'पर्यटन को कम न आंकें, GDP में इसका बड़ा योगदान', ब्रिक्स समिट से पहले बोलीं साउथ अफ्रीका टूरिज्म हेड
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में शुरू हो रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 में विदेशी मेहमान भारत के आतिथ्य से काफी खुश नजर आ रहे हैं. ब्रिक्स वुमेन्स बिजनेस अलायंस, साउथ अफ्रीका की कार्यकारी सदस्य और टूरिज्म हेड थेंबिसा जिमाना ने ब्रिक्स से मिलने वाले अवसरों पर आईएएनएस से कहा, "पर्यटन को कम नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि पर्यटन पूरी अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है."
'सभी उद्योग पर्यटन पर निर्भर'
उन्होंने कहा, "सभी उद्योग पर्यटन पर निर्भर हैं. आपके यहां आने के लिए आपको होटल बुक करना होगा, आपको तैयार होना होगा, यह पर्यटन है. यदि आप बीमार पड़ते हैं, तो वह मेडिकल टूरिज्म है. इसलिए पर्यटन जीडीपी में बहुत योगदान देता है. इसलिए इस तरह के मंचों में भी इसकी बड़ी भूमिका है."
महिला सशक्तीकरण पर उन्होंने कहा, "हम मैडम लेबो के नेतृत्व में हैं, जो बहुत ऊर्जावान हैं, जो हमेशा महिला समावेश के लिए लड़ती हैं. इसलिए हम भी उनसे प्रेरणा लेते हैं. इसलिए इस शिखर सम्मेलन में आना उन लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करना भी है जो साउथ अफ्रीका में पीछे रह गए थे, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वैश्विक स्तर पर लिए जाने वाले सभी निर्णयों में महिलाओं को शामिल किया जाए.
महिलाओं को मिले आवाज- साउथ अफ्रीका टूरिज्म हेड
ब्रिक्स, एक मंच के रूप में, इसकी अनुमति देता है, महिलाओं को भी आवाज मिले. और न केवल दस्तावेजों, कागजों के लिए आवाज, बल्कि ठोस परिणाम भी हों. जैसे हाल ही में, हमने एक स्टार्टअप प्रोग्राम की मेजबानी की, जिसे ब्रिक्स वुमेन्स बिजनेस अलायंस ने शुरू किया था, जहां वे सबसे अच्छा करने वाले उद्यमियों को सशक्त बनाते हैं और उन्हें पुरस्कार देते हैं."
बता दें कि दक्षिण अफ्रीका में 'मैडम लेबो' के नाम से प्रसिद्ध व्यक्तित्व मुख्य रूप से लेबोगांग (लेबो) रामाफोको को माना जाता है, जो देश की एक बेहद लोकप्रिय नारीवादी कार्यकर्ता और सामाजिक न्याय की पैरोकार हैं
'टीवी ब्रिक्स अफ्रीका' के शेड्रैक हॉलो ने अपने अनुभव को साझा करते हुए आईएएनएस से कहा, "नमस्ते. मेरा प्रवास बहुत शानदार रहा. मैं साउथ अफ्रीका से हूं. मैं 8 सितंबर को यहां पहुंचा और अनुभव बहुत अच्छा रहा. खाना अद्भुत है, यह स्वादिष्ट है, रंग-बिरंगा है. मैंने हर निवाले का लुत्फ उठाया, खासकर आपका तंदूरी चिकन."
ब्रिक्स देशों को सुरक्षित करना चाहिए- शेड्रैक हॉलो
उन्होंने ब्रिक्स समिट बिजनेस फोरम और द्विपक्षीय बातचीत के फायदों पर बात करते हुए कहा, "मुझे लगता है कि इस बार ब्रिक्स बहुत अच्छा रहा है. खासकर बिजनेस फोरम में जिसमें मैं शामिल हुआ, वह वास्तव में अवसरों को खोलने के बारे में था. मुझे लगता है कि मंत्री जो पूरे साल मिलते रहे हैं, वे समझते हैं कि हमें ब्रिक्स देशों को सुरक्षित करना है और करना ही चाहिए, खासकर जब कृषि की बात आती है."
उन्होंने कहा, "खाद्य सुरक्षा ब्रिक्स देशों के लिए बहुत, बहुत महत्वपूर्ण उद्देश्य है. और मुझे लगता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं. ब्रिक्स के उद्यमियों के बीच जो बातचीत हुई, वह वास्तव में इस बात को समझने में दृढ़ थी कि हमें मैन्युफैक्चरिंग में कौशल साझा करने और एक-दूसरे से ज्यादा खरीदने की जरूरत है." उन्होंने बताया कि साउथ अफ्रीका के राजदूत ने भी कहा है कि चीजें बदल गई हैं. शेड्रैक हॉलो ने कहा कि साउथ अफ्रीका और भारत के बीच गहरा रिश्ता है.
