'मुझे शर्म आती है..' जानें आखिर क्यों नितिन गडकरी ने कही ये बात
मुंबई-गोवा राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में हो रही देरी को लेकर केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सख्त नाराजगी जताई है. गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने इस परियोजना में हुई देरी को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि हाईवे को पूरा होने में 16 से 17 साल का समय लग गया, जो स्वीकार्य नहीं है.
गडकरी ने यहां तक कहा कि इतने लंबे इंतजार के बाद सड़क का उद्घाटन करने में उन्हें शर्मिंदगी महसूस होगी और वह उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे. उनके इस बयान के बाद लंबे समय से चल रही मुंबई-गोवा हाईवे परियोजना एक बार फिर चर्चा में आ गई है.
16-17 साल की देरी पर जताई नाराजगी
गोवा के पर्वरी में 6 लेन एलिवेटेड कॉरिडोर के उद्घाटन कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने मुंबई-गोवा हाईवे की प्रगति का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि मुंबई से कोंकण होते हुए गोवा तक जाने वाला यह मार्ग महाराष्ट्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन परियोजना को पूरा करने में असामान्य रूप से लंबा समय लगा.
VIDEO | Porvorim: Union Minister Nitin Gadkari (@nitin_gadkari) says that delay in Mumbai-Goa highway shameful, vows action against contractors. “Won't attend its inauguration," says Gadkari.
— Press Trust of India (@PTI_News) September 10, 2026
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Explainer: भारत में फूड सेफ्टी पर क्यों बढ़ी सख्ती? रेस्तरां से पैकेज्ड फूड तक, जानिए क्या बदल रहा है
Food Safety India: भारत में इन दिनों फूड सेफ्टी यानी खाने की सुरक्षा को लेकर बड़े स्तर पर कार्रवाई हो रही है. खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की छापेमारी से लेकर रेस्टोरेंट और खाने-पीने की दुकानों पर लाइसेंस रद्द करने तक, नियामकों ने जांच तेज कर दी है. दूसरी ओर, पैकेज्ड फूड पर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अधिक मात्रा को लेकर चेतावनी लेबल लगाने की कोशिश भी तेज हुई है.
इसका असर देश के 100 अरब डॉलर से ज्यादा के पैकेज्ड फूड बाजार पर भी पड़ सकता है. ऐसे में सवाल है कि अचानक फूड सेफ्टी इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया है और सरकार अब क्या बदलना चाहती है?
भारत में फूड सेफ्टी बड़ी चुनौती क्यों है?
भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और यहां हर दिन करोड़ों लोग रेस्टोरेंट, होटल, कैफे, स्ट्रीट फूड और पैकेज्ड फूड का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में खाने की गुणवत्ता और साफ-सफाई सुनिश्चित करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है.
रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड में साफ-सफाई की कमी की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं. कई बार खाने में मिलावट से जुड़े मामले भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते हैं. इससे लोगों के बीच खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से हर साल एक लाख से ज्यादा खाद्य नमूनों की जांच की गई है. इनमें करीब पांच में से एक नमूना या तो असुरक्षित, तय मानकों से कम गुणवत्ता वाला या सही लेबल के बिना पाया गया. पिछले तीन वर्षों में करीब 8,000 फूड बिजनेस लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं.
यानी समस्या केवल कुछ दुकानों या रेस्टोरेंट तक सीमित नहीं है. इतने बड़े देश में खाने की सुरक्षा की निगरानी करना अपने आप में बड़ी चुनौती है.
खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने क्यों बढ़ाई छापेमारी?
हाल के दिनों में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और राज्यों के खाद्य सुरक्षा विभागों ने जांच और कार्रवाई तेज कर दी है. अधिकारियों की छापेमारी, जब्ती और लाइसेंस रद्द करने की जानकारी सोशल मीडिया पर भी साझा की जा रही है. इससे आम लोगों को यह पता चल रहा है कि खाद्य सुरक्षा नियमों का उल्लंघन करने वाले कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है.
हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक अस्वच्छ परिसर पर कार्रवाई के दौरान करीब 1,300 किलो मिलावटी पनीर जब्त किए जाने की जानकारी सामने आई. पनीर भारत में खास तौर पर शाकाहारी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है, इसलिए इस तरह की कार्रवाई ने लोगों का ध्यान खींचा.
कार्रवाई सिर्फ खाने की दुकानों तक सीमित नहीं है. कुछ शराब कंपनियों पर गलत लेबलिंग को लेकर भी कार्रवाई हुई है. वहीं, एनर्जी ड्रिंक कंपनियों के प्रचार और लेबल से जुड़े मामलों पर भी नियामक नजर रख रहे हैं.
महाराष्ट्र में क्यों चर्चा में हैं तुकाराम मुंढे?
महाराष्ट्र के खाद्य आयुक्त तुकाराम मुंढे इन दिनों खाद्य सुरक्षा से जुड़ी कार्रवाई को लेकर काफी चर्चा में हैं. उनके नेतृत्व में मुंबई और आसपास के इलाकों में कई रेस्टोरेंट, क्लब और बड़े ब्रांड के आउटलेट्स की जांच की गई है.
इनमें Domino's, Pizza Hut और McDonald's जैसे बड़े ब्रांड के आउटलेट भी शामिल रहे हैं. अचानक होने वाली जांच और नियमों का उल्लंघन मिलने पर लाइसेंस निलंबित करने जैसी कार्रवाई को सोशल मीडिया पर लोगों का समर्थन भी मिला है.
हाल ही में एक गोदाम पर की गई कार्रवाई भी काफी चर्चा में रही. आरोप था कि निर्यात के लिए बनाए जा रहे खाद्य उत्पादों के लेबल पर एक्सपायरी डेट और पोषण संबंधी जानकारी में गड़बड़ी की जा रही थी. इस मामले में PepsiCo, Nestle, Coca-Cola और Unilever जैसे बड़े ब्रांडों के उत्पादों के लेबल से जुड़े आरोप सामने आए.
पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल की जरूरत क्यों?
फूड सेफ्टी की बहस सिर्फ साफ-सफाई और मिलावट तक सीमित नहीं है. अब पैकेज्ड फूड में मौजूद चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट भी बड़ी चिंता बन गए हैं.
दुनिया के कई देशों में ऐसे खाद्य उत्पादों के पैकेट पर सामने की तरफ चेतावनी दी जाती है, जिनमें इन पोषक तत्वों की मात्रा ज्यादा होती है.
भारत में भी कई वर्षों से ऐसे फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल की मांग होती रही है. इसका उद्देश्य यह है कि ग्राहक पैकेट खरीदने से पहले आसानी से समझ सके कि उसमें चीनी, नमक या फैट की मात्रा ज्यादा है. लेकिन इस व्यवस्था को लागू करने में लगातार देरी होती रही है.
FSSAI का नया प्रस्ताव क्या है?
अब FSSAI ने पैकेज्ड फूड पर लाल रंग के हेक्सागोन यानी छह कोनों वाले निशान का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत अगर किसी खाद्य उत्पाद में तय सीमा से कम से कम दो पोषक तत्वों की मात्रा ज्यादा होगी, तो पैकेट पर चेतावनी दी जा सकती है. इनमें सैचुरेटेड फैट, चीनी और नमक शामिल हैं.
इस प्रस्ताव का मकसद ग्राहक को खरीदारी के समय ही यह जानकारी देना है कि किसी उत्पाद में इन चीजों की मात्रा ज्यादा है. हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर उद्योग और स्वास्थ्य विशेषज्ञ दोनों पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं.
फूड इंडस्ट्री को क्या आपत्ति है?
पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री का कहना है कि प्रस्ताव में चीनी, नमक और फैट की जो सीमा तय की जा रही है, वह काफी सख्त है. अगर इसे इसी तरह लागू किया गया तो बड़ी संख्या में पैकेज्ड फूड उत्पादों पर चेतावनी लेबल लग सकता है.
