शामली जिले में हुई एक खाप पंचायत में, हरियाणवी गायक अंकित बालियान की हत्या के मामले में फरार दो शूटर और अन्य साजिशकर्ताओं को तत्काल गिरफ्तार किए जाने की मांग की गई। शामली जिले के बंतीखेड़ा गांव में बृहस्पतिवार को हुई इस पंचायत में उत्तर प्रदेश के जांच अधिकारियों के साथ हरियाणा पुलिस के कथित असहयोग पर भी चिंता जताई गई। बालियान खाप के प्रमुख और भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के नेता नरेश टिकैत ने कहा कि पांच सदस्यीय एक समिति बनाई गई है जो हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से मिलकर ये मुद्दे उठाएगी।
पंचायत में टिकैत, बाबा श्याम सिंह (गठवाला खाप प्रमुख), ‘इंटरनेशनल जाट पार्लियामेंट’ के अध्यक्ष मनु चौधरी समेत कई जाट नेताओं के अलावा अंकित बालियान के पिता सतबीर सिंह भी शामिल हुए। पंचायत में शामिल लोगों ने विदेश में रह रहे या जेलों में बंद साजिशकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई किए जाने और बालियान के परिवार को राज्य सरकार द्वारा आर्थिक सहायता दिए जाने की भी मांग की। उन्होंने आरोपियों द्वारा पीड़ित परिवार को सोशल मीडिया पर कथित रूप से धमकाए जाने पर भी चिंता जताई।
इस बीच, शामली के अपर पुलिस अधीक्षक (एएसपी) सुमित शुक्ला ने शुक्रवार को पत्रकारों को बताया कि पुलिस ने करनाल जेल में बंद गैंगस्टर राकेश उर्फ पप्पू से अंकित बालियान हत्याकांड में पूछताछ के लिए उसे पुलिस हिरासत में सौंपे जाने का अनुरोध किया है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने इस गैंगस्टर को अंकित बालियान हत्याकांड में साजिशकर्ता के रूप में चिह्नित किया है। पुलिस फरार शूटर सत्यम और आर्यन को गिरफ्तार करने के लिए कई जगहों पर छापे मार रही है।
दोनों पर एक-एक लाख रुपये का इनाम घोषित है। अंकित बालियान की 26 अगस्त को शामली में एक जिम से निकलकर अपनी कार की ओर जाते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने पहले बताया था कि दो मोटरसाइकिल पर सवार चार हमलावर ने अंकित बालियान पर गोलियां चलाई थीं।
पुलिस ने 29 अगस्त को कुछ आरोपियों की पहचान की। उनमें से दो, मोहित और सुमित, 31 अगस्त को शामली में पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। पुलिस के मुताबिक, मोहित के खिलाफ कम से कम 14 आपराधिक मामले दर्ज थे, जबकि सुमित के खिलाफ एक मामला दर्ज था।
बाद में, पुलिस ने सत्यम और आर्यन की गिरफ्तारी में मदद करने वाली सूचना देने पर इनाम की राशि 50,000 रुपये से बढ़ाकर एक-एक लाख रुपये कर दी। पुलिस ने बताया कि इन दोनों आरोपियों को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है।
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इजराइल के हमले, अमेरिका का दबाव, आर्थिक संकट और पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध जैसा माहौल। ऐसे समय में ईरान का एक चेहरा मसूद पेजिश्कियान का सबसे ज्यादा सामने आया। किया। लेकिन सवाल यह है आखिर सुप्रीम लीडर मोजतबा खामनेई को उन्हीं पर इतना भरोसा क्यों था? और अब जब वो ब्रिक्स समिट के लिए दिल्ली आ रहे हैं तो क्या भारत और ईरान के रिश्तों में कोई बड़ा मोड़ आने वाला है? मसूद पेजेश्कियान आज सिर्फ ईरान के राष्ट्रपति नहीं बल्कि वो ऐसे नेता हैं जिन पर ईरान की सत्ता के सबसे कठिन दौर में सबसे ज्यादा भरोसा उन पर किया गया। दिलचस्प बात यह है कि वो कोई कट्टर मौलवी नहीं, कोई सेना के जनरल नहीं बल्कि एक हार्ट सर्जन है। दिल का ऑपरेशन करने वाला डॉक्टर आज पूरे ईरान की राजनीति का सबसे भरोसेमंद चेहरा बन चुका है। और यही वजह है कि जब ईरान पर लगातार बाहरी दबाव बढ़ा तब खामने ने भी उन्हें सिस्टम का अहम हिस्सा माना।
