जुड़े हो सकते हैं?
प्लेटलेट्स काउंट में कमी
डेंगू के दौरान प्लेटलेट्स काउंट तेजी से कम होना आम है। इससे ब्लीडिंग की संभावना बढ़ सकती हैं, लेकिन सिर्फ प्लेटलेट्स काउंट कम देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि मरीज को ब्रेन ब्लीडिंग होने वाली है।
ब्लड क्लॉटिंग में गड़बड़ी
असल में डेंगू जब गंभीर हो जाता है, तो ब्लीडिंग में ब्लड रोकने वाली प्रक्रिया प्रभावित हो सकता है। अगर ब्लीडिंग के साथ क्लॉटिंग गड़बड़ी भी मौजूद हों, तो गंभीर हेमरेज का जोखिम देखने को मिलता है।
प्लाज्मा लिकेज और शॉक
डेंगू की गंभीर स्थिति में ब्लड वैसल्स से फ्लूइड लिकेज होने पर ब्लड प्रेशर गिर सकता है और शॉक की स्थिति पैदा कर सकता है। लंबे समय तक शॉक शरीर के महत्वपूर्ण अंगो को प्रभावित कर देता है।
मेटाबॉलिक असमानताओं के अलावा, कुछ न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं में वायरस के तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव या संक्रमण के प्रति प्रतिरक्षा प्रणाली की भूमिका हो सकती है।
असल में डेंगू न केवल प्लेटलेट्स कम होने वाली बीमारी नहीं। बल्कि गंभीर मामलों में ब्लीडिंग, शॉक और ऑर्गन डिस्फंक्शन के साथ दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं भी हो सकती हैं। वहीं, ब्रेन हेमरेज और स्ट्रोक डेंगू में संभव हो सकता है, लेकिन यह काफी असामान्य है और हर डेंगू मरीज में इनका खतरा नहीं होता है।
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