अमेरिका में विदेशी कामगारों के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला एक और प्रस्ताव सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने नौकरी जाने के बाद एच-1बी वीजा धारकों समेत कुछ अन्य विदेशी कर्मचारियों को मिलने वाली 60 दिन की राहत खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। अगर यह बदलाव लागू होता है तो रोजगार समाप्त होने के बाद संबंधित कर्मचारी को अमेरिका में रुककर नई नौकरी तलाशने के लिए पहले जैसी लंबी मोहलत नहीं मिलेगी।
मौजूद जानकारी के अनुसार, अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग ने इस संबंध में प्रस्ताव संघीय रजिस्टर में प्रकाशित किया है। प्रस्ताव अभी अंतिम नियम नहीं है। इस पर करीब दो महीने तक आम लोगों और संबंधित पक्षों से राय मांगी जाएगी। इसके बाद सरकार मिले सुझावों पर विचार करके इसे लागू करने या इसमें बदलाव करने का फैसला कर सकती है।
गौरतलब है कि 60 दिन की यह सुविधा वर्ष 2017 में शुरू की गई थी। इसका मकसद नौकरी जाने के बाद विदेशी कर्मचारियों को अचानक अमेरिका छोड़ने की मजबूरी से बचाना था। इस अवधि में कर्मचारी नया नियोक्ता तलाश सकते थे और जरूरी कागजी प्रक्रिया पूरी कर सकते थे। इसके अलावा उन्हें घर खाली करने, बच्चों की पढ़ाई से जुड़े इंतजाम करने और अमेरिका से वापस जाने की तैयारी के लिए भी समय मिल जाता था।
प्रस्तावित बदलाव के तहत एच-1बी और कुछ दूसरी अस्थायी कामकाजी श्रेणियों के कर्मचारियों को रोजगार खत्म होते ही अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में यदि कोई नया नियोक्ता उनके लिए नई याचिका दाखिल करता है तो वे दोबारा अमेरिका आने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।
बता दें कि एच-1बी व्यवस्था वर्ष 1990 में अमेरिकी संसद ने शुरू की थी। इसके जरिए अमेरिकी कंपनियां ऐसे विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं, जिनके कौशल वाले कर्मचारियों की घरेलू स्तर पर पर्याप्त उपलब्धता नहीं होती। भारतीय और चीनी पेशेवर इस व्यवस्था के सबसे बड़े लाभार्थियों में रहे हैं। अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में भारतीय कर्मचारियों की संख्या खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
प्रस्तावित नियम का असर केवल एच-1बी तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें ई-1 श्रेणी के अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों, ई-2 श्रेणी के वाणिज्यिक वाहन संचालकों, एल-1 श्रेणी के अधिकारियों और प्रबंधकों, ओ-1 श्रेणी के असाधारण प्रतिभा वाले लोगों, टीएन श्रेणी के पेशेवरों तथा सिंगापुर और चिली के कुशल कर्मचारियों के लिए एच-1बी1 श्रेणी पर भी असर पड़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया के विशेष कौशल वाले कर्मचारियों के लिए ई-3 श्रेणी भी प्रस्ताव के दायरे में बताई गई है।
अमेरिकी सरकार का तर्क है कि विदेशी कर्मचारी हटने से कुछ पदों पर अमेरिकी नागरिकों को रोजगार मिल सकता है। विभाग ने यह भी माना है कि कंपनियों को कर्मचारियों में अचानक बदलाव के कारण कुछ परेशानी हो सकती है, लेकिन उसके अनुसार कंपनियां जरूरत पड़ने पर योग्य अमेरिकी कर्मचारियों को नियुक्त कर सकती हैं या नए विदेशी कर्मचारी के लिए अलग से आवेदन कर सकती हैं।
भारतीयों के लिए यह प्रस्ताव इसलिए भी अहम है क्योंकि डेलॉयट, पीडब्ल्यूसी, अर्न्स्ट एंड यंग, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इन्फोसिस, एचसीएलटेक और एलटीआईमाइंडट्री जैसी कंपनियां बड़ी संख्या में एच-1बी कर्मचारियों को प्रायोजित करती रही हैं।
यह कदम ट्रंप प्रशासन की कानूनी प्रवासन व्यवस्था को सख्त करने की व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। हाल के महीनों में कुशल विदेशी कर्मचारियों से जुड़े शुल्क और आव्रजन प्रक्रिया को लेकर भी कई बदलाव किए गए हैं। वहीं, अमेरिका के श्रम विभाग ने भारतीय मूल की अमेरिकी कंपनी कॉग्निजेंट की नए स्थायी निवास प्रायोजन के लिए आवेदन करने की क्षमता भी निलंबित की है और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों के खिलाफ किसी भी खतरे को बर्दाश्त नहीं करने की बात कही है। ऐसे में नए प्रस्ताव ने अमेरिका में काम कर रहे विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीय कर्मचारियों के बीच चिंता बढ़ा दी है।
