डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान के मुद्दे का शांत और गहन अध्ययन जरूरी है: निर्मला सीतारमण
बेंगलुरु, 16 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को कहा कि डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कराधान से जुड़े फैसले लेते समय भारत, अन्य देशों और भविष्य में आने वाले निवेश पर पड़ने वाले प्रभावों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए।
बेंगलुरु में इंटरनेशनल टैक्स रिसर्च एंड एनालिसिस फाउंडेशन (आईटीआरएएफ) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि क्लाउड सेवाओं, डिजिटल उत्पादों और डिजिटल सेवाओं की खपत से जुड़े मामलों में यह तय करना आसान नहीं है कि कर कहां लगाया जाए और किस पर लगाया जाए।
उन्होंने कहा, इस जटिलता का शांतिपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए। भारत पर इसके प्रभाव, अन्य देशों पर इसके प्रभाव और सबसे महत्वपूर्ण, भारत में भविष्य में आने वाले निवेश पर इसके असर का भी गहराई से अध्ययन होना चाहिए।
सीतारमण ने वैश्विक टू-पिलर टैक्स वार्ताओं में भारत के अनुभव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन वार्ताओं के दौरान भारत ने डिजिटल कंपनियों पर लगाए गए दो करों को वापस लिया था, ताकि उभरते हुए वैश्विक समझौते के प्रति विश्वास बढ़ाया जा सके।
हालांकि उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को केवल भारत के कर राजस्व में संभावित नुकसान के नजरिए से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि डिजिटल कारोबार पर कराधान व्यापक वैश्विक वार्ताओं का हिस्सा है।
वित्त मंत्री ने कहा कि भविष्य में कर नीति की चर्चा में महत्वपूर्ण आर्थिक उपस्थिति (सिग्निफिकेंट इकोनॉमिक प्रेजेंस), वर्चुअल परमानेंट एस्टैब्लिशमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रोबोटिक्स, गिग इकोनॉमी, वैश्विक गतिशीलता, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर और डिजिटल लेनदेन में वस्तुओं और सेवाओं के वर्गीकरण जैसे विषय प्रमुख होंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार एक ऐसे संस्थागत तंत्र के लिए तैयार है जो यह स्पष्टता प्रदान कर सके कि डिजिटल लेनदेन को जीएसटी और आयकर कानूनों के तहत वस्तु माना जाए या सेवा। इस संबंध में उन्होंने उद्योग जगत से सुझाव और प्रस्ताव भेजने का आग्रह किया।
सीतारमण ने कहा कि डिजिटल लेनदेन में वस्तुओं और सेवाओं के बीच अंतर करना पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है क्योंकि व्यवसाय अब सीमाओं के पार संचालित हो रहे हैं।
उन्होंने कर विशेषज्ञों, उद्योग संगठनों और शोधकर्ताओं से कहा कि वे केवल कम कर दरों, छूटों और रियायतों की मांग तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसे प्रावधानों की पहचान करने में भी योगदान दें जो अब कर प्रणाली के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं।
उन्होंने कहा कि उद्योग संगठनों को उन प्रावधानों के बारे में भी सुझाव देने चाहिए जिन्हें हटाया जाना चाहिए, भले ही वर्तमान में उनसे उन्हें लाभ मिल रहा हो।
वित्त मंत्री ने कहा, परामर्श का अर्थ केवल सभी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना नहीं होना चाहिए। यह तथ्यों, अनुभवों और विचारों पर आधारित एक वास्तविक प्रक्रिया होनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि जीएसटी परिषद की अगली बैठक 7 अक्टूबर को होगी, जिसमें जीएसटी 2.0 के तहत प्रक्रिया संबंधी सुधारों पर चर्चा की जाएगी। इनमें ई-इनवॉइसिंग से जुड़े मुद्दे भी शामिल होंगे।
सीतारमण ने कहा कि पिछली जीएसटी परिषद बैठक में दरों के युक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जबकि प्रक्रिया सुधारों को अगली बैठक तक के लिए स्थगित कर दिया गया था।
उन्होंने उद्योग जगत को जीएसटी ढांचे में मौजूद किसी भी विसंगति के बारे में सरकार को विशेष सुझाव भेजने के लिए भी आमंत्रित किया।
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ने 2014 के बाद से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमाओं का लगातार विस्तार किया है और अब अधिकांश निवेश स्वचालित मार्ग से आ रहे हैं। केवल सुरक्षा से जुड़े कुछ क्षेत्रों में ही प्रतिबंध लागू हैं।
