ओपनएआई का 90 साल पुरानी गणित पहेली सुलझाने का दावा:यह दुनिया के 7 सबसे मुश्किल सवालों में एक; 88 घंटे में जवाब ढूंढा
ओपनएआई ने दावा किया है कि उसकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक ने गणित की दुनिया के सबसे मुश्किल सवालों में से एक को सॉल्व कर दिया है। AI को इसे सुलझाने में सिर्फ 88 घंटे लगे। 90 साल पुराने इस सवाल को नेवियर–स्टोक्स प्रॉब्लम कहा जाता है। प्रतिष्ठित मैथ्स इंस्टीट्यूट क्ले मैथमेटिक्स ने साल 2000 में 7 मुश्किल सवाल चुने थे, इनमें यह भी शामिल था। इन 7 सवालों को ‘मिलेनियम प्रॉब्लम्स’ कहा गया। इनमें किसी एक को भी हल करने पर 10 लाख डॉलर का इनाम रखा गया था। ओपनएआई के इस दावे से पहले इन सात में से सिर्फ एक सवाल हल हुआ था। यानी ओपन एआई का कंपनी का दावा सही है तो अब तक दो सवालों के जवाब ढूंढ़ निकाले गए हैं। पहले समझिए, नेवियर–स्टोक्स प्रॉब्लम क्या है मान लीजिए आपने एक गिलास पानी फर्श पर गिरा दिया। पानी इधर-उधर फैलने लगेगा। वैज्ञानिक गणित की मदद से यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि पानी किस दिशा में जाएगा, कितनी तेजी से जाएगा और उसका बहाव कैसा होगा। इसके लिए कुछ गणितीय समीकरण हैं, जिन्हें नेवियर–स्टोक्स इक्वेशन कहा जाता है। अब वैज्ञानिकों की समस्या यह थी: ओपनएआई का दावा क्या है? ओपनएआई ने एक नए AI मॉडल से इस सवाल का हल निकाला। यह मॉडल अभी आम लोगों के लिए जारी नहीं किया गया है, न ही नाम का खुलासा किया है। ओपनएआई ने अपने नए मॉडल को GPT-6 अस्ट्रा से भी ज्यादा सक्षम इंटरनल मॉडल बताया है। GPT-6 अस्ट्रा 3 सितंबर 2026 को रिलीज हुआ है। AI ने यह काम अकेले एक सिस्टम की तरह नहीं किया। ओपनएआई ने करीब 10,000 AI एजेंट्स को इस काम में लगाया था। इस दौरान AI एजेंट्स ने करीब 30 लाख मैसेज का आदान-प्रदान किया। 4 में 2 बातें साबित यानी पूरी समस्या हल नहीं ओपनएआई के मुताबिक, AI ने इस सवाल से जुड़ी चार में से दो अहम बातों को साबित किया यानी पूरी समस्या हल नहीं हुई है। ओपनएआई सवाल हल करने के बाद 10 लाख डॉलर के प्राइज का दावा नहीं करेगी। ओपनएआई पर रिसर्च चुराने का आरोप 7 मिलेनियम प्रॉब्लम्स 1. रिमान हाइपोथिसिस किस बारे में: प्राइम नंबर्स (अभाज्य संख्याएं) यानी 2, 3, 5, 7 जैसी संख्याएं। सवाल: ये संख्याएं देखने में बेतरतीब लगती हैं, लेकिन क्या इनके पीछे कोई छिपा हुआ नियम या पैटर्न है, जिससे पता चल सके कि अगला प्राइम नंबर्स कहां मिलेगा? अनसुलझी: 1859 से 2. P vs NP किस बारे में: कंप्यूटर के लिए मुश्किल सवाल। सवाल: क्या कंप्यूटर हर ऐसे मुश्किल सवाल का जवाब जल्दी ढूंढ सकता है, जिसका सही जवाब मिलने के बाद उसे जल्दी जांचा जा सकता है? उदाहरण: जैसे किसी बहुत बड़ी पहेली का सही जवाब मिल जाए तो उसे चेक करना आसान है। लेकिन सही जवाब खुद ढूंढना बहुत मुश्किल हो सकता है। P vs NP यही पूछता है कि क्या कंप्यूटर के लिए ऐसे जवाब ढूंढना भी उतना ही आसान हो सकता है। अनसुलझी: 1971 से 3. नेवियर स्टोक्स प्रोब्लम किस