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सोनिया और राहुल ने 'वंदे मातरम' का किया अपमान, सीएम मोहन यादव का आरोप; क्या कहा?

मध्य प्रदेश के सीएम मोहन यादव ने स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के अपमान का आरोप लगाते हुए सोनिया और राहुल गांधी से राष्ट्र से माफी मांगने की मांग कर दी। 

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Mecca Defence Alliance की पहली बैठक में हुए बड़े फैसले, Pakistan को मिली अहम जिम्मेदारी, भारत पर इसका क्या होगा असर?

मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत गठित स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की पहली बैठक ने पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के उभरते सुरक्षा समीकरण को नया और अधिक संगठित रूप दे दिया है। इस्तांबुल में हुई इस अहम बैठक में केवल रक्षा सहयोग बढ़ाने की बात नहीं हुई, बल्कि ‘मक्का डिफेंस अलायंस’ को संस्थागत ढांचा देने, सऊदी अरब में स्थायी सचिवालय स्थापित करने और उसके शुरुआती तीन वर्षों के नेतृत्व की जिम्मेदारी पाकिस्तान को सौंपने जैसे बड़े फैसले लिए गए। यही वह मोड़ है, जहां अब यह समझौता महज एक राजनीतिक घोषणा से आगे बढ़कर संभावित क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

हम आपको याद दिला दें कि 7 अगस्त को तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस एवं प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसकी तुलना नाटो के अनुच्छेद-5 जैसी सामूहिक रक्षा अवधारणा से की है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गठबंधन किसी विशेष देश के खिलाफ नहीं है और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का स्थान भी नहीं लेगा।

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बैठक के बाद सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यह रही कि रियाद में मक्का डिफेंस अलायंस का स्थायी सचिवालय स्थापित किया जाएगा। इस सचिवालय का नेतृत्व महासचिव करेगा और शुरुआती तीन वर्षों के लिए पहला महासचिव पाकिस्तान से होगा। यह फैसला पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान के अनुसार, तीनों देशों ने गठबंधन के संस्थागत ढांचे की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है। भविष्य में इसकी कार्यप्रणाली, बैठकों की व्यवस्था, राजनीतिक और सैन्य समन्वय तथा अन्य देशों की सदस्यता के नियमों पर भी रूपरेखा तैयार की जाएगी।

हम आपको बता दें कि इस्तांबुल बैठक का एजेंडा बेहद व्यापक था। इसमें रक्षा क्षमताओं का विस्तार, तीनों सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी संचालनात्मक तालमेल, संयुक्त सैन्य उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी सहयोग, लॉजिस्टिक्स, प्रशिक्षण, खुफिया साझेदारी और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे मुद्दे शामिल रहे। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्किये का रक्षा उद्योग तेजी से उभर रहा है, पाकिस्तान परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश होने के साथ रक्षा उत्पादन और सैन्य सहयोग का लंबा अनुभव रखता है, जबकि सऊदी अरब अपनी घरेलू रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश कर रहा है। यदि यह त्रिकोण संयुक्त अनुसंधान और उत्पादन तक पहुंचता है तो इसके परिणाम केवल सैन्य अभ्यासों तक सीमित नहीं रहेंगे।

देखा जाये तो यह बैठक ऐसे समय हुई जब पश्चिम एशिया और उसके आसपास का सुरक्षा वातावरण अत्यंत अस्थिर है। ईरान-अमेरिका तनाव, होरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा, लाल सागर में हूती हमले, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और गाजा शांति समझौते के दूसरे चरण से जुड़ी चुनौतियां भी चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल रहीं। हम आपको बता दें कि तुर्किये और पाकिस्तान को सऊदी अरब के नेतृत्व वाली लाल सागर सुरक्षा पहलों में रचनात्मक भूमिका निभाने वाले देशों के रूप में देखा जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि गठबंधन की सोच केवल सदस्य देशों की सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि समुद्री सुरक्षा और व्यापक क्षेत्रीय संकटों तक फैल सकती है।

साथ ही मक्का डिफेंस अलायंस के भविष्य का दूसरा बड़ा सवाल इसके विस्तार का है। फिलहाल मिस्र सबसे संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। मिस्र पहले से तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े आर-4 तंत्र का हिस्सा है और हाकान फिदान भी मिस्र की भागीदारी की इच्छा जता चुके हैं। बांग्लादेश का नाम भी संभावित भविष्य के संदर्भ में सामने आया है, हालांकि उसकी सदस्यता फिलहाल एजेंडे में नहीं दिखती। तुर्किये और पाकिस्तान सहित संस्थापक देशों की प्राथमिकता पहले तीन-सदस्यीय ढांचे को प्रभावी बनाना है। इसके बाद विस्तार का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

उधर, भारत के लिए इस घटनाक्रम को केवल एक और इस्लामी देशों के मंच के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब का रक्षा सहयोग यदि संस्थागत, तकनीकी और सैन्य स्तर पर गहरा होता है, तो यह दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच एक नए रणनीतिक संपर्क का निर्माण कर सकता है।

