INDIA गठबंधन के तीन साल पूरे, 14 सदस्यीय समन्वय समिति हुई निष्क्रिय
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने के मकसद से तीन साल पहले गठित ‘इंडिया’ गठबंन को आगे बढ़ाने के लिए बनाई गई समन्वय समिति अब निष्क्रिय हो चुकी है, हालांकि यह गठबंधन कुछ बिखराव एवं टकराव के बावजूद अपना वजूद बनाए हुए है। गठबंधन की 14 सदस्यीय समन्वय समिति की पहली बैठक 13 सितंबर, 2023 को हुई थी। उस समय इसे गठबंधन की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में देखा गया था।
हालांकि, वह समिति की आखिरी बैठक भी साबित हुई। तीन साल बाद समन्वय समिति अस्तित्व में नहीं है और इसके मूल सदस्यों में से दो अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खेमे में हैं। इस साल राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय बहाल करने का प्रयास जरूर किया गया।
बीते आठ जून को इस गठबंधन के घटक दलों के नेताओं ने दो साल से अधिक समय में पहली बड़ी औपचारिक बैठक की थी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने घोषणा की थी कि अब गठबंधन के दल हर दो महीने में बैठक करेंगे। इस साल, अगस्त में हैदराबाद में बैठक का सुझाव दिया गया था, लेकिन वह बैठक नहीं हो सकी।
विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हम कांग्रेस द्वारा बैठक की तारीख तय करने का इंतजार कर रहे हैं। हैदराबाद में प्रस्तावित बैठक क्यों नहीं हो सकी, इस बारे में उनकी ओर से कोई जानकारी नहीं है।’’ कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने पूछे जाने पर कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस बीच, गठबंधन बनाने वाले दलों के आपसी संबंधों में बदलाव आया है, जिससे अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष के सामने मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।
इन राज्यों में कहीं दल सहयोगी हैं, कहीं प्रतिद्वंद्वी और कहीं संभावित साझेदार। पिछले साल गठबंधन से अलग हुई आम आदमी पार्टी (आप) की पंजाब में कांग्रेस के साथ लड़ाई लगातार तीखी होती जा रही है। बीते रविवार को आप ने गोवा में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस विकल्प पेश करने के लिए गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ गठबंधन किया।
पार्टी गुजरात में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में है। जहां राज्यवार रणनीति ने चुनावी तौर पर काम किया है, वहां भी मतभेद उभर आए हैं। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो)-कांग्रेस-राष्ट्रीय जनता दल (राजद) गठबंधन ने 2024 में आसानी से सत्ता बरकरार रखी, जबकि जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।
झारखंड में कांग्रेस के नेता सरकार में प्रतिनिधित्व और झामुमो के साथ समन्वय को लेकर अक्सर शिकायत करते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ कांग्रेस के रिश्ते खराब हुए हैं। इस महीने दोनों दलों के मतभेद उस समय फिर खुलकर सामने आए जब कांग्रेस ने सरकार समर्थित एक कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरे गाए जाने पर आपत्ति जताई।
इसके जवाब में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने सहयोगी दल पर पलटवार किया। तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) का गठबंधन ‘इंडिया’ गठबंधन के सबसे टिकाऊ राज्य स्तरीय गठबंधनों में से एक था और 2024 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन के प्रदर्शन में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा था। हालांकि, 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस द्रमुक के नेतृत्व वाले मोर्चे से अलग हो गई और सत्तारूढ़ टीवीके के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हो गई।
