'एक पर हमला सब पर हमला' वाली बात सही साबित हुई, Houthis ने Saudi Arabia पर सीधे हमले के बाद Pakistan Economy को भी बनाया निशाना!
बड़ी-बड़ी कूटनीतिक बातें करने वाले पाकिस्तान की हालत बेहद खराब हो चली है। मक्का में सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर कर ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ का दम भरने वाले पाकिस्तान के सामने अब इसी जुमले का एक अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। हूतियों ने सऊदी अरब के तेल संसाधनों को निशाना बनाया तो उसकी आंच पाकिस्तान तक पहुंच गई और वहां पेट्रोल-डीजल का संकट खड़ा हो गया। यानी एक पर हमला हुआ और उसका असर दूसरे पर भी पड़ गया। ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ के इस अनोखे संस्करण पर पूरी दुनिया हंस रही है और पाकिस्तान सरकार अब इस चिंता में उलझी है कि देश में पेट्रोल-डीजल कैसे बचाया जाए।
हम आपको बता दें कि जिस पाकिस्तान की कूटनीतिक भाषा में सामूहिक सुरक्षा और साझा प्रतिरोध जैसे भारी-भरकम शब्द गूंज रहे थे, उसकी जमीन पर अब पेट्रोल पंपों, महंगे ईंधन और संभावित ऊर्जा संकट की चर्चा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति में संभावित बाधाओं ने पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलों को और गहरा कर दिया है। सरकार को अब पेट्रोलियम की खपत घटाने के लिए कई उपायों पर विचार करना पड़ रहा है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सरकारी और निजी क्षेत्र में ईंधन की खपत कम करने के प्रस्तावों की समीक्षा की है। इनमें सप्ताह में चार दिन कार्यालय चलाने, कर्मचारियों की बारी-बारी से उपस्थिति, कुछ काम घर से कराने तथा बाजारों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सामान्य समय से पहले बंद करने जैसे विकल्प शामिल हैं। साथ ही सरकारी विभागों में गैर-जरूरी वाहनों के इस्तेमाल और आधिकारिक यात्राओं पर भी लगाम लगाने की संभावना पर विचार हो रहा है। यानी जिस देश में कुछ दिन पहले सामूहिक रक्षा की रणनीति बन रही थी, वहां अब सामूहिक रूप से पेट्रोल बचाने की रणनीति बन रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि पाकिस्तान सरकार ने 16 सितंबर से पेट्रोल की कीमत में 4.10 रुपये और उच्च गति वाले डीजल में 6.41 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इसके बाद पेट्रोल 384.34 रुपये और डीजल 415.83 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। पाक सरकार ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को इसका कारण बताया है। साथ ही पाकिस्तान ने अब पेट्रोलियम कीमतों में रोजाना बदलाव की व्यवस्था भी शुरू कर दी है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का असर घरेलू कीमतों में तेजी से दिखाई दे।
ऊर्जा मंत्री अवैस लेघारी और जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उछाल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है। पाक सरकार ने प्रधानमंत्री की ईंधन राहत योजना के जरिये इस बोझ को कुछ कम करने की कोशिश की है। इसके तहत मोटरसाइकिल चालकों को सप्ताह में पांच लीटर और कार मालिकों को दस दिन में दस लीटर रियायती पेट्रोल देने की व्यवस्था की गई है। इस योजना का विस्तार इस्लामाबाद में परीक्षण के बाद प्रांतों तक करने की तैयारी है।
उधर, पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय ईंधन सब्सिडी संचालन समिति ने पेट्रोल पंपों को होने वाले भुगतान को चौबीस घंटे के भीतर निपटाने का निर्देश भी दिया है। लेकिन सरकार खुद मान रही है कि यह राहत महंगे ईंधन के पूरे असर को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस बीच, ऊर्जा संकट के बीच पाकिस्तान यह बताकर कुछ राहत जरूर दिखाना चाहता है कि बिजली उत्पादन में उसने घरेलू संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल किया है। अगस्त 2026 में उसके कुल बिजली उत्पादन का 72 प्रतिशत घरेलू स्रोतों से आया। इसमें पनबिजली की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत, स्थानीय कोयले की 11 प्रतिशत, परमाणु ऊर्जा की 10 प्रतिशत, स्थानीय गैस की सात प्रतिशत, पवन ऊर्जा की छह प्रतिशत और सौर ऊर्जा की एक प्रतिशत रही। आयातित कोयले और आयातित गैस से केवल 28 प्रतिशत बिजली बनी।