बारे में: पानी और हवा के बहने के बारे में। सवाल: पानी या हवा कैसे बहती है, इसे बताने वाली गणित सुलझी: 2026 में (सुलझाने का दावा) 4. यांग–मिल्स और मास गैप किस बारे में: बहुत छोटे कणों और उनकी ऊर्जा के बारे में। सवाल: क्या सबसे कम ऊर्जा वाले कण और उससे ज्यादा ऊर्जा वाले कण के बीच एक निश्चित न्यूनतम अंतर होता है? अनसुलझी: 2000 से 5. हॉज कन्जेक्चर किस बारे में: बहुत मुश्किल आकृतियों के बारे में। सवाल: क्या इन मुश्किल आकृतियों को आसान गणितीय समीकरणों की मदद से समझाया जा सकता है? अनसुलझी: 1950 से 6. बर्च एंड स्विनर्टन-डायर कन्जेक्चर किस बारे में: खास तरह के गणितीय समीकरणों के बारे में। सवाल: क्या समीकरण को देखकर यह पता लगाया जा सकता है कि उसके कितने संभावित जवाब हो सकते हैं? अनसुलझी: 1965 से 7. प्वांकारे कन्जेक्चर किस बारे में: 3D आकृतियों के बारे में। सवाल: अगर कोई 3D आकृति गोल है और उसमें कोई छेद नहीं है तो क्या वह असल में 3D गोले जैसी ही होगी? सुलझी: 2002-03 में यह करीब 100 साल पुरानी गणितीय पहेली थी, जिसे फ्रांसीसी गणितज्ञ हेनरी प्वांकारे ने 1904 में सामने रखा था। रूसी गणितज्ञ पेरेलमैन के इसका हल निकाला। उन्हें इसके लिए 10 लाख डॉलर का इनाम देने की घोषणा की गई। हालांकि, पेरेलमैन ने यह इनामी राशि स्वीकार नहीं की। AI इतना मुश्किल गणित कैसे कर पा रहा है? AI को हजारों गणित के सवाल हल करने के लिए दिए जाते हैं। वह अलग-अलग तरीके आजमाता है और सही-गलत से सीखता है। इस तरह रिइनफोर्समेंट लर्निंग की मदद से AI धीरे-धीरे ऐसे तरीके सीखता है, जिनसे मुश्किल सवाल हल करने की संभावना बढ़ जाती है। यह पहली बार नहीं है जब AI ने बड़ी गणितीय समस्या हल करने का दावा किया है। जनवरी में ओपनएआई ने हंगरी के मशहूर गणितज्ञ पॉल इरदोस की एक गणितीय समस्या हल करने की जानकारी दी थी। गणितज्ञों को AI से चिंता क्यों है? AI की क्षमता से कई गणितज्ञ खुश हैं, लेकिन कुछ को चिंता भी है। टेरेंस ताओ का कहना है कि किसी मुश्किल गणितीय सवाल को खुद हल करना जरूरी है। इससे गणितज्ञ नई चीजें सीखते हैं और उनकी समझ बढ़ती है। उन्होंने इसे जिम का उदाहरण देकर समझाया। अगर मशीन आपके लिए 100 किलो वजन उठा दे तो वजन तो उठ जाएगा, लेकिन आपकी ताकत नहीं बढ़ेगी। इसी तरह अगर AI मुश्किल गणितीय सवाल खुद हल करने लगे और इंसानों को सिर्फ जवाब मिले तो हो सकता है कि इंसान गणित को समझने और खुद समस्या हल करने की क्षमता खोने लगें। फिर AI का फायदा क्या है? AI का सबसे बड़ा फायदा इसकी रफ्तार है। एक इंसान किसी गणितीय समस्या के हजारों संभावित रास्ते आजमाने में बहुत लंबा समय लगा सकता है। AI बहुत कम समय में बड़ी संख्या में संभावनाएं जांच सकती है। इससे गणितज्ञों को ऐसे रास्ते मिल सकते हैं, जिनके बारे में उन्होंने पहले नहीं सोचा था। लेकिन यहां दूसरी चिंता भी है। अगर AI खुद रास्ता खोज लेती है और इंसान सिर्फ उस रास्ते पर चलकर जवाब तक पहुंचते हैं, तो हो सकता है कि इंसान उस खोज की पूरी प्रक्रिया को समझ ही न