अब वही मसूद पेजिश्कियान भारत की राजधानी दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स समिट में हिस्सा लेने आ रहे हैं। उससे पहले वो एसइओ समिट में भी दुनिया के बड़े नेताओं के साथ दिखाई दिए थे। यह सिर्फ एक विदेश दौरा नहीं बल्कि ईरान की नई कूटनीति का संदेश माना जा रहा है। मसूद फिजिशियान की कहानी राजनीति से नहीं अस्पताल से शुरू होती है। उनका जन्म साल 1954 में ईरान के महाबाद शहर में हुआ। उनके पिता अजर बैजानी मूल के थे और मां खुर्द समुदाय से। यानी ईरान के दो बड़े समुदायों से उनका ताल्लुक रहा है। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की। फिर हार्ट सर्जन बने और ईरान इराक युद्ध के दौरान घायल सैनिकों का इलाज किया। यही अनुभव उन्हें आम लोगों के बीच एक संवेदनशील और जमीनी नेता की पहचान देता है। बाद में वह स्वास्थ्य मंत्री बने। कई बार सांसद चुने गए और संसद के उपाध्यक्ष भी रहे। यानी उनका राजनीतिक सफर धीरे-धीरे बना अचानक से नहीं। लेकिन असली मोड़ आया साल 2024। राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद ईरान में चुनाव हुए। उस चुनाव में मसूद पेजिश्कियान ने खुद को एक सुधारवादी यानी रिफॉर्मिस्ट नेता के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि ईरान को दुनिया से बातचीत करनी चाहिए। अर्थव्यवस्था सुधारनी चाहिए और लोगों की जिंदगी आसान बनानी चाहिए।
दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि चीन, रूस, ईरान और भारत जैसे अलग-अलग हित वाले देश किस तरह से एक साझा एजेंडा बना पाते। पश्चिम एशिया का युद्ध, रूस, यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक भुगतान व्यवस्था जैसे मुद्दे जो एजेंडा है उस पर रहेंगे। यानी कि क्या कोई एक ऐसा प्लेटफार्म बनेगा जहां पर जो ब्रिक्स कंट्री है वो आपस में किस तरह से जो पेमेंट है इसको और ज्यादा बेहतर तरीके से करना है और क्या डीडोलराइजेशन की तरफ एक जो कदम है वो भी इसमें बढ़ेगा यह भी एक अहम मुद्दा रहने वाला है। इन सब माहौल में मसूद पेजिश्कियान की मौजूदगी ईरान का संदेश है कि वो खुद को अलग-थलग नहीं दिखाना चाहता इस पूरे वर्ल्ड ऑर्डर में बल्कि बड़े बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती ईरान की इकॉनमी है। वर्षों से लगे प्रतिबंधों ने महंगाई, बेरोजगारी और मुद्रा संकट ईरान के अंदर बढ़ा दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद आर्थिक सुधार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और विदेशी निवेश बढ़ाने की बात कही और साथ ही परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के रास्ते भी खुले रखने की इच्छा वह जता चुके। हालांकि सुरक्षा हालात ने कई कोशिशों को मुश्किल भी बना दिया। उनका संदेश साफ रहा। मजबूत सुरक्षा और मजबूत अर्थव्यवस्था दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए।
एक तरफ रूस चीन जैसे साझेदार और दूसरी तरफ भारत और दूसरे ग्लोबल साउथ देश। मसूद फिजिशियान इन सबके बीच संतुलन एक बैलेंस बनाने की कोशिश करते नजर आते हैं। शायद यही वजह है कि संकट के दौर में उनका खत और ज्यादा बड़ा हो गया है और अब दिल्ली में उनकी मौजूदगी सिर्फ एक फोटो ऑफ नहीं रहने वाली। अगर भारत और ईरान के बीच चाबहार ऊर्जा और व्यापार पर नई बातचीत आगे बढ़ती है तो इसका असर पूरे दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है। यह भी संभव है। ब्रिक्स समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मसूद फिजिशियान की मुलाकात पर पूरी दुनिया भर की नजर इसलिए भी रहने वाली है क्योंकि यह दो ऐसे देशों की बातचीत होगी जो अलग-अलग वैश्विक गुटों के बीच संतुलन बनाकर चलने की कोशिश करते हैं।
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