सितंबर 2023 में मुंबई में हुई बैठक में गठबंधन के 13 सदस्यों को 14 सदस्यीय समन्वय समिति में शामिल किया गया था। एक सीट माकपा के लिए रखी गई थी, लेकिन उसने अपना प्रतिनिधि नामित नहीं किया। समिति में कांग्रेस की ओर से के. सी. वेणुगोपाल, तत्कालीन अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से शरद पवार, द्रमुक से टी. आर. बालू, झामुमो से हेमंत सोरेन, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) से संजय राउत, राजद से तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस से अभिषेक बनर्जी, आप से राघव चड्ढा, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए, समाजवादी पार्टी से जावेद अली खान, जनता दल (यूनाइटेड) से ललन सिंह, जो 2024 में भाजपा नीत राजग में लौट गए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से डी. राजा, नेशनल कॉन्फ्रेंस से उमर अब्दुल्ला और पीडीपी से महबूबा मुफ्ती शामिल थे।
2020 Delhi Riots: भजनपुरा हिंसा मामले में 5 दोषी करार, कोर्ट ने आगजनी के आरोप से किया बरी
राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान भजनपुरा पेट्रोल पंप पर हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में पांच लोगों को दंगा करने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का दोषी करार दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया है कि ये पांचों लोग उस गैर-कानूनी भीड़ का हिस्सा थे जिसने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर हमला किया था। हालांकि, अदालत ने उन्हें पेट्रोल पंप को आग के हवाले करने के आरोप से बरी कर दिया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के इस दावे पर ‘‘बहुत गंभीर संदेह’’ है कि भीड़ ने यह आग लगाई थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह मामले में आरिफ, मोहम्मद खालिद, अब्दुल सत्तार, तनवीर अली और हुनैन पर लगाए गए आरोपों पर सुनवाई कर रहे थे। अदालत ने नौ सितंबर के आदेश में कहा, ‘‘इस गैर-कानूनी भीड़ ने पथराव किया और हमले की तीव्रता इतनी अधिक थी कि पुलिस अधिकारियों को पेट्रोल पंप की दीवार फांदकर भागना पड़ा।
साथ ही, भीड़ ने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक बल प्रयोग किया और उनके कर्तव्य निर्वहन में बाधा डाली।’’ संबंधित पांचों लोगों को भारतीय दंड संहिता की धारा 149 (गैर-कानूनी रूप से एकत्र होना) के साथ धारा 147 (दंगा करना), धारा 152 (दंगा रोकने वाले सरकारी कर्मचारी पर हमला करना या बाधा डालना), धारा 186 (सरकारी कर्मचारी के कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालना) और धारा 353 (सरकारी कर्मचारी को रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल प्रयोग) के तहत दोषी करार दिया गया। सजा पर अलग से बहस होगी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 24 फरवरी 2020 को अपराह्न करीब दो बजे पुलिस को फोन पर सूचना मिली थी कि यमुना विहार सर्विस रोड स्थित भजनपुरा पेट्रोल पंप, जिसे दिल्ली डीजल्स के नाम से भी जाना जाता है, पर लोगों की भीड़ एकत्र हुई है।
मौके पर पहुंची पुलिस को वहां 100 से 150 लोग मिले, जो चांद बाग की तरफ से आए थे और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ नारे लगा रहे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसके बाद भीड़ हिंसक हो गई और उसने पथराव किया, पेट्रोल पंप के उपकरणों में तोड़-फोड़ की, पास खड़ी गाड़ियों को आग लगा दी और पुलिसकर्मियों पर हमला किया, जिन्हें परिसर की दीवार फांदकर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। आगजनी के आरोप पर अदालत ने ‘‘बहुत गंभीर संदेह’’ जताया।
अदालत ने उल्लेख किया कि किसी भी गवाह ने ऐसी किसी बड़ी आग या धमाके का जिक्र नहीं किया, जैसा कि चालू हालत वाले पेट्रोल पंप में आग लगने पर होता है। अभियोजन पक्ष के गवाह के तौर पर पेश किए गए पंप के मालिक और एक कर्मचारी ने भी इस बात का समर्थन नहीं किया। भजनपुरा में हुई हिंसा, 24-25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सीएए के विरोध के दौरान भड़के दंगों का ही एक हिस्सा थी।
इन दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे।
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