स्रोत- आईएएनएस
क्या होती है 'कार डिप्लोमेसी', 2014 से अब तक कितनी बार पीएम मोदी कर चुके कार वाली कूटनीति?
Explainer: कूटनीति की दुनिया में कई बार एक छोटी-सी तस्वीर बड़ी राजनीतिक कहानी कह देती है. नेताओं की औपचारिक बैठक, संयुक्त बयान और प्रेस कॉन्फ्रेंस तो आम राजनयिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन जब दो देशों के शीर्ष नेता एक ही कार में बैठकर सफर करते दिखाई देते हैं, तो तस्वीर का संदेश कहीं ज्यादा व्यक्तिगत माना जाता है.
दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात के बाद भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. द्विपक्षीय बैठक के बाद दोनों नेता एक साथ कार में सवार होकर इनोप्रोम प्रदर्शनी के लिए रवाना हुए. जिस कार में दोनों बैठे, वह पुतिन की बख्तरबंद Aurus Senat थी.
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी किसी विदेशी नेता के साथ कार में सफर करते नजर आए हैं. पिछले वर्षों में बराक ओबामा, बेंजामिन नेतन्याहू, पुतिन, कीर स्टार्मर और दूसरे वैश्विक नेताओं के साथ उनकी ऐसी तस्वीरें सामने आती रही हैं.
आखिर क्या होती है कार डिप्लोमेसी?
सरल शब्दों में कहें तो कार डिप्लोमेसी उस स्थिति को कहा जा सकता है, जब दो शीर्ष नेता औपचारिक प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर एक ही कार में साथ यात्रा करते हैं.
राजनयिक मुलाकातों में प्रोटोकॉल बेहद महत्वपूर्ण होता है. कौन किस स्थान पर बैठेगा, किस रास्ते से जाएगा, किस समय मुलाकात होगी और किस स्तर के अधिकारी साथ होंगे इन सबका पहले से निर्धारण किया जाता है.
ऐसे में दो राष्ट्राध्यक्षों का एक ही कार में साथ बैठना अपेक्षाकृत अनौपचारिक दृश्य पैदा करता है. यह संदेश दे सकता है कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत सहज है और रिश्तों में व्यक्तिगत विश्वास का स्तर भी अच्छा है.
हालांकि हर कार राइड को अपने आप में कोई औपचारिक कूटनीतिक समझौता नहीं माना जा सकता. इसका महत्व मुख्य रूप से राजनीतिक संकेत और प्रतीकात्मकता में होता है.
मोदी-पुतिन की कार राइड क्यों बनी चर्चा का विषय?
प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन के बीच लंबे समय से व्यक्तिगत स्तर पर भी सहज संबंधों की तस्वीरें सामने आती रही हैं. दिल्ली में दोनों नेताओं की बैठक के बाद साथ कार में जाना इसी रिश्ते की एक और झलक के तौर पर देखा गया.
इससे पहले भी दोनों नेता 31 अगस्त को किर्गिस्तान के बिश्केक में साथ यात्रा करते नजर आए थे. लगातार ऐसे अनौपचारिक पलों का सामने आना भारत-रूस संबंधों की गर्माहट को सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित करता है.
खास बात यह भी है कि पुतिन जिस कार में यात्रा करते हैं, वह खुद भी चर्चा का विषय रहती है. रूसी राष्ट्रपति की बख्तरबंद Aurus Senat सुरक्षा और लग्जरी दोनों के लिए जानी जाती है.
मोदी ने किन-किन नेताओं के साथ की कार डिप्लोमेसी?
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी कई विदेशी नेताओं के साथ कार में सफर कर चुके हैं. आपके दिए गए उदाहरणों के मुताबिक प्रमुख मौकों में शामिल हैं:
नोट - करीब 11 मौके 2014 से अब तक सामने आते हैं. हालांकि अलग-अलग यात्राओं और तारीखों की आधिकारिक पुष्टि के आधार पर यह संख्या बदल सकती है.
बराक ओबामा के साथ पहली बड़ी तस्वीर
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में बराक ओबामा के साथ उनकी कार यात्रा ने काफी ध्यान खींचा था. भारत-अमेरिका संबंधों में उस समय नई ऊर्जा दिखाई जा रही थी.
दोनों नेताओं की ऐसी अनौपचारिक तस्वीर ने यह संदेश दिया कि द्विपक्षीय संबंध केवल आधिकारिक बैठकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों नेतृत्व के बीच व्यक्तिगत संवाद की भी गुंजाइश है.
