Uncovered With Manoj Gairola: सऊदी को धोखा दे गया अमेरिका? क्या अब रियाद पर कब्जा कर लेंगे हूती लड़ाके?
Uncovered With Manoj Gairola: अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना जानलेवा है…ये बात अमेरिका के इतिहास के सबसे विख्यात और कॉन्ट्रोवर्सियल डिप्लोमैट हेनरी किसिंजर ने 19६८ में कही थी. और 5८ साल बाद आज सऊदी अरब को ये बात ढंग से समझ में आ रही होगी. अमेरिका का दोस्त बनकर सऊदी अरब आज ऐसी मुसीबत में फंस गया है, जहां से उसका बाहर निकलना लगभग नामुमकिन लगता है.
यमन के हूती फाइटर्स ने एक तरह से सऊदी अरब की सांस रोक दी है. सऊदी अरब किसी भी रास्ते से अपना तेल नहीं बेच पा रहा है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई है. यमन में सऊदी अरब की फंडिंग से चलने वाली फौज हूतियों के आगे घुटने टेक रही है. हूती लड़ाके यमन के एक के बाद एक शहरों पर कब्जा कर रहे हैं. अब तो डर ये है कि हूती फाइटर्स सऊदी अरब में ना घुस आएं. ताज्जुब की बात ये है कि जिस अमेरिका से दोस्ती करके सऊदी अरब खाड़ी में अपनी धौंस जमाता था, वह अमेरिका आज दूर खड़ा तमाशा देख रहा है।
यहां तक की हूती हमले से बचने के लिए सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएस ने बेचैन होकर, एक ही दिन में दो बार ट्रंप को कॉल लगाया. लेकिन ट्रंप ने साफ कर दिया कि वो हूतियों से सऊदी अरब को बचाने के लिए कोई फौजी मदद नहीं करेंगे. एक तरफ जहां सऊदी अरब की जान अटकी है, वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने इस हालात का मजाक उड़ाते हुए आयरलैंड में एक बयान दिया और कहा कि हूतियों के साथ हमारी अंडरस्टैंडिंग बन चुकी है और हूती सिर्फ सऊदी जहाजों पर ही अटैक करेंगे.
आखिर अमेरिका से दोस्ती करके सऊदी अरब बुरी तरह फंस गया है. कहां तो वो सोच रहा था कि पूरे मिडल ईस्ट में उसका दबदबा होगा और कहां उसे खुद को संभलना ही मुश्किल हो गया.
सबसे पहले आपको बताते हैं कि सऊदी अरब किस तरह मुसीबत में फंसा हुआ है. सऊदी के एक तरफ फारस की खाड़ी है. तो दूसरी तरफ लाल सागर. सऊदी अरब की पूरी अर्थव्यस्था उसके तेल के कारोबार से चलती है. वो ये तेल या तो फारस की खाड़ी के रास्ते बेच सकता है या फिर लाल सागर के रास्ते. ईरान युद्ध के चलते स्ट्रेट-ऑफ़-हॉर्मुज लगभग बंद है. ऐसी ही मुसीबत से निपटने के लिए उसने अरबों डॉलर खर्च करके ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बनाई थी. ताकि हॉर्मुज के बंद होने पर वो लाल सागर के रास्ते से अपना तेल बेच पाए.
ईरान युद्ध शुरू होने से पहले सऊदी अरब 10 मिलियन बैरल तेल प्रतिदिन के हिसाब से बेचता था. इसमें से 90% तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जाता था. लेकिन जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद किया तो उसने अपनी 1200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को फुली एक्टिवेट कर दिया. और अब लाल सागर के रास्ते 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के हिसाब से तेल जाने लगा.
लेकिन जब यमन के हूती फाइटर्स ने स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब को सऊदी जहाजों के लिए बंद कर दिया तो उसका तेल बिकना बिलकुल ही बंद हो गया। लाल सागर का रास्ता यहीं से गुजरता है। 10 सितंबर को हुए ड्रोन हमलों में इराक़ी militants ने रियाद और मदीना रीजन में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के कुछ हिस्सों को उड़ा दिया. और उसमें आग लग गई. 11 सितंबर को सऊदी सरकार ने इस पाइपलाइन को पूरे तरीके से बंद करने की घोषणा कर दी. यानी अब सऊदी अरब से एक बूंद तेल भी बाहर नहीं जा सकता. यानी सऊदी की पूरी इकॉनमी एक तरह से ठप्प हो गई। लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं है.
