मध्य पूर्व की राजनीति में एक नया और खतरनाक तनाव उभर आया है। दरअसल, सऊदी अरब ने आरोप लगाया कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने यमन के उस अलगाववादी नेता को अबू धाबी भेज दिया है जिस पर राजद्रोह का मामला दर्ज है। हम आपको बता दें कि यह नेता यमन में देशद्रोह के आरोपों में वांछित था और उस पर यमन को तोड़ने तथा सशस्त्र विद्रोह को हवा देने के आरोप हैं। सऊदी अरब का कहना है कि यह कार्रवाई न केवल यमन की संप्रभुता पर हमला है बल्कि उस गठबंधन के साथ खुला विश्वासघात भी है जो हूती विद्रोहियों के खिलाफ बनाया गया था।
सऊदी पक्ष का आरोप है कि जिस समय यमन में राजनीतिक समझौते और सैन्य समन्वय की कोशिशें चल रही थीं, उसी दौरान यूएई ने अलगाववादी नेता को सुरक्षा देकर बाहर निकाला और उसे अपने प्रभाव क्षेत्र में पहुंचा दिया। यह कदम उस समय उठाया गया जब सऊदी अरब यमन की एकता को बनाए रखने और वहां की सरकार को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इस घटनाक्रम ने यह भी साफ कर दिया है कि यमन युद्ध के भीतर ही अब एक और युद्ध जन्म ले चुका है।
हम आपको बता दें कि यमन पहले ही वर्षों से गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है। उत्तर में हूती विद्रोही, दक्षिण में अलगाववादी गुट और बीच में कमजोर केंद्र सरकार। सऊदी अरब और यूएई लंबे समय तक एक ही पक्ष में खड़े थे लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि दोनों के हित कभी एक जैसे नहीं रहे। अब यह टकराव खुलकर सामने आ गया है। सऊदी अरब जहां यमन को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहता है वहीं यूएई दक्षिण यमन में अपने प्रभाव को मजबूत करने की रणनीति पर चल रहा है।
देखा जाये तो यह घटनाक्रम केवल यमन तक सीमित नहीं है। खाड़ी क्षेत्र में जिस एकता और सामूहिक सुरक्षा की बात की जाती थी वह अब दरकती दिख रही है। सऊदी अरब और यूएई के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती जा रही है और इसका सीधा असर पूरे क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ सकता है।
साथ ही सऊदी अरब और यूएई के बीच टकराव की यह खबर साधारण नहीं है। यह मध्य पूर्व की राजनीति में एक बड़े भूचाल का संकेत है। ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई मोर्चों पर सुलग रही है तब खाड़ी के दो सबसे ताकतवर देशों के बीच उभरता यह तनाव बेहद खतरनाक है। दुनिया रूस यूक्रेन युद्ध से जूझ रही है। पश्चिम एशिया पहले से ही हिंसा और अस्थिरता का केंद्र बना हुआ है। अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में संघर्ष जारी हैं। ऐसे में सऊदी अरब और यूएई का आमने सामने आना वैश्विक अस्थिरता को और भड़का सकता है।
देखा जाये तो यमन युद्ध पहले ही एक मानवीय त्रासदी बन चुका है। लाखों लोग भुखमरी और बीमारी के कगार पर हैं। अब जब उसी युद्ध में शामिल सहयोगी देश एक दूसरे के खिलाफ चालें चलने लगें तो स्थिति और भी विस्फोटक हो जाती है। यह केवल रणनीतिक मतभेद नहीं हैं बल्कि सत्ता और प्रभाव की खुली लड़ाई है। यूएई का अलगाववादी ताकतों को संरक्षण देना यह दिखाता है कि वह यमन को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है। सऊदी अरब इसे अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय नेतृत्व के लिए सीधी चुनौती मान रहा है।
यह टकराव आगे क्या रूप ले सकता है यह कहना कठिन नहीं है। यदि यह तनाव बढ़ता है तो यमन में गृहयुद्ध और गहरा होगा। अलगाववादी गुटों को और हथियार मिलेंगे। हूती विद्रोहियों को भी इसका फायदा मिलेगा। अंततः यमन एक ऐसे युद्धक्षेत्र में बदल सकता है जहां हर ताकत अपनी अलग लड़ाई लड़ रही होगी। इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता फैलेगी और समुद्री मार्गों से लेकर ऊर्जा आपूर्ति तक सब कुछ प्रभावित होगा।