उद्योग से जुड़े लोगों का तर्क है कि कई पारंपरिक भारतीय खाद्य उत्पादों में चीनी, नमक और फैट स्वाभाविक रूप से इस्तेमाल होते हैं. पैकेट पर बड़ा चेतावनी निशान लगाने से ग्राहकों की धारणा और बिक्री पर असर पड़ सकता है. यानी कंपनियों को चिंता है कि अगर बहुत ज्यादा उत्पादों पर लाल निशान दिखाई देगा तो इसका व्यावसायिक असर हो सकता है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों को क्यों लगता है प्रस्ताव कमजोर है?
दूसरी तरफ स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कार्यकर्ताओं की चिंता बिल्कुल अलग है. उनका कहना है कि अगर चेतावनी तभी दी जाएगी जब दो या उससे ज्यादा पोषक तत्व तय सीमा से अधिक हों, तो कई ऐसे उत्पाद इससे बाहर रह सकते हैं जिनमें सिर्फ चीनी या सिर्फ नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है. इसी वजह से स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस व्यवस्था को पर्याप्त सख्त नहीं मान रहे हैं.
उनका तर्क है कि अगर किसी उत्पाद में चीनी की मात्रा ही बहुत ज्यादा है तो ग्राहक को इसकी जानकारी मिलनी चाहिए. इसके लिए यह जरूरी नहीं होना चाहिए कि उसमें कोई दूसरा पोषक तत्व भी तय सीमा से ऊपर हो.
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों अहम है?
फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है. खाद्य नियामक ने अदालत में कहा है कि वह शुरुआत से ही ज्यादा सख्त लेबलिंग व्यवस्था अपनाने के लिए तैयार है.
यानी अब यह संभव है कि दो पोषक तत्वों वाली मौजूदा सोच से आगे बढ़कर चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट में से किसी एक की अधिक मात्रा होने पर भी चेतावनी देने की व्यवस्था पर विचार हो. अदालत इस मामले में आगे अपना लिखित आदेश जारी करेगी.
एक नजर में समझें
- फूड सेफ्टी की समस्या: हर साल एक लाख से ज्यादा खाद्य नमूनों की जांच होती है और करीब पांच में से एक नमूना असुरक्षित, घटिया या गलत लेबल वाला पाया गया है.
- सरकार की कार्रवाई: FSSAI और राज्य नियामकों ने रेस्टोरेंट, खाद्य कारोबारियों और निर्माताओं के खिलाफ जांच तेज की है.
- पैकेज्ड फूड: चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अधिक मात्रा को लेकर चेतावनी लेबल की व्यवस्था पर काम हो रहा है.
- उद्योग की चिंता: कंपनियों का कहना है कि सख्त मानकों से बड़ी संख्या में उत्पादों पर चेतावनी लग सकती है.
- स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मांग: उनका कहना है कि केवल दो पोषक तत्वों की सीमा पार होने पर चेतावनी देना पर्याप्त नहीं है.
- आगे की दिशा: सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद पैकेज्ड फूड की लेबलिंग व्यवस्था और स्पष्ट व सख्त हो सकती है.
असली सवाल सिर्फ छापेमारी नहीं, लगातार निगरानी का है
भारत में फूड सेफ्टी को लेकर सख्ती बढ़ना निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन चुनौती सिर्फ छापेमारी तक सीमित नहीं है. असली सवाल यह है कि नियमों को देशभर में लगातार और समान तरीके से लागू कैसे किया जाए.
रेस्टोरेंट में साफ-सफाई, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, मिलावट रोकना, सही लेबलिंग और पैकेज्ड फूड में पोषण संबंधी जानकारी—इन सभी स्तरों पर निगरानी जरूरी है.
अगर कार्रवाई लगातार होती है और नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाता है, तो इससे ग्राहकों का भरोसा बढ़ सकता है. वहीं, साफ और स्पष्ट लेबलिंग से लोग खाने-पीने की चीजों का चुनाव अधिक जानकारी के साथ कर सकेंगे.
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