गणेश चतुर्थी का त्योहार बेहद नजदीक आ चुका है। हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी का पर्व विशेष महत्व है। अगर आप इस बार अपने घर में बप्पा लेकर आ रहे हैं, तो यह बेहद ही शुभ। माना जाता है कि विघ्नहर्ता गणेश जी का आगमन घर में सकारात्मकता लेकर आता है। वैसे यह बेहद ही मंगलकारी माना जाता है।
हालांकि, बप्पा को घर में लाने के बाद आपको कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना जरुरी है। वास्तु के अनुसार, गणेश जी को विराजमान करने बेहद जरुरी है। इसके साथ ही उन्हें सही दिशा में स्थापित करना भी काफी जरुरी है।
आइए जानते हैं वास्तु गुरु मान्या से की गणेश चतुर्थी पर श्री गणेश की स्थापना किस दिशा में करना जरुरी है। स्थापना के समय बप्पा का मुख किस दिशा में होना अनिवार्य है।
गणेश जी की मूर्ति किस दिशा में स्थापित करें
-गणेश चतुर्थी पर गणेश जी स्थापना के लिए सबसे जरुरी शुभ दिशा ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व दिशा में की जाती है। इस दिशा में गणपति बप्पा को स्थापित करना बेहद ही शुभ माना जाता है। वास्तु शास्त्र में इस दिशा को लक्ष्मी और कुबरे की दिशा मानी गई है। इसलिए मूर्ति को ऐसे स्थापित करें की पूजा करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा में रहें।
-इतना ही नहीं, आप जिस मूर्ति को स्थाापित कर रहें हैं, तो इस बात का ख्याल जरुर रखें कि जिस दीवार पर आप मूर्ति स्थापित कर रहे हैं, तो इस बात का ख्याल रखें कि बप्पा की मूर्ति बाथरुम की दीवार से लगी हुई न हो। वहीं, घर की सीढ़ियों के एकदम नीचे भी बप्पा की स्थापना न करें।
-बप्पा को सीधा जमीन पर न रखें। बप्पा के लिए पहले एक अच्छा-सा ऊंचा स्थापना का स्थान बनाएं, इसके बाद ही लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल रंग का वस्त्र बिछाकर गणपति जी को स्थापित करें। दीवार से कम से कम 1 इंच का फासला रखें।
बप्पा की मूर्ति कैसी होनी चाहिए
- वास्तु के अनुसार, भगवान गणेश जी की मूर्ति को ललितासन (सुखासन) में विराजमान करना सबसे शुभ माना जाता है। गणपति जी की यह मुद्रा स्थिरता लेकर आती है।
- इसके साथ ही मूर्ति में मूषक और मोदक होना शास्त्रीय दृष्टि से भी अनिवार्य माना जाता है। मोदक का मतलब है खुशी और ज्ञान और मूषक दर्शाता है कि हमने अपनी भटकती हुई इच्छाओं पर काबू पा सकता है।
बप्पा की पीठ का भी करें ध्यान
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गणेशजी के मुख पर शुभ लाभ और पीठ पर दरिद्रता का वास होता है। वहीं, बप्पा का मुख हमेशा घर के केंद्र की तरफ खुलना चाहिए, उनकी पीठ कमरे या एंट्रेंस की तरफ नहीं होनी चाहिए। यदि आप भी अपने घर गणेश जी लेकर आ रहे हैं, तो इन नियमों को जरुर पालन करें।
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हिंदू धर्म व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व माना जाता है। हरतालिका तीज का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत और अखंज सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है।
खासकर इस व्रत की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें बाजार की बनीं महंगी मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती बल्कि सुहागिन महिलाएं अपने हाथों से शुद्ध मिट्टी के भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा बनाती हैं। आइए आपको इस व्रत में मिट्टी की मूर्तियां बनाने की परंपरा क्यों शुरु की गई और इसके पीछे कौन-सी पौराणिक कथा जुड़ी है।
माता पार्वती द्वारा स्वयं की गई पहली स्थापना की परंपरा
असल में हरतालिका तीज में मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाने का सीधा संबंध माता पार्वती के उस ऐतिहासिक तप से है, जो उन्होंने शिवजी को पाने के लिए जंगल में किया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती को अपनी सखियों के साथ महल छोड़कर घने जंगल में शरण लेनी पड़ी थी, तब वहां उनके पास पूजा करने के लिए सोने-चांदी या किसी अन्य धातु की मूर्तियां उपलब्ध नहीं थी।
उन्होंने एकांत और प्राकृतिक वातावरण में अपने कोमल और पवित्र हाथों से नदी के किनारे की रेत और शुद्ध मिट्टी को इकट्ठा किया। फिर माता पार्वती ने भगवान शिव के लिंग रुप और अपनी श्रद्धा के अनुसार उनकी प्रतिमा को आकार दिया।
माता ने श्रद्धा के साथ उस मिट्टी की मूर्ति की विधि-विधान से पूजा की थी। क्योंकि इस व्रत की शुरुआत ही माता पार्वती द्वारा मिट्टी की पूजा से हुई थी, इसलिए आज भी सुहागिन महिलाएं उसी प्राचीन परंपरा को जीवित रखते हुए हाथों से मिट्टी के भगवान बनाकर उनकी आराधना करती हैं।
शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाने की मिट्टी को खास क्यों माना जाता है?
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से मिट्टी को पंचतत्वों में से एक सबसे पवित्र और शुद्ध तत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस संसार की हर रचना अंतत: इसी मिट्टी में विलीन हो जाती है और जीवन का आधार भी यही है। जब सुहागिनें अपने हाथों से मिट्टी को गूंथकर भगवान शिव और माता पार्वती का स्वरुप देती हैं, तो यह इस बात का प्रतीक होता है कि उनकी आस्था और भक्ति बिल्कुल इस कच्ची और पवित्र मिट्टी की तरह ही निर्मल, सच्ची और अडिग है।
वहीं, हाथों से मूर्ति बनाना इस बात को भी दर्शाता है कि पूजा सिर्फ दिखावे या बाजार की महंगी चीजों की मोहताज नहीं होती बल्कि इसके लिए सच्चे मन, समर्पण और भावना की बेहद जरुरत होती है। मिट्टी से बनीं मूर्तियों को बाद में विधिवत रुप से जल में विसर्जित कर देती है।
मिट्टी की मूर्ति बनाने को लेकर पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने जब राजा हिमालय के महल को त्याग किया और जंगल की गुफा में बालू के शिवलिंग की स्थापना करते कठोर तपस्या शुरु की थी, जिसमें उन्होंन अन्न-जल त्याग दिया था। उनकी इस कठिन तपस्या और मिट्टी से बनाए गए शिवलिंग के प्रति अटूट प्रेम को देखकर भोलेनाथ काफी प्रसन्न हुए।
वहीं, भगवान शिव उसी बालू के शिवलिंग से प्रकट होकर माता पार्वती को उनकी तपस्या का फल दिया और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रुप में स्वीकार करने का वरदान दिया। तब से यह प्रथा प्रचलित हो गई है, जो महिला इस दिन पूरी श्राद्धा से अपने हाथों से मिट्टी के शिवलिंग और माता पार्वती की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा करती हैं, तो उसे माता पार्वती जैसा अखंड सौभाग्य और शिवजी जैसा वर प्राप्त होता है।
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