पहला महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान की भूमिका है। सचिवालय के शुरुआती नेतृत्व और पहले महासचिव का पद पाकिस्तान को मिलने से उसे गठबंधन की संस्थागत दिशा तय करने में प्रभाव मिल सकता है। साथ ही, तुर्किये की उन्नत रक्षा तकनीक और पाकिस्तान की सैन्य क्षमता का संयोजन भविष्य में रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खोल सकता है। हालांकि भारत के लिए सबसे जटिल स्थिति तब बन सकती है, जब गठबंधन का विस्तार होगा। मिस्र भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, इसलिए काहिरा की संभावित सदस्यता नई दिल्ली के लिए विशेष ध्यान का विषय होगी। दूसरी ओर, यदि भविष्य में बांग्लादेश जैसे दक्षिण एशियाई देश भी किसी व्यापक सुरक्षा ढांचे से जुड़ते हैं, तो क्षेत्रीय समीकरण और अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।

बहरहाल, इस्तांबुल की पहली बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मक्का समझौता अब केवल हस्ताक्षरित दस्तावेज नहीं रहना चाहता। रियाद में सचिवालय, पाकिस्तान का प्रारंभिक नेतृत्व, संयुक्त रक्षा उत्पादन, सैन्य तालमेल और विस्तार की संभावना, ये सभी संकेत एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की ओर इशारा करते हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मक्का डिफेंस अलायंस नाटो जैसी प्रभावी सैन्य संरचना बन जाएगा क्योंकि इसके वास्तविक सैन्य दायित्व और संचालनात्मक व्यवस्था अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन एक बात तय है कि पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने अब एक ऐसा संस्थागत मंच बनाना शुरू कर दिया है, जिसकी दिशा और विस्तार आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र के रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

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  Sports

Ajit Agarkar का Contract रिन्यू नहीं करेगा BCCI, नए Chief Selector के लिए Shortlist तैयार

खबरों के मुताबिक, भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) ने पुरुष क्रिकेट टीम की सिलेक्शन कमिटी के अगले चेयरमैन को नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अजीत अगरकर का कार्यकाल आगे बढ़ने की संभावना कम है। अगरकर को पहली बार जुलाई 2023 में इस पद पर नियुक्त किया गया था और उनका मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट 4 अक्टूबर तक है।  ऐसी संभावना थी कि भारत के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ को 2027 वनडे वर्ल्ड कप तक के लिए एक और कार्यकाल दिया जाएगा, लेकिन हाल की घटनाओं के कारण शायद उनका कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू नहीं हो पाएगा।

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NDTV के अनुसार, BCCI के मन में पहले से ही दो नाम हैं। इनमें भारत के पूर्व विकेटकीपर-बल्लेबाज़ पार्थिव पटेल और प्रज्ञान ओझा (जो अभी सिलेक्शन पैनल का हिस्सा हैं) मुख्य दावेदार हैं। अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक, सेलेक्टर्स ने पूर्व कप्तान रोहित शर्मा को बता दिया था कि वे अब उनकी योजनाओं का हिस्सा नहीं हैं। वे अगले साल होने वाले ODI वर्ल्ड कप की तैयारी के लिए युवा खिलाड़ियों को नियमित मौके देने पर ध्यान देना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने रोहित पर ही यह फैसला छोड़ा था कि वे अपने ODI करियर के बारे में क्या सोचते हैं, जबकि रोहित पहले ही टेस्ट और T20I से संन्यास ले चुके हैं।

इस रिपोर्ट से मचे हंगामे के बाद, BCCI सेक्रेटरी देवजीत सैकिया ने खुद साफ़ किया कि रोहित को रिटायरमेंट के लिए मजबूर करने का कोई प्लान नहीं है और जब तक वह टीम की योजनाओं का हिस्सा रहेंगे, तब तक इस अनुभवी बल्लेबाज़ को चुना जाता रहेगा। हालांकि, सैकिया की इन बातों से सेलेक्टर खुश नहीं थे, क्योंकि खबरों के मुताबिक उन्होंने रोहित से बात करने से पहले ही बोर्ड को अपने फ़ैसले के बारे में बता दिया था। कहा जा रहा है कि इस बात से अगरकर नाराज़ हो गए।

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भारत की पिछली वनडे सीरीज़ में इंग्लैंड के खिलाफ़ लगातार कम स्कोर बनाने के बाद रोहित पर दबाव बढ़ रहा था। हालांकि, 39 साल के इस खिलाड़ी ने आखिरी वनडे में शानदार 138 रन बनाकर चयनकर्ताओं को एक कड़ा संदेश दिया। BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने रोहित के भविष्य को लेकर आ रही खबरों को तुरंत खारिज कर दिया और कहा कि जब तक रोहित चयनकर्ताओं की योजनाओं का हिस्सा रहेंगे, तब तक वह देश का प्रतिनिधित्व करते रहेंगे।

Thu, 17 Sep 2026 17:30:00 +0530

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