Delhi के PG में तंग कमरे और भारी किराए से परेशान छात्र, बुनियादी सुविधाओं के लिए भी अतिरिक्त खर्च
(मानसी जगनी और वर्षा सागी) नयी दिल्ली, 11 सितंबर बालकनी में बना बाथरूम, बिना लिफ्ट वाली पांच मंजिला इमारत की छत पर बना टिन शेड वाला कमरा.... , हर इंच जगह की कीमत.... यहां तक कि प्लास्टिक की मेज के लिए भी अतिरिक्त पैसे देने पड़ते हैं। दिल्ली में भविष्य बनाने का सपना लेकर आने वाले छात्र ऐसी तंग जगहों में रहने को मजबूर हैं, जिन्हें वे घर नहीं बल्कि जेल महसूस करते हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली देश के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों का केंद्र है, लेकिन दाखिला मिल जाने से ही छात्रों की मुश्किलों का अंत नहीं होता।
उत्तर दिल्ली के नॉर्थ कैंपस के आसपास मुखर्जी नगर और कमला नगर, पुराने राजेंद्र नगर के आईएएस कोचिंग केंद्र, साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन और मोती बाग तथा लक्ष्मी नगर के सीए और सीएस कोचिंग केंद्रों में छात्र अपनी कल्पना से बिल्कुल अलग छोटे कमरों और पीजी में रहने को मजबूर हैं। छात्र केवल पैसे बचाने और अपने माता-पिता पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए इन परेशानियों को सहते हैं। सत्य निकेतन में इमारत गिरने से सात छात्रों की मौत की घटना के बाद ‘पीटीआई-भाषा’ ने राजधानी के ऐसे प्रमुख इलाकों में पड़ताल की, जहां छात्र बड़ी संख्या में रहते हैं।
इसमें दिल्ली में बेहतर शिक्षा के सपने के साथ ही खराब स्थिति में रहने की बात भी सामने आई। मुखर्जी नगर के एक पीजी में अगले बैच के लिए तैयार किए जा रहे कमरे में बिस्तर के अलावा लगभग कोई जगह नहीं थी। बालकनी में एक छोटा सिंक और शौचालय बना हुआ था।
एक ब्रोकर ने बताया, ‘‘बाथरूम अंदर नहीं बनाया जा सका क्योंकि इसके लिए तय जगह नीचे रहने वाले परिवार के घर में बने मंदिर के कारण इस्तेमाल नहीं हो सकती थी।’’ कहीं कमरे का आकार मुश्किल से 6-7 फुट गुणा 4-5 फुट था, तो कहीं दीवार की जगह गत्ते का पर्दा लगा था। दो-तीन छात्रों के लिए बने कमरों में बिस्तर, रैक, मेज, किताबें और कपड़ों के कारण चलने तक की जगह नहीं बचती। सत्य निकेतन में रहने वाले एक छात्र ने कहा, ‘‘कमरे के अंदर (अटैच्ड) बाथरूम के लिए 5,000 या 6,000 रुपये ज्यादा देने पड़ते हैं।
इसलिए हममें से ज्यादातर लोग समझौता करते हैं और ऐसा कमरा लेते हैं, जहां एक छोटा बाथरूम दो या तीन कमरों के बीच साझा होता है।’’ छात्रों ने बताया कि खाने के बिना, कमरे का किराया 6,000 रुपये तक और खाने के साथ 12,000 से 13,000 रुपये तक हो सकता है। इसके अलावा टिफिन सेवा के लिए करीब 2,500 रुपये और बिजली का बिल अलग से देना पड़ता है। पुराने फर्नीचर और इस्तेमाल किए हुए उपकरण भी परेशानी बढ़ाते हैं और कई बार बिजली का बिल भी बढ़ा देते हैं।
छात्रों ने बताया कि पढ़ाई की मेज के लिए उन्हें 1,500 से 2,000 रुपये तक देने पड़ते हैं और कई बार प्लास्टिक की मेज ही मिलती है। आईएएस की तैयारी कर रहे ऋतिक ने कहा, ‘‘कल्पना कीजिए कि कोई छात्र आईएएस की तैयारी या विश्वविद्यालय की पढ़ाई के लिए वर्षों तक यहां रहे और उसे बैठकर पढ़ने जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी अलग से पैसे देने पड़ें। किराया, बिजली और अन्य खर्च जोड़ने पर यह राशि काफी ज्यादा हो जाती है।’’ पुराने राजेंद्र नगर में छात्रों ने बताया कि कई बार ब्रोकर कमरा दिलाने का भरोसा देकर अग्रिम पैसे ले लेते हैं और बाद में गायब हो जाते हैं।
