पूर्व विधायकों को आजीवन पेंशन देने के कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी सरकार से जवाब तलब
Former MLAs Pension: उत्तर प्रदेश में पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को मिलने वाली आजीवन पेंशन और अन्य सुविधाओं का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राज्य में लागू उस कानूनी व्यवस्था को चुनौती दी गई है, जिसके तहत विधानसभा और विधान परिषद के पूर्व सदस्यों को कार्यकाल खत्म होने के बाद भी पेंशन समेत कई लाभ मिलते हैं। मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है।
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच कर रही है। अदालत ने फिलहाल कानून की वैधता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। सरकार के जवाब के बाद अदालत याचिका में उठाए गए कानूनी और संवैधानिक सवालों पर आगे सुनवाई करेगी।
पेंशन व्यवस्था को दी गई चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में उत्तर प्रदेश के उस प्रावधान पर सवाल उठाया गया है, जिसके तहत पूर्व विधायक और MLC पद से हटने के बाद भी पेंशन के हकदार बने रहते हैं। याचिका में इस व्यवस्था के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को चुनौती दी गई है।
मामले का एक प्रमुख पहलू यह है कि जनप्रतिनिधि का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी सरकारी व्यवस्था के तहत उन्हें मिलने वाले लाभ जारी रहते हैं। इसी व्यवस्था की वैधता और औचित्य को लेकर अदालत का ध्यान खींचा गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह नहीं कहा है कि पूर्व विधायकों को मिलने वाली पेंशन की व्यवस्था असंवैधानिक है। अदालत ने केवल राज्य सरकार को नोटिस देकर उसका जवाब मांगा है। इसलिए इस स्तर पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
सरकार को देना होगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार को अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा। सरकार अपने जवाब में संबंधित कानून और उसके प्रावधानों का आधार स्पष्ट करेगी। इसके बाद अदालत यह देख सकती है कि याचिका में उठाए गए सवालों पर किस तरह आगे बढ़ा जाए।
सरकार का जवाब इस मामले में अहम माना जा रहा है, क्योंकि उसी के आधार पर अदालत को कानून की पृष्ठभूमि और राज्य की दलीलों को समझने का मौका मिलेगा। अगली सुनवाई में इसी जवाब के आधार पर मामले में आगे की कार्रवाई तय हो सकती है।
देश में पहले भी उठता रहा है सवाल
पूर्व जनप्रतिनिधियों को पेंशन देने की व्यवस्था पर देश में समय-समय पर बहस होती रही है। समर्थकों का कहना है कि लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले जनप्रतिनिधियों को कार्यकाल समाप्त होने के बाद आर्थिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। वहीं, आलोचकों का तर्क है कि सरकारी खजाने से पूर्व जनप्रतिनिधियों को लगातार मिलने वाली सुविधाओं की समीक्षा होनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश से जुड़ी यह याचिका भी इसी व्यवस्था के कानूनी पहलू को अदालत के सामने लेकर आई है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का जवाब मांगकर मामले को आगे की सुनवाई के लिए खुला रखा है।
अंतिम फैसला अभी बाकी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अभी कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार का जवाब आने के बाद अदालत याचिका में उठाए गए सवालों पर विस्तार से विचार कर सकती है। इसके बाद ही यह साफ होगा कि पूर्व विधायकों और MLC को मिलने वाली आजीवन पेंशन और अन्य सुविधाओं से जुड़े कानून पर अदालत का अंतिम रुख क्या होगा।
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