शिया बनाम सुन्नी की हुई लड़ाई
सऊदी अरब के दक्षिण-पश्चिम में है - यमन. यहां कई सालों से सिविल वॉर चल रही है. सऊदी अरब अपने पैसों के दम पर यहां अब्दुल्ला सालेह की सरकार को मदद करता रहा. और जब हूती फ़ाइटर्स ने सालेह की सरकार के खिलाफ बगावत की, तो सऊदी अरब ने उन्हें कुचलने के लिए सालेह सरकार को फौजी मदद दी. वहीं दूसरी तरफ हूतियों के साथ ईरान खड़ा था. और अब ये लड़ाई शिया बनाम सुन्नी की हो गई. हूतियों ने अब्दुल्ला सालेह को हराकर देश से भगा दिया. राजधानी सना पर कब्जा कर लिया. और आज बाब-अल-मंदेब के करीब वाले यमन के एक बड़े हिस्से पर हूतियों की हुकूमत चलती है. सऊदी अरब आज भी हूतियों के विरोधी गुटों को पैसे और हथियारों से मदद करता है. लेकिन अब जब हूती बेहद आक्रामक होकर हमले कर रहे हैं, तो सऊदी अरब के पैसों से पलने वाली हूती विरोधी फौज एक के बाद एक शहर हारती जा रही है.
जब हूती लड़ाकों ने सबसे अहम मोखा शहर पर हमला किया, तब यमन की सरकारी फौज ने सऊदी से एयर सपोर्ट मांगा. लेकिन सऊदी से कोई एयर सपोर्ट नहीं पहुंचा. कहने को तो सऊदी अरब की एयरफोर्स काफी पावरफुल है. इसमें करीब 300 फाइटर जेट्स हैं. लेकिन जरूरत पड़ने पर ये उड़ ही नहीं सके. बताया जाता है कि इनको ऑपरेशनल करने के लिए सऊदी अरब के पास लोग ही नहीं है. नतीजा ये रहा कि मोखा हूतियों के कब्जे में आ गया. और इसके तुरंत बाद हूतियों ने पेरि आईलैंड पर भी कब्जा कर लिया. ये वो लोकेशन हैं जिनपर कब्जा करके हूतियों का अब पूरे लाल सागर के ट्रैफिक पर कंट्रोल हो गया है. हूती पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि इस रास्ते से सऊदी अरब के किसी भी जहाज को गुजरने नहीं देंगे. यानी सऊदी अरब की इकॉनमी के पूरी तरह ठप होने की आशंका खड़ी हो गई है.
सिविल वॉर में यमन में सऊदी का हद से ज्यादा दखल
पूरे मिडिल ईस्ट में सबसे ज्यादा तेल बेचने वाला सऊदी अरब आज काफी मजबूर नजर आ रहा है. लेकिन अपनी इस ख़राब हालत के लिए उसकी खुद की पॉलिसी ही जिम्मेदार हैं. अमेरिका से हुई दोस्ती और अपने पेट्रो डॉलर की कमाई के दम पर सऊदी खुद को मिडिल ईस्ट का सबसे पावरफुल मुल्क समझने लगा था. ईरान के साथ तो सऊदी की दुश्मनी पुरानी है, लेकिन कतर और यूएई जैसे देशों के साथ भी उसके संबंध खराब हैं. यमन की सिविल वॉर में सऊदी ने हद से ज्यादा दखल दिया है. सऊदी जहाजों ने हूतियों के ठिकानों पर खूब बम बरसाए। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि हूती हर तरह से सऊदी अरब पर हावी नजर आ रहे हैं.
आज जब सऊदी मुसीबत में हैं तो उनके साथ कोई नहीं खड़ा। अमेरिका ने तो पहले ही डिफेंस एग्रीमेंट को मानने से इनकार कर दिया था. वैसे सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान और तुर्की के साथ भी मक्का एग्रीमेंट किया था. लेकिन मुसीबत के वक्त ये दोनों भी सामने नहीं आये। हूतियों के सिर पर ईरान का हाथ है और पाकिस्तान और टर्की की हिम्मत नहीं है कि वो ईरान से टकरा सके. ईरान इन दोनों देशों का पड़ोसी है और उसकी मिसाइलों की रेंज में ये दोनों देश आते हैं.
यानी सऊदी अरब ने पैसों के दम पर अपनी सुरक्षा के लिए जिन-जिन देशों को ठेका दिया था वो सब ऐन वक्त पर पीछे हट गए. सऊदी अरब उन हूती फाइटर्स से हारने की कगार पर खड़ा है जिनके पांवों में जूते तक नहीं है. वो कंधों पर मिसाइलें लेकर लगातार आगे बढ़ रहे हैं.
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