इसके बावजूद संकट इतना गहरा है कि सरकार फिर से मितव्ययिता के उन उपायों पर लौटने की बात कर रही है, जिन्हें पहले भी लागू किया जा चुका है। बाजार जल्दी बंद कराने और कामकाजी दिनों को घटाने जैसे कदमों का कारोबारी समुदाय पहले विरोध करता रहा है। सूचना मंत्री अत्ता तरार ने ऐसे उपायों की वापसी के संकेत दिए हैं, हालांकि मुसादिक मलिक ने साफ कहा है कि ‘स्मार्ट लॉकडाउन’ को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। यानी सरकार के भीतर भी यह तय नहीं है कि संकट से निपटने के लिए ताला लगेगा या सिर्फ भाषण चलेगा।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू पाकिस्तान का मक्का रक्षा समझौता है। सात अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें साफ कहा गया कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान ने इसे सामूहिक प्रतिरोध और साझा सुरक्षा का ऐतिहासिक कदम बताया था। लेकिन सऊदी अरब पर हूती हमलों के बीच पाकिस्तान अब कह रहा है कि समझौते के तहत तत्काल किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई है और समझौते को अमल में लाने के लिए संस्थागत ढांचा तैयार किया जाना बाकी है।
यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की कूटनीतिक घोषणाओं और उसकी वास्तविक मजबूरियों के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। एक तरफ सऊदी अरब के साथ ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ का संकल्प है, दूसरी तरफ अपने यहां पेट्रोल बचाने के लिए चार दिन का कामकाजी सप्ताह, जल्दी बंद होते बाजार और रियायती पेट्रोल की योजना है।
बहरहाल, मक्का में पाकिस्तान ने सामूहिक सुरक्षा का सपना दिखाया था, लेकिन इस्लामाबाद में अब सवाल सामूहिक सुरक्षा से पहले ईंधन की उपलब्धता का है। सऊदी अरब को सुरक्षा का भरोसा देने वाला पाकिस्तान फिलहाल अपने पेट्रोल पंपों को राहत देने में व्यस्त है।
गाज़ा में शांति सिर्फ छलावा? अमेरिका का बड़ा दांव! इज़राइल की झोली में गिरेंगे 40,000 महा-विनाशकारी बम, हिल उठी पूरी दुनिया
गाज़ा में नाजुक शांति और जारी सैन्य संघर्ष के बीच अमेरिकी राजनीति और कूटनीति से एक बड़ा और विवादित घटनाक्रम सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिकी प्रशासन इज़राइल को 2.8 अरब डॉलर (लगभग ₹23,000 करोड़) के नए विशाल सैन्य पैकेज की मंजूरी देने की तैयारी कर रहा है। एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, इस नए रक्षा सौदे में 40,000 अत्यंत शक्तिशाली और विनाशकारी 2,000-पाउंड (लगभग 900 किग्रा) वाले बम शामिल हैं। यह प्रस्तावित सौदा ऐसे समय में सामने आया है जब गाज़ा में अमेरिका की मध्यस्थता से लागू हुआ सीज़फ़ायर बेहद नाजुक दौर में है और घनी आबादी वाले इलाकों में भारी हथियारों के इस्तेमाल पर वैश्विक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
एसोसिएटेड प्रेस की पूरी रिपोर्ट
एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, दो अमेरिकी अधिकारियों और इस योजना की जानकारी रखने वाले एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि इस प्रस्तावित पैकेज में 40,000 2,000-पाउंड वाले बम शामिल हैं, जिनमें 20,000 Mk84 बम और 20,000 BLU-117 बम हैं। अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर यह जानकारी दी क्योंकि पैकेज को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
इस प्रस्तावित बिक्री के बारे में कांग्रेस के सदस्यों को अनौपचारिक रूप से पहले ही बता दिया गया है। इस डील का ज़्यादातर हिस्सा अमेरिकी 'फ़ॉरेन मिलिट्री फ़ाइनेंसिंग' प्रोग्राम के ज़रिए फ़ंड किया जाएगा, जिसके तहत अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसे से इज़राइल को मदद दी जाती है और फिर उस पैसे से अमेरिका में बने हथियार खरीदे जाते हैं। यह पैकेज ट्रंप प्रशासन द्वारा इज़राइल की सैन्य क्षमताओं को मज़बूत करने के लिए उठाए गए कई कदमों का हिस्सा है। इसका समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका की मध्यस्थता में हुए नाज़ुक सीज़फ़ायर के बावजूद गाज़ा में इज़राइल के सैन्य अभियान पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
2,000-पाउंड वाले बम विवादित क्यों हैं?
