सूखी लाल मिर्च के बीज से उगाएं हरी मिर्च, गमले में ऐसे तैयार होगा पौधा, बस सही मिट्टी और पानी का रखना होगा ध्यान
Grow Green Chilli In Pot: गमले में हरी मिर्च का पौधा घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है. सूखी लाल मिर्च के बीज से शुरुआत करें, अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी रखें और पौधे को पर्याप्त धूप दें. समय पर पानी, खाद और हल्की प्रूनिंग से पौधे की बढ़त बेहतर रखी जा सकती है.
सेवा का संकल्प, सशक्त भारत का संकल्प: दिव्यांगजन सशक्तीकरण से विकसित भारत की ओर
सेवा का संकल्प, सशक्त भारत का संकल्प
(बी. एल. वर्मा, केंद्रीय राज्य मंत्री, उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता)
किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का आकलन केवल उसके आर्थिक विस्तार या वैश्विक प्रभाव से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होता है कि वह समाज के प्रत्येक वर्ग की गरिमा, समान अवसर, अधिकारों और अंतर्निहित क्षमताओं को किस हद तक सुनिश्चित करता है। भारतीय संस्कृति में ‘सेवा’ सदैव लोककल्याण, संवेदनशीलता और सामूहिक उत्तरदायित्व का आधार रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिवस 17 सितंबर को ‘सेवा दिवस’ के रूप में मनाते हुए और ‘सेवा संकल्प अभियान’ का शुभारंभ करते हुए हम इसी राष्ट्रीय सेवा-भावना को नई ऊर्जा और व्यापक जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं।
विगत एक दशक से अधिक समय में दिव्यांगजन सशक्तीकरण के क्षेत्र में हुए नीतिगत, संस्थागत और कार्यान्वयन संबंधी सुधार इस बात के प्रमाण हैं कि जब सेवा को सुशासन और सामाजिक न्याय से जोड़ा जाता है, तो वह राष्ट्र निर्माण की प्रभावी शक्ति बन जाती है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार ने दिव्यांगजनों की गरिमा, अधिकारों, समान अवसर, सामाजिक समावेशन और आत्मनिर्भरता को अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं के केंद्र में रखा है। विधायी सुधारों से लेकर शिक्षा, कौशल विकास, पुनर्वास, सहायक उपकरण, सामाजिक सुरक्षा और सुगम्यता तक, सशक्तीकरण के विभिन्न आयामों को एक समेकित और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण के तहत जोड़ा गया है। इन पहलों का उद्देश्य केवल कल्याणकारी सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों को विकास की मुख्यधारा में समान भागीदार और राष्ट्र के सक्रिय सह-निर्माता के रूप में स्थापित करना है।
प्रधानमंत्री जी द्वारा ‘विकलांग’ के स्थान पर ‘दिव्यांग’ शब्द के प्रयोग का आह्वान इसी सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव का महत्वपूर्ण प्रतीक था। यह केवल शब्दावली का परिवर्तन नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों को उनकी सीमाओं के बजाय उनकी क्षमताओं, प्रतिभा, सामर्थ्य और गरिमा के संदर्भ में देखने वाली संवेदनशील और सकारात्मक सोच का परिचायक था।
इस सोच को संस्थागत आधार प्रदान करने में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अधिनियम के तहत निर्दिष्ट दिव्यांगताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 किए जाने से अधिकारों और संरक्षण का दायरा व्यापक हुआ तथा विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं से जुड़ी आवश्यकताओं को विधिक मान्यता मिली। इससे अधिकार-आधारित शासन, संस्थागत जवाबदेही और समान अवसर की दिशा में एक मजबूत विधायी आधार तैयार हुआ।