नेतन्याहू के साथ भी दिखी थी दोस्ती
2017 में इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मोदी की कई अनौपचारिक तस्वीरें चर्चा में रही थीं. दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत गर्मजोशी को भारत-इजरायल संबंधों की बढ़ती निकटता से जोड़कर देखा गया.
कूटनीति में इस तरह की सहजता का अपना महत्व है, क्योंकि नेता जब सार्वजनिक मंच से अलग वातावरण में साथ दिखाई देते हैं तो जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक रिश्तों की अलग छवि पहुंचती है.
पुतिन के साथ बार-बार क्यों?
मोदी और पुतिन के मामले में कार डिप्लोमेसी का एक अलग महत्व है. भारत और रूस के रिश्ते कई दशकों पुराने हैं और रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग तथा रणनीतिक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच गहरे संबंध रहे हैं.
ऐसे में दोनों नेताओं का एक साथ कार में सफर करना केवल व्यक्तिगत दोस्ती का संकेत नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों की सार्वजनिक तस्वीर भी बन जाता है.
हाल के वर्षों में वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदली हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत को रूस और पश्चिमी देशों दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना पड़ा है. ऐसे माहौल में मोदी-पुतिन की सहज तस्वीरों का अपना कूटनीतिक संदेश होता है.
कार डिप्लोमेसी में निजी बातचीत भी अहम
एक साथ कार में सफर करने का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि नेताओं को औपचारिक बैठक के बाहर कुछ समय मिल जाता है. हालांकि यह मान लेना सही नहीं होगा कि कार में हुई हर बातचीत पूरी तरह निजी या रिकॉर्ड से बाहर होती है.
फिर भी औपचारिक बैठक की तुलना में यात्रा का माहौल अपेक्षाकृत सहज हो सकता है. नेता किसी मुद्दे पर अपनी व्यक्तिगत राय, आगामी बैठक की रणनीति या द्विपक्षीय रिश्तों से जुड़े विषयों पर अनौपचारिक बातचीत कर सकते हैं. यही वजह है कि कार की कुछ मिनटों की यात्रा भी कूटनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण हो सकती है.
क्या हर बार इसका मतलब 'गहरी दोस्ती' होता है?
यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है. कार में साथ बैठना हमेशा व्यक्तिगत दोस्ती या किसी बड़े समझौते का प्रमाण नहीं होता.
कई बार यह सुरक्षा, कार्यक्रम की सुविधा, यात्रा की दूरी या मेजबान देश के प्रोटोकॉल का हिस्सा भी हो सकता है. इसलिए किसी कार राइड से रिश्तों की पूरी दिशा तय करना सही नहीं होगा.
लेकिन जब किसी नेता के साथ बार-बार ऐसे अनौपचारिक दृश्य सामने आते हैं, तो यह राजनीतिक संचार का एक प्रभावी प्रतीक जरूर बन जाता है.
तस्वीर से बनता है कूटनीतिक नैरेटिव
आज की कूटनीति केवल बंद कमरे की बैठकों तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया के दौर में नेताओं की तस्वीरें भी संदेश पहुंचाने का माध्यम बन चुकी हैं.
एक औपचारिक बैठक की तस्वीर बताती है कि दोनों नेता बातचीत कर रहे हैं. लेकिन एक ही कार में साथ बैठी तस्वीर यह अतिरिक्त संकेत देती है कि दोनों के बीच बातचीत का माहौल सहज है.
यही वजह है कि मोदी-पुतिन की कार राइड की तस्वीर भी बैठक के एजेंडे से अलग एक राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई.
2014 से मोदी की कूटनीति में दिखता है यह नया अंदाज
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की एक खास विशेषता नेताओं के साथ व्यक्तिगत संपर्क और अनौपचारिक संवाद पर जोर भी रही है. अलग-अलग देशों के नेताओं के साथ उनकी मुलाकातों में गले मिलने, साथ टहलने, चाय पर बातचीत करने और कार में सफर करने जैसे दृश्य कई बार देखने को मिले हैं.
इन्हें भारत की व्यक्तिगत नेतृत्व वाली कूटनीति के व्यापक अंदाज के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है. कार डिप्लोमेसी इसी शैली का एक छोटा लेकिन बेहद प्रभावशाली हिस्सा है जहां कुछ मिनट की यात्रा भी हजारों शब्दों का राजनीतिक संदेश दे सकती है.
कार छोटी, संदेश बड़ा
मोदी-पुतिन की हालिया कार राइड को सिर्फ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का सफर मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी. कूटनीति में प्रतीकों की अपनी भाषा होती है और एक साथ कार में बैठना उसी भाषा का हिस्सा है.
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