पाएं। ताओ ने इसे जंगल में छिपे झरने के उदाहरण से समझाया। अगर कोई खुद जंगल में रास्ता खोजकर झरने तक पहुंचता है, तो रास्ता खोजने की पूरी प्रक्रिया में उसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। लेकिन अगर कोई मशीन पहले ही रास्ता खोजकर बता दे, तो बाकी लोग सीधे उसी रास्ते से झरने तक पहुंच सकते हैं। ----------------------- यह खबर भी पढ़ें… UN ने बदला दुनिया का नक्शा, अमेरिका ने विरोध किया:नए मैप में अफ्रीका बड़ा, यूरोप-US छोटे; जानिए भारत पर इसका क्या असर दुनिया का नक्शा अब कुछ बदला नजर आएगा। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है। भारत ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। अमेरिका प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वाला अकेला देश रहा। पूरी खबर यहां पढ़ें…
अमेरिका-ब्रिटेन में ग्रेजुएट्स की कमाई चार साल में 10% घटी:डिग्री नहीं, स्किल टेक्नोलॉजी और एआई बदल रहे नौकरी का गणित
अमेरिका और ब्रिटेन के नए आंकड़े बताते हैं कि नॉन-ग्रेजुएट्स के मुकाबले कॉलेज डिग्री वालों को मिलने वाला सैलरी का फायदा घट रहा है। अर्थशास्त्रियों होजे अजार, मिरेया गिने और जेवियर एस्पिन की रिसर्च के मुताबिक अमेरिका में कॉलेज ग्रेजुएट्स का वेतन प्रीमियम 4 वर्षों में लगातार गिरा है। कुल गिरावट करीब 10% है। यह 1970 के दशक के बाद पहली बड़ी गिरावट मानी जा रही है। 100 साल से भी ज्यादा समय में पहली बार ग्रेजुएट्स की मांग घट रही है। ब्रिटेन में भी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स की डिग्री वालों का फायदा कम हो रहा है। एआई खासतौर पर उन व्हाइट-कॉलर और नॉलेज-वर्क जॉब्स को बदल रहा है, जिन पर लंबे समय से ग्रेजुएट्स का दबदबा था। भारत में डिग्रीधारी बढ़े लेकिन नौकरियां नहीं अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026 रिपोर्ट के अनुसार 2004 से 2023 के बीच युवाओं में ग्रेजुएट्स की संख्या 10% से बढ़कर 28% हो गई। लेकिन हर साल बढ़ने वाले ग्रेजुएट्स के अनुपात में नौकरियां नहीं बन रहीं। करीब 50 लाख नए ग्रेजुएट्स जॉब मार्केट में आते हैं, जबकि करीब 28 लाख जॉब पैदा होती हैं। बेरोजगार युवाओं में अब करीब दो-तिहाई ग्रेजुएट हैं। सर्वे - 70-90% एम्पलॉयर्स स्किल बेस्ड भर्ती कर रहे अमेरिका के नेशनल एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेस एंड एम्पलाइज की रिपोर्ट में करीब 70% नियोक्ता अब स्किल्स-बेस्ड हायरिंग कर रहे हैं। फोर्ब्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब 90% कंपनियां डिग्री के बजाय कौशल के आधार पर भर्तियां करती हैं। 94% एम्पलॉयर्स का मानना है कि स्किल बेस्ड हायरिंग डिग्री, सर्टिफिकेट या अनुभव के आधार पर हायरिंग से बेहतर है। बदलाव - कई देशों में डिग्री की जरूरत में कमी आ रही देश - कमी यूएस - 3.9% यूके - 1.8% ऑस्ट्रेलिया - 1.6% (स्रोत- बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप)
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