इसके वैश्विक निहितार्थ भी बेहद गंभीर हैं। खाड़ी क्षेत्र विश्व की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ है। यहां किसी भी तरह का बड़ा टकराव वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। तेल की कीमतें उछल सकती हैं। व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो सकते हैं। साथ ही बड़ी शक्तियां अपने हितों के अनुसार पक्ष चुनने लगेंगी और दुनिया एक नई ध्रुवीकरण की ओर बढ़ सकती है। यह भी याद रखना होगा कि जब क्षेत्रीय शक्तियां आपस में भिड़ती हैं तो अक्सर छोटे देश और आम लोग इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं। यमन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा, सऊदी अरब और यूएई का यह टकराव यदि खुली दुश्मनी में बदलता है तो यह केवल दो देशों की समस्या नहीं रहेगी बल्कि एक वैश्विक संकट का रूप ले सकती है।
बहरहाल, यदि खाड़ी के ताकतवर देश अपने तात्कालिक स्वार्थों के लिए पूरे क्षेत्र को आग में झोंकते रहे तो इसका परिणाम विनाशकारी होगा। दुनिया पहले ही युद्ध और तनाव से थकी हुई है। एक और मोर्चा खुलना मानवता के लिए घातक साबित हो सकता है। यह खबर एक चेतावनी है कि यदि सत्ता की भूख और रणनीतिक अहंकार पर लगाम नहीं लगी तो आने वाला समय और भी अंधकारमय हो सकता है।
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ईरान में एक तरफ तो खामनेई के खिलाफ हिंसा अब और तेज भड़क उठी है। जी हां इस हिंसा हिंसक विरोध प्रदर्शन में अब तक 35 लोगों की मौत हो चुकी है। हालात पर काबू पाने के लिए 1200 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है। तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान सरकार को धमकी के बाद आयतुल्लाह खामे ने ईरान रूस भागने की प्लानिंग पूरी तैयार कर ली है। पूरे ईरान में यह बात जोर शोर से उठ रही है कि अमेरिका तैरान में घुसकर खामनेई को भी वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की तरह अगुवा कर सकते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप के हाथ खामेनई तक पहुंच सकते हैं?
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन अब हिंसक होते जा रहे हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट के मुताबिक अब तक 78 शहरों के 222 से ज्यादा स्थानों पर प्रदर्शन हो चुके हैं। इनमें कम से कम 35 लोगों की मौत हुई है। वहीं 1200 से अधिक लोगों को हिरासत में ले लिया गया है। 22 साल की महसा अमीरी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद भड़की यह हिंसा 27 राज्यों में फैल गई है। तेहरान की सड़कों पर खामीन विरोधी नारे जोर शोर से गूंज रहे हैं। इस बीच वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले और वेनेजुला के राष्ट्रपति माधुरों को बंधक बनाने की कारवाई ने ईरान में हलचल मचा दी है। ऐसे में खामनेई की बेचैनी इसलिए भी बढ़ी हुई है क्योंकि डोन्ड ट्रंप ने ईरान को सीधे चेतावनी दी है कि अगर ईरान में प्रदर्शनकारियों पर जुल्म जारी रहा तो ईरान हमला झेलने के लिए तैयार रहे।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि क्या अमेरिका या कोई विदेशी ताकत तेहरान में घुसकर ईरान के सुप्रीम लीडर को अगवा करने की हिम्मत कर सकती है। हालांकि डॉनल्ड ट्रंप की धमकी के बाद खामिनाई से लेकर उनके सलाहकार और विदेश मंत्रालय ने ट्रंप को दखल अंदाजी ना करने की सलाह दी है। ऐसे में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामिनई ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जिन लोगों का तर्क था कि देश की समस्याओं का समाधान अमेरिका के साथ बातचीत में है। उन्होंने नतीजे देख लिए हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत के दौरान अमेरिकी सरकार पर्दे के पीछे से जंग की योजना बनाने में मशगूल थी।
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