वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और मंदी की आशंकाओं ने विकसित देशों की रफ्तार को धीमा कर दिया है। ऐसे संकटपूर्ण वैश्विक परिदृश्य में नई दिल्ली के 'भारत मंडपम' में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दुनिया के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। इस सम्मेलन का सबसे बड़ा और स्पष्ट संदेश यह है कि जब पूरी दुनिया युद्धों के साए और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही है, तब भारत वैश्विक मंच पर आर्थिक विकास (ग्रोथ) का सबसे मजबूत और भरोसेमंद चेहरा बनकर सामने आया है। ब्रिक्स के मंच पर भारत की इस आर्थिक धमक और कूटनीतिक कौशल ने यह साबित कर दिया है कि नई दिल्ली अब केवल वैश्विक विमर्श का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह वैश्विक एजेंडा तय करने वाली महाशक्ति बन चुकी है। 'भारत का डंका' बजने का यह स्वर केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक आंकड़ों, सुधारों और कूटनीतिक परिपक्वता की बुनियाद पर टिका हुआ है।
इस शिखर सम्मेलन में भारत की केंद्रीय भूमिका को समझने के लिए सबसे पहले उस वैश्विक पृष्ठभूमि को देखना होगा जिसमें इसका आयोजन हो रहा है। एक तरफ जहां यूरोप और अमेरिका जैसे पारंपरिक आर्थिक पावरहाउस उच्च मुद्रास्फीति, कर्ज के संकट और अंदरूनी राजनीतिक अस्थिरता से कमजोर हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संकट ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को छिन्न-भिन्न कर दिया है। इस चौतरफा संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं लगातार भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था मान रही हैं। जब ब्रिक्स के पुराने और नए सदस्य देश नई दिल्ली में एकत्रित हुए, तो उनके सामने एक ऐसा भारत था जिसने न केवल महामारी और युद्ध के झटकों को सफलतापूर्वक झेला है, बल्कि अपनी विकास दर को 7 प्रतिशत से ऊपर बनाए रखा है। यही कारण है कि इस सम्मेलन में भारत द्वारा दिए गए 'ग्रोथ के भरोसे' को दुनिया ने हाथों-हाथ लिया है।
भारत की इस सफलता का सबसे मजबूत स्तंभ उसकी 'रणनीतिक स्वायत्तता' और संतुलित कूटनीति है। ब्रिक्स समूह का इस समय अभूतपूर्व विस्तार हो चुका है, जिसमें अब ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र जैसे देश शामिल हैं। इन देशों के आने से ब्रिक्स की आर्थिक ताकत तो बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही समूह के भीतर भू-राजनीतिक जटिलताएं और आपसी मतभेद भी गहरे हुए हैं। मिसाल के तौर पर, ईरान और खाड़ी देशों के बीच के ऐतिहासिक तनाव या फिर अमेरिका के साथ उनके समीकरणों को संभालना बेहद नाजुक काम है। इसके अलावा, चीन की इस समूह को एक 'पश्चिम-विरोधी' ब्लॉक बनाने की महत्वाकांक्षा भी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे जटिल माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स को 'पश्चिम-विरोधी' बनने से रोककर उसे 'गैर-पश्चिम' मंच के रूप में बनाए रखने में सफलता पाई है। भारत ने स्पष्ट किया है कि ब्रिक्स का उद्देश्य किसी देश या ब्लॉक के खिलाफ मोर्चा खोलना नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की आवाज को बुलंद करना और एक न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था का निर्माण करना है।
भारत की आर्थिक ताकत का लोहा मानने के पीछे देश का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी क्रांति एक बड़ा कारण है। भारत ने ब्रिक्स देशों के सामने अपने सफल 'इंडिया स्टैक' यानी यूपीआई, आधार और डिजीलॉकर जैसे स्वदेशी डिजिटल समाधानों को पेश किया है। आज जब विकसित देश भी डिजिटल भुगतान के महंगे और एकाधिकारवादी मॉडलों पर निर्भर हैं, तब भारत ने एक ऐसा लोकतान्त्रिक और समावेशी वित्तीय ढांचा खड़ा किया है जिसने करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है। ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने इन तकनीकों को अन्य विकासशील देशों के साथ साझा करने का जो प्रस्ताव रखा है, वह इन देशों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नए व आकांक्षी ब्रिक्स सदस्यों के लिए भारत का यह मॉडल वित्तीय समावेशन का एक ऐसा ब्लूप्रिंट है, जिसे वे बिना किसी भारी कर्ज के अपने देशों में लागू कर सकते हैं। यही वह बिंदु है जहां भारत दुनिया को केवल पूंजी का नहीं, बल्कि विकास के व्यावहारिक रास्तों का भरोसा दे रहा है।