इस प्रस्तावित शिपमेंट ने सबका ध्यान खींचा है क्योंकि बाइडेन प्रशासन ने पहले गाज़ा में बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान की आशंका के चलते इसी तरह के बमों की डिलीवरी रोक दी थी। ट्रंप ने सत्ता में लौटने के बाद उस रोक को हटा दिया। इसलिए, यह नया प्रस्ताव इज़राइल को इन भारी हथियारों की डिलीवरी फिर से शुरू करने और उसे बढ़ाने की दिशा में एक और बड़ा कदम होगा।
2,000-पाउंड वाले बम कई तरह के होते हैं। कुछ को ज़मीन के नीचे या भारी सुरक्षा वाले ठिकानों को भेदने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जबकि कुछ ज़मीन के ऊपर फटने के बाद बड़े पैमाने पर धमाका करने के लिए बनाए गए हैं। गाज़ा से मिले हमले के फ़ुटेज और बम के टुकड़ों की जांच करने वाले विशेषज्ञों ने पहले भी इज़राइल द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों में अमेरिका में बने हथियारों की पहचान की है।
इज़राइल को अमेरिका द्वारा हथियारों की पिछली बिक्री
यह प्रस्तावित डील ट्रंप प्रशासन के दौरान इज़राइल को हथियारों की कई बड़ी सप्लाई के बाद हो रही है। पिछले साल, प्रशासन ने लगभग 3 अरब अमेरिकी डॉलर की हथियारों की बिक्री को मंज़ूरी दी थी, जिसमें 2,000 पाउंड वज़न वाले 35,500 से ज़्यादा बम शामिल थे। यह बिक्री सामान्य कांग्रेसनल समीक्षा प्रक्रिया का पालन किए बिना मंज़ूर की गई थी। जनवरी में, प्रशासन ने इज़राइल को कुल 6.67 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के हथियारों की एक और खेप बेचने को भी मंज़ूरी दी। यह नया पैकेज ऐसे समय में इज़राइल के सैन्य भंडार में भारी बमों की एक और बड़ी मात्रा जोड़ेगा जब गाज़ा संघर्ष का कोई समाधान नहीं निकला है।इसे भी पढ़ें: गद्दारी करने वाले बांग्लादेश के लिए भारत ने दबाया बिजली का बटन, ढाका में हाहाकार
नाज़ुक युद्धविराम के बावजूद गाज़ा युद्ध जारी है
हथियारों का यह प्रस्तावित सौदा उस युद्ध के बीच हो रहा है जो 7 अक्टूबर, 2023 को दक्षिणी इज़राइल पर हमास के नेतृत्व वाले हमले के बाद शुरू हुआ था। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इस हमले में लगभग 1,200 लोग मारे गए और 251 लोगों को बंधक बना लिया गया। इसके जवाब में इज़राइल ने गाज़ा में अपना सैन्य अभियान शुरू किया। गाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि 73,264 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी मारे गए हैं, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिनकी मौत युद्धविराम लागू होने के बाद हुई।इसे भी पढ़ें: Mecca Pact सिर्फ नाम का, पाकिस्तान नहीं किसी काम का, अब मदद की गुहार के साथ इजरायल की तरफ सऊदी ने किया रुख
हालांकि युद्धविराम के बाद सबसे भीषण लड़ाई कम हो गई है, लेकिन गाज़ा के कुछ हिस्सों में इज़राइली हमले जारी हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रात भर और मंगलवार सुबह हुए हमलों में कई लोग मारे गए। साथ ही, चरमपंथियों ने इज़राइली सैनिकों पर गोलीबारी के हमले किए हैं; इज़राइल का कहना है कि उसके सैन्य अभियान ऐसे हमलों और युद्धविराम के कथित उल्लंघनों के जवाब में हैं।
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