लखनऊ के एक छात्र ने कहा, ‘‘मेरे रूममेट से ब्रोकर ने 10,000 रुपये ले लिए। वे कमरा दिलाने के नाम पर 10,000 या 12,000 रुपये एडवांस लेते हैं और फिर अचानक गायब हो जाते हैं।’’ उसने कहा, ‘‘सबसे बड़ी समस्या यह है कि छात्र मजबूर होते हैं। हमारे पास कक्षाएं, परीक्षाएं और कोचिंग की चिंता होती है और ब्रोकर जानते हैं कि हमारे पास ज्यादा खोजबीन करने का समय नहीं है।’’ छात्रों ने बताया कि कमरों की ऑनलाइन तस्वीरें अक्सर वास्तविक स्थिति से अलग होती हैं।
मोती बाग के एक छात्र ने कहा कि इंटरनेट पर साफ-सुथरे और रोशनी वाले कमरे दिखाए जाते हैं, लेकिन पहुंचने पर तस्वीर अलग होती है। उसने कहा, ‘‘ऑनलाइन तस्वीरों में कमरे बहुत अच्छे लगते हैं। साफ कमरा, अच्छी रोशनी और ठीक-ठाक इमारत देखकर लगता है कि यहां रहा जा सकता है।
लेकिन जब आप यहां पहुंचते हैं और कमरे की जरूरत होती है तो आपके पास हमेशा वापस जाने का विकल्प नहीं होता।’’ लक्ष्मी नगर में सीए और सीएस परीक्षा की तैयारी कर रही एक छात्रा ने बताया कि वह पिछले साल से पांच मंजिला इमारत की छत पर बने टिन शेड में रह रही है। उसने कहा, ‘‘दोपहर तक कमरा इतना गर्म हो जाता है कि तुरंत एसी चलाना पड़ता है। गर्मियों में मेरा बिजली का बिल 5,000 रुपये तक पहुंच जाता है, जबकि दिन का काफी समय कोचिंग या लाइब्रेरी में बीतता है।’’ छात्रों ने बताया कि बारिश के दिनों में परेशानी और बढ़ जाती है।
कमला नगर के सेंट स्टीफंस कॉलेज के परास्नातक छात्र 22 वर्षीय ऑस्टिन ने कहा, ‘‘पीजी के आसपास की संकरी गलियों में बारिश के बाद पानी और कीचड़ भर जाता है, जिससे कॉलेज, कोचिंग और लाइब्रेरी जाना रोज की चुनौती बन जाता है। अंदर कमरों की पतली दीवारों से दूसरे कमरों की आवाजें आसानी से आती हैं और दरवाजा बंद करने के बाद भी निजता नहीं रहती।’’ एक छात्रा ने कहा, ‘‘बाहर से कुछ इमारतें नयी, रंग-रोगन वाली और अच्छी दिखती हैं, लेकिन अंदर की स्थिति देखकर लगता है कि वे धीरे-धीरे खराब हो रही हैं।’’ छात्रों ने उन इमारतों में सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई, जहां नीचे व्यावसायिक दुकानें हैं और ऊपर छात्र रहते हैं। आईएएस की तैयारी कर रहे बिहार के एक छात्र ने कहा, ‘‘कुछ छात्रावासों के नीचे मिठाई और चाट की दुकानें हैं, जहां लगभग पूरे दिन आग जलती रहती है।
ऊपर बेहद तंग कमरों में छात्र रहते हैं। तारों का जाल, संकरी सीढ़ियां, संकरे गलियारे और ठीक से साफ न किए गए बेसमेंट हैं। आने-जाने के लिए उचित रास्ते नहीं हैं।’’ उसने कहा, ‘‘अगर किसी दुकान में आग लग गई और वह पूरी इमारत में फैल गई तो हम कहां जाएंगे?
इन इमारतों में इतनी भीड़ है कि एक हादसा सभी को खतरे में डाल सकता है।’’ दौलतराम कॉलेज की 19 वर्षीय छात्रा आकांक्षा ने बताया कि मई में उसके पीजी के पास लगे बिजली के खंभे से आग लग गई थी। उसने कहा कि करीब 10-12 मिनट तक चिंगारी निकलती रही और बालकनी में सूख रहे कपड़ों में आग लग गई। छात्राओं के लिए परेशानी इमारत से बाहर भी है।
सत्य निकेतन में रहने वाली 18 वर्षीय छात्रा ने बताया कि रात में कम रोशनी वाली संकरी गलियां असुरक्षित महसूस होती हैं। श्वेता ने कहा, ‘‘रात में यह जगह बिल्कुल अलग लगती है। पर्याप्त रोशनी नहीं होती और पता नहीं होता कि रास्ते में कौन खड़ा है।
एक लड़की के रूप में सूर्यास्त के बाद आपको अपने आसपास को लेकर बहुत सतर्क रहना पड़ता है।’’ छात्रों ने कहा कि दिनभर की भागदौड़ के बाद उनके कमरे ही उनका सहारा होते हैं। उन्होंने कहा कि साफ, सुरक्षित और किफायती आवास बुनियादी अधिकार है, खासकर उन छात्रों के लिए जो देश का भविष्य तैयार करेंगे। उन्होंने राजधानी में ‘‘शोषणकारी पीजी संकट’’ को दूर करने के लिए अधिकारियों से कदम उठाने की मांग की।
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