Abbas Araghchi से मिले Mirwaiz Umar Farooq, Iran President Masoud Pezeshkian को India से सीख लेने की दे डाली सलाह
ईरान और अमेरिका के बीच बने हुए तनाव के बीच कश्मीर के प्रमुख धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को ऐसा संदेश दिया है, जिसमें युद्ध की बजाय संयम, टकराव की बजाय संवाद और सैन्य कार्रवाई की बजाय कूटनीति को रास्ता बनाने की अपील की गई है। मीरवाइज ने साफ कहा है कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष और अनसुलझे विवाद केवल मानवीय पीड़ा बढ़ाते हैं और अंततः सबसे कठिन विवादों को भी बातचीत की मेज पर लौटना ही पड़ता है। खास बात यह है कि उन्होंने भारत की पहचान महात्मा गांधी की अहिंसा की विरासत से जोड़ते हुए कहा कि भारत संयम, संवाद और कूटनीति को बढ़ावा देने में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।
हम आपको बता दें कि मीरवाइज ने शनिवार रात ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से मुलाकात की। यह मुलाकात उस अंतरधार्मिक सम्मेलन के एक दिन बाद हुई, जिसमें घाटी के विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने हिस्सा लिया था और ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने भी संबोधित किया था। मीरवाइज ने बताया कि अराघची के साथ राजनीति, संघर्ष, शांति, संवाद और बातचीत के रास्तों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसा को आगे बढ़ने के एक संभावित रास्ते के रूप में भी सामने रखा। मीरवाइज के मुताबिक अराघची भले ही अकादमिक पृष्ठभूमि से आते हों, लेकिन उनकी राजनीतिक समझ काफी गहरी है।
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हालांकि पेजेशकियान के साथ सीधे संवाद को लेकर स्थिति अलग रही। शुक्रवार को आयोजित अंतरधार्मिक सम्मेलन में हिंदू, सिख, ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरुओं का व्यापक प्रतिनिधित्व था। मीरवाइज के साथ शिया नेता आगा सैयद हसन मूसावी और इमरान रजा अंसारी भी मौजूद थे। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक सैयद मुंतजिर मेहदी भी सम्मेलन में शामिल हुए। लेकिन मेहदी के अनुसार पेजेशकियान से किसी की अलग बैठक नहीं हुई। भीड़ अधिक होने के कारण राष्ट्रपति अपना संबोधन समाप्त कर चले गए और उपस्थित नेताओं से केवल औपचारिक अभिवादन ही हो सका।
इसके बावजूद मीरवाइज ने पेजेशकियान के लिए लिखे पत्र में ईरान के साथ एकजुटता जताते हुए संवाद को ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता बताया। उन्होंने लिखा कि यह ऐसा समय है जब विवेक, संयम और राजकीय दूरदृष्टि की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। गंभीर से गंभीर मतभेद भी अंतहीन टकराव से समाप्त नहीं हो सकते। युद्ध केवल मानवीय पीड़ा को कई गुना बढ़ाता है। इसलिए अंततः विवादों का समाधान बातचीत, सहभागिता और समझौते की मेज पर ही तलाशना होगा।
इसके अलावा, इस संदेश का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम एकता से जुड़ा है। ईरान का संघर्ष अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते हुए कई अरब देशों को भी प्रभावित कर रहा है। ऐसे समय में मीरवाइज ने मुस्लिम समाज से सांप्रदायिक विभाजन से ऊपर उठने की अपील की। उन्होंने 1980 के दशक में ईरान के सर्वोच्च नेता सैयद अली खामेनेई की श्रीनगर जामिया मस्जिद यात्रा और विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों के बीच एकता के उनके संदेश का उल्लेख किया। उनका कहना था कि राजनीतिक या धार्मिक प्रश्नों पर मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इन्हें आस्था, भाईचारे और साझा मानवता के बुनियादी रिश्तों से ऊपर नहीं आने देना चाहिए। उन्होंने सांप्रदायिकता का विरोध करने और राजनीतिक संघर्षों को मुस्लिम समाज के आंतरिक विभाजन का कारण न बनने देने की अपील की।
मीरवाइज के संदेश में भारत-ईरान संबंधों की एक सांस्कृतिक परत भी स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने पेजेशकियान को श्रीनगर की जामिया मस्जिद की अखरोट की लकड़ी से बनी प्रतिकृति भेंट की। पत्र में कश्मीर और ईरान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि फारसी विद्या, साहित्य, कला और आध्यात्मिक परंपराओं ने कश्मीरी सभ्यता पर गहरी छाप छोड़ी है। उनके अनुसार ये ऐसे जनसंबंध हैं जो बदलते राजनीतिक समीकरणों और पीढ़ियों के बावजूद कायम रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत मीरवाइज ने कश्मीर विवाद के संदर्भ में दिया। दक्षिण एशिया में भारत-पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और अनसुलझे मतभेदों को उन्होंने अपने संवाद और बातचीत पर विश्वास का आधार बताया। उनका कहना है कि कश्मीर का अनुभव यह सिखाता है कि लंबे समय तक जारी टकराव समाधान नहीं देता। इसी संदर्भ में उन्होंने भारत को महात्मा गांधी की अहिंसा की विरासत वाला देश बताते हुए संयम, संवाद और कूटनीति को बढ़ावा देने में रचनात्मक भूमिका निभाने की बात कही।