इसके साथ ही, विनिर्माण और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की छलांग ने निवेशकों के भीतर एक नया विश्वास पैदा किया है। 'मेक इन इंडिया' और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव जैसी योजनाओं के माध्यम से भारत अब दुनिया का वैकल्पिक विनिर्माण हब बन चुका है। चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश में जुटी वैश्विक कंपनियां भारत को 'प्लस वन' रणनीति के तहत सबसे सुरक्षित और व्यवहार्य ठिकाने के रूप में देख रही हैं। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक चर्चाओं में भारत ने खुद को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के एक मजबूत और अटूट लिंक के रूप में स्थापित किया है। चाहे वह सेमीकंडक्टर का क्षेत्र हो, मोबाइल विनिर्माण हो या फिर फार्मास्यूटिकल्स—भारत की क्षमताएं अब वैश्विक स्तर पर प्रमाणित हो चुकी हैं। हरित ऊर्जा के मोर्चे पर भी, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन और जैव ईंधन गठबंधन जैसी पहलों के जरिए भारत ने यह दिखाया है कि वह आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी उतना ही गंभीर है।
शिखर सम्मेलन का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू ब्रिक्स के भीतर 'डी-डॉलराइजेशन' यानी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की चर्चा है। इस मोर्चे पर भारत की नीति अत्यंत व्यावहारिक और दूरदर्शी रही है। जहां कुछ सदस्य देश पूरी तरह से डॉलर को उखाड़ फेंकने की आक्रामक और जल्दबाजी भरी वकालत कर रहे हैं, वहीं भारत ने 'रुपी-ट्रेड' के अपने सफल प्रयोगों को सामने रखकर एक मध्यम मार्ग दिखाया है। भारत ने रूस, यूएई और कई अन्य देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की शुरुआत करके यह साबित किया है कि बिना किसी वैश्विक वित्तीय उथल-पुथल के भी अपनी मुद्रा को मजबूत किया जा सकता है। ब्रिक्स के मंच पर भारतीय रुपये की स्वीकार्यता बढ़ाने की इस कोशिश को व्यापक समर्थन मिला है, जो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत के प्रभुत्व को और बढ़ाएगा।
भारत के इस आर्थिक उभार ने चीन की उस रणनीति को भी तगड़ा झटका दिया है जिसके तहत वह ब्रिक्स को अपनी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' जैसी विस्तारवादी योजनाओं के विस्तार का जरिया बनाना चाहता था। भारत ने हमेशा संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने वाले पारदर्शी बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया है। इस सम्मेलन में भी भारत ने यह सुनिश्चित किया कि ब्रिक्स का एजेंडा किसी एक देश की विस्तारवादी सोच से संचालित न होकर सामूहिक विकास पर केंद्रित रहे। यही कारण है कि वैश्विक दक्षिण के देश अब चीन के 'कर्ज जाल' से डरकर भारत को एक अधिक विश्वसनीय और लोकतांत्रिक भागीदार के रूप में देख रहे हैं। भारत की 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना ब्रिक्स के सिद्धांतों में साफ झलकती है, जो इसे केवल एक आर्थिक मंच से ऊपर उठाकर एक मानवीय और न्यायसंगत संगठन बनाती है।
