अस्पताल में प्रीमैच्योर नवजात को छोड़ने पर Delhi Court ने माता-पिता को ठहराया दोषी
दिल्ली की एक अदालत ने एक दंपति को उनके समय से पहले जन्मे और चिकित्सकीय रूप से कमजोर शिशु को अस्पताल में छोड़ने के मामले में दोषी ठहराया और कहा कि यदि किसी शिशु को चिकित्सा संस्थान में छोड़ने के पीछे उसे पूरी तरह त्यागने की मंशा हो, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 317 के तहत परित्याग माना जा सकता है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुनील कुमार ने हरीना रे उर्फ रीना और उनके पति जीतू कुमार को भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 317 (12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को उसके माता पिता या उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा उजागर करना और छोड़ देना) तथा धारा 34 के तहत दोषी ठहराया। दस सितंबर के आदेश में अदालत ने कहा, ‘‘साबित तथ्यों पर समग्र रूप से विचार करने पर यह स्थापित होता है कि बच्चे को छोड़ने के कृत्य के साथ-साथ उसे पूरी तरह से त्यागने का इरादा भी शामिल था, जो भादंसं की धारा 317 का एक अनिवार्य तत्व है।’’ अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि बच्ची का जन्म 12 दिसंबर 2014 को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में समय से पहले हुआ था।
कम वजन और चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में भर्ती कराया गया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माता-पिता अस्पताल छोड़कर चले गए और शिशु की देखभाल के लिए वापस नहीं लौटे, जबकि उनसे संपर्क करने के बार-बार प्रयास किए गए। इसके बाद 12 मार्च 2015 को बच्ची को देखभाल के लिए निर्मल छाया भेज दिया गया, जहां कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई।
अदालत ने अन्य साक्ष्यों के साथ डीएनए रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिससे यह साबित हुआ कि रीना और जीतू कुमार बच्ची के जैविक माता-पिता थे। अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिशु को एक विशेष चिकित्सा सुविधा में छोड़ना उसे त्यागने के बजाय इलाज दिलाने की मंशा को दर्शाता है। अदालत ने कहा, ‘‘इस अपराध का सार बच्चे को पूरी तरह त्यागने की मंशा से उसे छोड़ना या असहाय स्थिति में डालना है।’’ अदालत ने कहा कि बच्ची चिकित्सकीय रूप से कमजोर थी और आरोपी उसके माता-पिता होने के नाते उसकी देखभाल करने के लिए बाध्य थे।
बच्ची को एनआईसीयू से छुट्टी मिलने के बाद भी उन्होंने उसकी देखभाल दोबारा शुरू नहीं की और उनसे संपर्क करने के बार-बार किए गए प्रयासों के बावजूद वे सामने नहीं आए। इससे बच्ची को पूरी तरह त्यागने की उनकी मंशा स्पष्ट होती है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया है और दोनों आरोपियों को भादंसं की धारा 317/34 के तहत दोषी ठहराया।
Delhi के Satya Niketan Building Collapse में आरोपी सुधांशु और शुभम 12 दिन की न्यायिक हिरासत में
दिल्ली के सत्या निकेतन इमारत हादसे के मामले में अदालत ने रविवार को आरोपी सुधांशु और शुभम को 12 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इस हादसे में सात लोगों की मौत हुई थी। दोनों आरोपियों को दिन में चिकित्सकीय जांच के बाद पटियाला हाउस अदालत में पेश किया गया। दोनों आरोपी पिछले दो दिनों से पुलिस की हिरासत में थे। अदालत में पेश किए जाने से पहले उनका चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया।
6 सितंबर को भरभराकर गिरी थी इमारत
दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के पास सत्या निकेतन में यह इमारत 6 सितंबर को गिर गई थी। उस समय इमारत में मरम्मत और उसे बढ़ाने का काम चल रहा था। हादसे में सात लोगों की जान चली गई, जिसके बाद इमारत में चल रहे काम और कथित तौर पर बिना अनुमति किए जा रहे निर्माण को लेकर सवाल उठे।
#WATCH | Delhi: Satya Niketan Building Collapse | The accused, Sudhanshu and Shubham Tyagi being taken from the Patiala House Court by Delhi Police.
12 days of judicial custody have been given to the accused in the Satya Niketan Building Collapse case pic.twitter.com/oIxHkqo5zU— ANI (@ANI) September 13, 2026
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एमसीडी ने तीन इंजीनियरों को किया निलंबित
इस बीच, दिल्ली नगर निगम ने गुरुवार को अपने भवन विभाग के एक सहायक अभियंता और दो कनिष्ठ अभियंताओं को निलंबित कर दिया। इन अधिकारियों पर कथित तौर पर ड्यूटी में लापरवाही बरतने और बिना अनुमति हो रहे निर्माण के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का आरोप है।
निलंबित अधिकारियों में दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र, जिसे पहले नजफगढ़ क्षेत्र कहा जाता था, में तैनात सहायक अभियंता रविंदर कुमार और कनिष्ठ अभियंता सुमन सौरभ और मोहित यादव शामिल हैं।
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पहले भी अधिकारियों पर हुई थी कार्रवाई
इमारत गिरने के कुछ दिन बाद दिल्ली नगर निगम ने दक्षिण क्षेत्र के उपायुक्त राकेश कुमार और चार इंजीनियरों को भी निलंबित किया था। उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई है।
नगर निगम के मुताबिक, इलाके में बिना अनुमति हो रहे निर्माण से जुड़े मामलों को संभालने में इन अधिकारियों की ओर से लापरवाही हुई है। सत्या निकेतन इमारत हादसे के बाद नगर निगम के अधिकारियों की भूमिका और हादसे से पहले बिना अनुमति हो रहे निर्माण के खिलाफ की गई कार्रवाई की भी जांच के दायरे में आ गई है।
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