देखा जाये तो मीरवाइज का यह संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ईरान के साथ एकजुटता जताते हुए भी युद्ध और टकराव से दूरी बनाने की स्पष्ट अपील है। साथ ही कश्मीर के अनुभव को ईरान के मौजूदा संकट से जोड़कर वह यह संकेत देते हैं कि किसी भी संघर्ष का स्थायी समाधान शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि अंततः बातचीत से ही निकलता है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निहितार्थ है कि कश्मीर की धार्मिक आवाज ने ईरान के मंच पर भारत की अहिंसक विरासत को समाधान की भाषा के रूप में पेश किया है और दक्षिण एशिया के अपने अनुभव से पश्चिम एशिया के संघर्ष के लिए संवाद का तर्क खड़ा किया है।
West Bengal में Lenin और Karl Marx के नाम वाली सड़कों को बदलने की तैयारी
(डेटलाइन में सुधार के साथ रिपीट) कोलकाता, 14 सितंबर पश्चिम बंगाल सरकार ने 10-सदस्यीय समिति बनाई है जो राज्य में कई सड़कों, पुलों और सार्वजनिक जगहों के नाम बदलने के प्रस्तावों पर विचार कर रही है। इनमें कोलकाता की तीन प्रमुख सड़कें भी शामिल हैं जिनके नाम कम्युनिस्ट नेताओं व्लादिमीर लेनिन, कार्ल मार्क्स और हो ची मिन्ह के नाम पर रखे गए थे। कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि भारत सेवाश्रम के कार्तिक महाराज के नाम से मशहूर स्वामी प्रदीप्तानंद की अध्यक्षता वाली यह समिति दुर्गा पूजा के बाद अपनी पहली बैठक कर सकती है।
इस बैठक में कोलकाता की सड़कों के नाम बदलने के प्रस्तावों पर चर्चा होने की संभावना है। जिन सड़कों के नाम बदलने पर विचार किया जा रहा है उनमें लेनिन सरणी, कार्ल मार्क्स सरणी और हो ची मिन्ह सरणी के नाम शामिल हैं। अधिकारी ने कहा कि इस संबंध में अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया है और नामों में कोई भी बदलाव समिति की सिफारिशों के आधार पर ही किया जाएगा।
समिति के सदस्यों में मेघालय के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय, मुख्यमंत्री के सलाहकार सुब्रत गुप्ता और कोलकाता नगर निगम की आयुक्त स्मिता पांडे शामिल हैं। कार्तिक महाराज ने पत्रकारों को बताया कि पैनल उन हस्तियों की अहमियत पर विचार करेगा जिनके नाम पर सड़कों के नाम रखे गए हैं; यह विचार भारतीय और बंगाली विरासत एवं संस्कृति के संदर्भ में किया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘‘हो ची मिन्ह सरणी, लेनिन सरणी और कार्ल मार्क्स सरणी के नाम बदले जाएंगे।
अन्य सड़कों के नाम बदलने के प्रस्ताव भी मिले हैं।’’ कार्तिक महाराज ने कहा कि समिति की सिफारिशें बाद में राज्य विधानसभा को भेजी जाएंगी। अधिकारी ने बताया कि पूर्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष रहे रॉय ने लेनिन सरणी का नाम बदलकर गणितज्ञ और भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष देबप्रसाद घोष के नाम पर रखने का सुझाव दिया। रॉय ने सुझाव दिया कि खिदिरपुर में कार्ल मार्क्स सरणी का नाम बंगाली कवियों माइकल मधुसूदन दत्त या रंगालाल बंद्योपाध्याय के नाम पर रखा जा सकता है क्योंकि वे इस इलाके से जुड़े रहे हैं।
हो ची मिन्ह सरणी के लिए रॉय ने अमेरिकी नागरिक अधिकार नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर का नाम प्रस्तावित किया। केएमसी अधिकारी ने बताया कि रॉय ने जवाहरलाल नेहरू रोड और सिद्धो-कान्हू डहर के चौराहे पर लगी लेनिन की मूर्ति को हटाने की भी मांग की और सुझाव दिया कि शहर की किसी अहम सड़क का नाम सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर रखा जाए। लेनिन सरणी को पहले धर्मतला स्ट्रीट के नाम से जाना जाता था और 1970 में लेनिन की जन्म शताब्दी समारोह के दौरान इसका नाम बदला गया था।
अगले साल सर्कुलर गार्डन रीच रोड का नाम बदलकर कार्ल मार्क्स सरणी कर दिया गया। रॉय ने यह भी सुझाव दिया कि मुस्लिम हस्तियों के नाम वाली कुछ जगहों का नाम बदलकर उन लोगों के नाम पर रखा जाना चाहिए जिन्हें उन्होंने ‘‘राष्ट्रवादी मुस्लिम’’ बताया। उन्होंने कोलकाता के पास बारासात में ‘टीटुमीर’ नामक बस अड्डे के लिए लेखक काजी अब्दुल वदूद, शिक्षाविद बेगम रुकैया और लेखक एस. वाजेद अली के नामों का सुझाव दिया।
इस प्रस्ताव पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या लंबे समय से चले आ रहे नामों को बदलने से कोलकाता के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास के कुछ पहलू मिट सकते हैं या बदल सकते हैं। फिलहाल समिति इन प्रस्तावों की जांच कर रही है और अब तक किसी भी सड़क का नाम आधिकारिक तौर पर नहीं बदला गया है। अधिकारी ने बताया कि पैनल की सिफारिशें मिलने के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।
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