अधिकारों को वास्तविक जीवन में सक्षमता और आत्मनिर्भरता में बदलने के उद्देश्य से एडिप योजना के तहत अब तक 34.76 लाख दिव्यांगजनों को सहायक उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं। भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम (एलिम्को) के आधुनिकीकरण से उसकी उत्पादन क्षमता में 2.5 गुना वृद्धि हुई है। देशभर में स्थापित 109 प्रधानमंत्री दिव्याशा-वयोश्री केंद्रों के माध्यम से सहायक उपकरणों और संबंधित सेवाओं की पहुंच को अधिक विकेंद्रीकृत और सुगम बनाया गया है। इन पहलों का वास्तविक प्रभाव आंकड़ों से कहीं आगे है, क्योंकि एक उपयुक्त सहायक उपकरण किसी दिव्यांग व्यक्ति के लिए शिक्षा, रोजगार, गतिशीलता और दैनिक जीवन में आत्मविश्वास एवं स्वतंत्रता का माध्यम बन सकता है।
शिक्षा, कौशल और आजीविका के क्षेत्र में भी सरकार ने क्षमता निर्माण से आर्थिक सशक्तीकरण तक एक सतत और समावेशी मार्ग सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया है। छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से 3.28 लाख विद्यार्थियों को सहायता प्रदान की गई है, जबकि 1.43 लाख लाभार्थियों को कौशल प्रशिक्षण दिया गया है। पुनर्वास सेवाओं और वित्तीय सहायता से जुड़ी पहलों ने इस प्रयास को और व्यापक बनाया है। शिक्षा से कौशल, कौशल से रोजगार और रोजगार से आर्थिक आत्मनिर्भरता तक अवसरों की यह श्रृंखला दिव्यांग युवाओं की सामाजिक-आर्थिक भागीदारी को निरंतर मजबूत कर रही है।
सुगम्य भारत अभियान के माध्यम से सार्वजनिक अवसंरचना और सेवाओं को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। 1,853 सरकारी भवनों, बसों और बस अड्डों को सुगम बनाने के प्रयासों से सार्वजनिक सुविधाओं तक दिव्यांगजनों की पहुंच बेहतर हुई है। विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID) व्यवस्था ने पहचान, प्रमाणन और विभिन्न सरकारी सेवाओं एवं योजनाओं तक पहुंच की प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित किया है। इसी प्रकार ‘दिव्य कला शक्ति’ और ‘दिव्य कला मेला’ जैसे मंचों ने दिव्यांगजनों की प्रतिभा, रचनात्मकता, उद्यमिता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और बाजार उपलब्ध कराया है।
इन सभी पहलों का व्यापक उद्देश्य एक ऐसे समावेशी पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है, जिसमें दिव्यांगजन केवल योजनाओं के लाभार्थी न रहें, बल्कि अपनी क्षमता और प्रतिभा के आधार पर विकास प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी और सह-निर्माता बनें।
‘सेवा संकल्प अभियान’ इसी परिवर्तनकारी यात्रा को नई गति, व्यापक जनभागीदारी और परिणामोन्मुखी कार्यान्वयन से जोड़ने का हमारा संकल्प है। हमने अधिकारों को विधिक संरक्षण, क्षमताओं को अवसर, प्रतिभा को मंच और आत्मनिर्भरता को संस्थागत समर्थन प्रदान करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। ये केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर दिखाई देने वाले बदलाव के आधार हैं।
वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का हमारा राष्ट्रीय संकल्प तभी पूर्ण होगा, जब विकास की इस यात्रा में समाज का प्रत्येक नागरिक समान रूप से सहभागी बने। दिव्यांगजन इस यात्रा के समान अधिकार-संपन्न सहभागी और सह-निर्माता हैं। उनकी उपलब्धियां केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक क्षमता, नवाचार और मानवीय शक्ति के विस्तार का प्रतीक हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिवस पर ‘सेवा’ के प्रति हमारी प्रतिबद्धता इसी अटूट विश्वास से प्रेरित है कि दिव्यांगजन सशक्तीकरण, सामाजिक न्याय और विकसित भारत एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। दिव्यांगजनों की गरिमा, उनकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी में ही एक समावेशी, सक्षम, संवेदनशील और सशक्त भारत की आधारशिला निहित है।
सेवा का संकल्प-सशक्त भारत का संकल्प।
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