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BRICS बिज़नेस फ़ोरम 2026 के मौके पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय राजधानी में BRICS नेताओं, BRICS बिज़नेस काउंसिल के प्रमुखों और BRICS महिला बिज़नेस अलायंस के साथ एक ग्रुप फ़ोटो खिंचवाई। इस ग्रुप फ़ोटो में PM मोदी के साथ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, उनके ब्राज़ीलियाई समकक्ष मौरो विएरा, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा समेत कई अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल थे। BRICS बिज़नेस फ़ोरम, BRICS समूह का मुख्य प्राइवेट सेक्टर प्लेटफ़ॉर्म है और यह हर साल लीडर्स समिट से ठीक पहले समिट की मेज़बानी करने वाले देश में आयोजित किया जाता है। यह व्यापार, निवेश, वित्त, टेक्नोलॉजी और विकास से जुड़ी उन चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए बिज़नेस लीडर्स, मंत्रियों और राष्ट्राध्यक्षों को एक साथ लाता है, जो BRICS के आर्थिक एजेंडे को तय करती हैं।
यह फ़ोरम एक ऐसे प्लेटफ़ॉर्म के तौर पर भी काम करता है जहाँ काउंसिल के अहम विचारों और सुझावों को पेश किया जाता है और उन पर चर्चा होती है। यह एजेंडा तय करने में अहम भूमिका निभाता है; इसके नतीजों और बिज़नेस काउंसिल की सिफ़ारिशों को अक्सर ब्रिक्स समिट के घोषणापत्रों और आगे के काम की योजनाओं में शामिल किया जाता है। इन क्षेत्रों में ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार, निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था, MSME, स्टैंडर्ड्स में सहयोग और वैल्यू चेन इंटीग्रेशन शामिल हैं। ब्रिक्स बिज़नेस फ़ोरम का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब भारत 2026 की अपनी अध्यक्षता के तहत 18वें ब्रिक्स समिट की मेज़बानी कर रहा है। भारत की अध्यक्षता “मज़बूती, इनोवेशन, सहयोग और सस्टेनेबिलिटी के लिए निर्माण” थीम पर आधारित है, जिसमें विकास, सस्टेनेबिलिटी और इनोवेशन मुख्य फ़ोकस क्षेत्र हैं। ब्रिक्स प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल बिठाने और मल्टीलेटरल संस्थाओं में ग्लोबल साउथ के हितों को आगे बढ़ाने के लिए एक अहम प्लेटफ़ॉर्म के तौर पर उभरा है। इसके एजेंडे में विकास, फ़ाइनेंस, टेक्नोलॉजी, व्यापार और लोगों के बीच आपसी आदान-प्रदान शामिल हैं। इस समूह में अभी 11 देश शामिल हैं -- ब्राज़ील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ़्रीका और UAE।
भारत की 2026 की अध्यक्षता के बारे में मिली जानकारी के अनुसार, ब्रिक्स सदस्य मिलकर दुनिया की कुल आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, ग्लोबल GDP का 40 प्रतिशत और ग्लोबल व्यापार का 26 प्रतिशत हिस्सा हैं। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया में आर्थिक बंटवारा, टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन और संसाधनों पर दबाव जैसी चुनौतियां हैं। भारत के लिए, 2026 की अध्यक्षता का मकसद ब्रिक्स के बढ़े हुए प्रतिनिधित्व को सार्थक सहयोग और ठोस नतीजों में बदलना है। साथ ही, इसके अलग-अलग तरह के सदस्यों के बीच आम सहमति बनाना और मौजूदा सिस्टम को और असरदार बनाना भी इसका लक्ष्य है। इसलिए, बिजनेस फोरम - जिसमें बिजनेस लीडर्स, मंत्री और राष्ट्राध्यक्ष शामिल होते हैं - भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का एक अहम हिस्सा है, क्योंकि यह ग्रुप व्यापार, निवेश, फाइनेंस, टेक्नोलॉजी और विकास से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा करता है।
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