हालांकि, इस सफलता के बीच चुनौतियां कम नहीं हैं। ब्रिक्स के भीतर आंतरिक अंतर्विरोध हमेशा से इसकी सबसे बड़ी कमजोरी रहे हैं। भारत और चीन के बीच का सीमा विवाद, नई दिल्ली और बीजिंग के रणनीतिक संबंधों में पूरी तरह से बर्फ पिघलने की राह में अब भी एक बड़ी रुकावट है। इसके अतिरिक्त, रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों का साया और ईरान की भागीदारी के कारण इस समूह पर पश्चिमी देशों की पैनी और संदेहास्पद नजर बनी हुई है। लेकिन इन सबके बावजूद, भारत ने अपनी कूटनीतिक चतुरता से इन अंतर्विरोधों को अपने विकास एजेंडे पर हावी नहीं होने दिया। नई दिल्ली ने यह स्पष्ट कर दिया है कि द्विपक्षीय मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर आर्थिक सहयोग और वैश्विक विकास की प्राथमिकताओं को रोका नहीं जा सकता।
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का समापन भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक विजय के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत ने न केवल एक सफल और निर्बाध सम्मेलन की मेजबानी की है, बल्कि दुनिया को मंदी के दौर से बाहर निकलने का एक नया विजन भी दिया है। भारत की विशाल घरेलू मांग, युवा जनसांख्यिकी, राजनीतिक स्थिरता और निरंतर होते आर्थिक सुधारों ने इसे वैश्विक विकास का एक ऐसा इंजन बना दिया है जिसे कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। 'भारत का डंका' बजने का सीधा अर्थ यह है कि अब वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े फैसले नई दिल्ली की सहमति के बिना नहीं लिए जा सकते। भारत ने इस ब्रिक्स सम्मेलन के माध्यम से दुनिया को जो 'ग्रोथ का भरोसा' दिया है, वह आने वाले दशकों में एक 'विकसित भारत' और एक अधिक संतुलित, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगा।
- अशोक भाटिया
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
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बांग्लादेश को दुश्मन खेमे में जाने से रोकने के लिए भारत तेजी से सक्रिय हो गया है। ढाका के संभावित रूप से सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान से जुड़े ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ जैसे सामूहिक सुरक्षा ढांचे में शामिल होने की खबरों ने नई दिल्ली की रणनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। भारत ने इस मुद्दे पर तीव्र बैकचैनल कूटनीति शुरू कर दी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर बांग्लादेश की असली मंशा क्या है। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच वर्षों से बंद पड़ी यात्री रेल सेवाओं को फिर शुरू करने की कवायद भी तेज हो गई है।
रिपोर्टों के मुताबिक, बांग्लादेश मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने की संभावनाओं पर विचार कर रहा है। यह एक ऐसा पारस्परिक रक्षा ढांचा बताया जा रहा है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान शामिल हैं। शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक माहौल में ढाका अपनी विदेश नीति को अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रहा है। बांग्लादेशी रणनीतिक हलकों में संभावित सदस्यता को तुर्किये की सैन्य तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक सहायता और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग हासिल करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसे व्यापक रूप से ‘मुस्लिम फैमिली’ के ढांचे में कूटनीतिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश के तौर पर पेश किया जा रहा है।
लेकिन नई दिल्ली की नजर से तस्वीर कहीं अधिक गंभीर है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि पाकिस्तान से जुड़े किसी सामूहिक रक्षा ढांचे का विस्तार सीधे उसके पूर्वी मोर्चे तक हो सकता है। यदि बांग्लादेश औपचारिक रूप से ऐसे किसी सैन्य समझौते में शामिल होता है, तो भारत के आसपास एक नए सामरिक समीकरण का निर्माण हो सकता है। बंगाल की खाड़ी तक फैला सामूहिक सुरक्षा ढांचा भारत की रणनीतिक गणनाओं को बदल सकता है।