उन्होंने कहा कि चीन प्लस वन रणनीति के तहत वैश्विक निवेशक अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं और भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति उन्हें आकर्षित कर रही है।
सीतारमण ने गिफ्ट सिटी की भूमिका का भी उल्लेख किया और कहा कि यह ऑफशोर पूंजी को भारत तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने रखरखाव, मरम्मत एवं ओवरहाल (एमआरओ), जहाज निर्माण, जहाज मरम्मत और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में इसके बढ़ते योगदान को रेखांकित किया।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
यूपीआई पर मामूली शुल्क से डिजिटल भुगतान व्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में मिल सकती है मदद: अशोक कुमार लाहिड़ी
नई दिल्ली, 16 सितंबर (आईएएनएस)। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने बुधवार को कहा कि कुछ यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मामूली शुल्क लगाने से डिजिटल भुगतान व्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि यह शुल्क जितना संभव हो उतना कम रखा जाना चाहिए ताकि उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
लाहिड़ी ने कहा कि यूपीआई के लिए यूजर-पे सिद्धांत पर विचार किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि व्यवसायों को भी डिजिटल पेमेंट से बड़ा लाभ मिलता है, क्योंकि इससे उन्हें चेक जमा करने और नकदी संभालने जैसी प्रक्रियाओं की लागत और परेशानी से बचाव होता है।
जब उनसे पूछा गया कि 2,000 रुपए से अधिक के यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने से क्या डिजिटल भुगतान को नुकसान हो सकता है, तो उन्होंने कहा, इसे जितना संभव हो उतना कम रखें, लेकिन कृपया इसे लागू करें ताकि यूपीआई एक आत्मनिर्भर व्यवसाय बन सके।
इस दौरान बिलडेस्क के निदेशक और सह-संस्थापक श्रीनिवासु एमएन ने कहा कि यूपीआई रोजमर्रा के भुगतान के लिए उपभोक्ताओं की जीवनरेखा बन चुका है। इसके पीछे बैंकों, वित्तीय संस्थानों और पूरे भुगतान इकोसिस्टम द्वारा किए गए बड़े निवेश का योगदान रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत में यूपीआई उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ को पार कर चुकी है और जैसे-जैसे इसका विस्तार होगा, धोखाधड़ी रोकथाम, साइबर सुरक्षा और उपभोक्ता जागरूकता जैसी तकनीकों में और अधिक निवेश की जरूरत पड़ेगी।
श्रीनिवासु ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित यूपीआई शुल्क उपभोक्ताओं या छोटे मूल्य के व्यापारी लेनदेन पर लागू नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह शुल्क केवल 2,000 रुपए से अधिक के सीमित लेनदेन पर लागू होगा। वहीं बिजली-पानी के बिल, सरकारी कर भुगतान, बीमा प्रीमियम और ईंधन भुगतान जैसे कुछ नियमित भुगतानों पर रियायती शुल्क का प्रावधान होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) से प्राप्त राशि का एक हिस्सा ऐसे विशेष फंड में डाला जा सकता है, जिसका उपयोग खासकर छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए किया जाए।
लाहिड़ी ने यह भी कहा कि वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के बीच भारतीय कंपनियों को नए निर्यात बाजारों की पहचान खुद करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार की बजाय निजी क्षेत्र को यह तय करना चाहिए कि भारतीय उत्पादों की मांग किन देशों और क्षेत्रों में बेहतर हो सकती है।
उन्होंने कहा, दुनिया बहुत बड़ी है। उन्होंने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया में मौजूद अवसरों का उल्लेख किया, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी एक विशेष बाजार का नाम बताना आसान नहीं है।
श्रीनिवासु ने कहा कि भारत आज खुदरा डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी है और दुनिया के कुल खुदरा डिजिटल लेनदेन में आधे से अधिक हिस्सेदारी भारत की है। हालांकि उन्होंने कहा कि यूपीआई अभी लगभग 50 करोड़ उपयोगकर्ताओं तक पहुंचा है, जिससे इसके आगे और विस्तार की पर्याप्त संभावनाएं बनी हुई हैं।
--आईएएनएस
डीबीपी
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