हम आपको बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा है। ऐसे में पूर्वी सीमा पर किसी नए सुरक्षा गठबंधन की मौजूदगी नई दिल्ली के लिए साधारण कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं होगी। भारत को अपने पड़ोस को केवल द्विपक्षीय रिश्तों के नजरिये से नहीं, बल्कि एक संभावित मल्टी-फ्रंट सिक्योरिटी थिएटर के रूप में देखना पड़ सकता है। यही वजह है कि भारतीय बैकचैनल यह टटोलने में जुटे हैं कि ढाका वास्तव में कोई बाध्यकारी सैन्य प्रतिबद्धता चाहता है या फिर इस तरह की संभावनाओं का इस्तेमाल भारत समेत अन्य शक्तियों से कूटनीतिक लाभ लेने के लिए कर रहा है।
इसी रणनीतिक तनाव के बीच भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक सकारात्मक संकेत भी उभर रहा है। दोनों देश बंद पड़ी यात्री ट्रेन सेवाओं को फिर शुरू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ढाका में आज से दोनों देशों के रेलवे अधिकारियों की बैठक शुरू हुई है, जिसमें मैत्री, बंधन और मिताली एक्सप्रेस को दोबारा पटरी पर लाने पर चर्चा हो रही है।
बांग्लादेश रेलवे के अतिरिक्त महानिदेशक (ऑपरेशंस) मोहम्मद नजमुल इस्लाम के अनुसार, दोनों देशों के बीच यात्री रेल संपर्क अगस्त 2024 के बाद से बंद है, जबकि मालगाड़ियां बिना किसी बाधा के लगातार चलती रही हैं। मैत्री एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट और कोलकाता के बीच चलती थी, बंधन एक्सप्रेस खुलना और कोलकाता को जोड़ती थी, जबकि मिताली एक्सप्रेस ढाका कैंटोनमेंट से न्यू जलपाईगुड़ी तक संचालित होती थी।
इन सेवाओं को जुलाई 2024 में आधिकारिक रूप से निलंबित किया गया था। इसके बाद देशव्यापी अशांति, शेख हसीना सरकार के पतन और 5 अगस्त 2024 को उनके भारत जाने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया। नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था के दौरान शेख हसीना की भारत में मौजूदगी और उनके प्रत्यर्पण की मांग जैसे मुद्दों ने संबंधों में खटास पैदा की।
हालांकि, बांग्लादेश में 22 फरवरी 2026 को हुए आम चुनाव के बाद एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू हुआ। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार बनी और अब दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्तों की बहाली की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है।
वर्तमान अंतर-सरकारी रेलवे बैठक यानी IGRM में केवल ट्रेनों को शुरू करने पर ही नहीं, बल्कि वित्तीय हिसाब-किताब, सीमा पार ट्रेन परिचालन, वार्षिक लेखा संतुलन, परिचालन क्षमता, रोलिंग स्टॉक और रेलवे ढांचे के विकास जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है। बांग्लादेश की योजना राजशाही से कोलकाता के लिए एक नई ट्रेन शुरू करने की भी है। साथ ही, मैत्री एक्सप्रेस को जमुना ब्रिज के बजाय पद्मा ब्रिज के रास्ते चलाने का प्रस्ताव भी सामने आ सकता है।
भारत द्वारा 27 जून से बांग्लादेशी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा फिर शुरू किए जाने के बाद आम लोगों के बीच भी रेल सेवाओं की बहाली की मांग तेज हुई है। भारतीय उच्चायुक्त ने भी दोनों देशों के बीच ‘पीपुल-टू-पीपुल रिलेशन’ को बेहद अहम बताया है।
दरअसल, यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। एक तरफ भारत बांग्लादेश के संभावित नए सैन्य समीकरणों को लेकर सतर्क है, दूसरी तरफ वह रेल, वीजा, व्यापार और जनसंपर्क के जरिए रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा है। नई दिल्ली समझती है कि अगर ढाका रणनीतिक रूप से दूर गया, तो भारत की पूर्वी सुरक्षा चुनौती स्थायी रूप से बदल सकती है। इसलिए कूटनीति अब सिर्फ दोस्ती बचाने की नहीं, बल्कि बांग्लादेश को किसी संभावित दुश्मन खेमे की ओर झुकने से रोकने की रणनीतिक लड़ाई बन चुकी है।
-नीरज कुमार दुबे
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