Darsh Amavasya Vrat Katha 2026: आज है दर्श अमावस्या, जानें व्रत कथा और पितरों से जुड़ी यह खास मान्यता
दर्श अमावस्या को हिंदू धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाली महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से उन्हें तृप्ति मिलती है। कई श्रद्धालु अमावस्या के दिन व्रत भी रखते हैं और भगवान विष्णु, भगवान शिव तथा चंद्र देव की पूजा करते हैं।
इस दिन पवित्र नदी या किसी तीर्थ स्थान पर स्नान करने के बाद पूर्वजों के नाम से जल अर्पित करने की परंपरा है। इसके अलावा गरीबों, जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, काले तिल, दीपक और सामर्थ्य के अनुसार दूसरी उपयोगी वस्तुओं का दान किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा के साथ किए गए इन कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है।
अछोदा और राजा अमावसु की कथा
दर्श अमावस्या से जुड़ी एक पौराणिक कथा अछोदा नाम की कन्या से संबंधित है। कथा के अनुसार प्राचीन समय में पितृलोक में रहने वाली आत्माओं में से एक आत्मा ने गर्भ धारण किया और एक कन्या को जन्म दिया। उसका नाम अछोदा रखा गया।
अछोदा अपनी मां के संरक्षण में बड़ी हुईं। बचपन से ही उन्हें पिता के स्नेह की कमी महसूस होती थी। पिता के प्रेम की चाहत को देखते हुए पितृलोक की आत्माओं ने उन्हें धरती पर राजा अमावसु की पुत्री के रूप में जन्म लेने का मार्ग बताया।
राजा अमावसु ने अछोदा का बेहद स्नेह के साथ पालन-पोषण किया। पिता का प्रेम मिलने के बाद अछोदा का जीवन खुशियों से भर गया। इसके बाद उनके मन में उन पितृ आत्माओं के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा हुआ, जिनकी वजह से उन्हें पिता का स्नेह प्राप्त हुआ था।
अमावस्या की रात किया श्राद्ध
कथा के अनुसार अछोदा ने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध का संकल्प लिया। उन्होंने इसके लिए उस रात को चुना, जब आकाश में चंद्रमा दिखाई नहीं देता था। इसी अंधेरी रात में उन्होंने पितृ आत्माओं की विधि-विधान से पूजा की और उनके लिए श्राद्ध कर्म किया।
कहा जाता है कि अछोदा की भक्ति और समर्पण से पितृ आत्माएं प्रसन्न हुईं। उन्हें ऐसा पुण्य और सुख प्राप्त हुआ, जिसे स्वर्ग में भी प्राप्त करना कठिन माना गया। इसी प्रसंग से अमावस्या तिथि के नाम को राजा अमावसु से जोड़कर देखा जाता है।
पितरों के लिए क्यों खास है अमावस्या?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या के दिन पितरों का स्मरण और उनके निमित्त किए गए धार्मिक कर्म विशेष फलदायी माने जाते हैं। यह भी मान्यता है कि इस दिन पितृ अपने लोक से धरती पर आते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
इसी वजह से अमावस्या के दिन तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। दर्श अमावस्या पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी शांति व तृप्ति की कामना करते हैं।
Ganesh Chaturthi 2026: गणेश जी की मूर्ति खरीदते समय न करें ये गलतियां, सूंड से लेकर रंग तक इन बातों का रखें ध्यान
Ganesh Chaturthi 2026: गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। इस दिन घरों और पंडालों में भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
गणपति स्थापना से पहले बाजारों में गणेश जी की अलग-अलग आकार और स्वरूप वाली मूर्तियां मिलने लगी हैं। ऐसे में अगर आप भी इस गणेश चतुर्थी पर घर में गणपति की नई मूर्ति लाने की तैयारी कर रहे हैं तो मूर्ति खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रख सकते हैं। हालांकि, इनमें से कई बातें क्षेत्रीय और पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
कैसी होनी चाहिए गणेश जी की सूंड?
धार्मिक परंपरा में घर में स्थापना के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड यानी वाममुखी गणेश की मूर्ति को शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसी मूर्ति घर में सुख-समृद्धि और शांति से जुड़ी होती है।
वहीं, दाईं ओर मुड़ी सूंड वाली गणेश प्रतिमा को लेकर अलग धार्मिक विधि और नियम बताए जाते हैं। इसलिए सामान्य घरेलू पूजा के लिए लोग अक्सर वाममुखी गणेश की प्रतिमा को प्राथमिकता देते हैं।
बैठे हुए गणेश की मूर्ति को माना जाता है शुभ
मूर्ति की मुद्रा को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। घर में स्थापना के लिए बैठे हुए गणेश जी की प्रतिमा को स्थिरता और शुभता से जोड़कर देखा जाता है।
खड़े हुए गणेश की मूर्ति को लेकर भी अलग-अलग परंपराएं हैं, इसलिए घर में स्थापना के लिए मूर्ति चुनते समय परिवार की धार्मिक परंपरा के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है।
रंग चुनते समय भी रखें ध्यान
गणेश जी की मूर्ति के रंग को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं हैं। केसरिया, पीले और सफेद रंग की प्रतिमाओं को शुभ माना जाता है। वहीं, घर में गणेश जी की मूर्ति के लिए काले रंग की प्रतिमा से परहेज करने की परंपरा कुछ जगहों पर देखने को मिलती है। यह धार्मिक विश्वास है, इसका कोई वैज्ञानिक नियम नहीं है।
मूर्ति के साथ मूषक जरूर देखें
भगवान गणेश के वाहन मूषक को भी उनकी प्रतिमा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसलिए गणेश जी की मूर्ति खरीदते समय यह देखना चाहिए कि उनके साथ मूषक की आकृति भी बनी हो।
कुछ परंपराओं में गणेश जी के दांतों के स्वरूप को लेकर भी विशेष मान्यता है। ऐसी प्रतिमाओं में दाहिना दांत पूरा और बायां दांत थोड़ा टूटा हुआ दिखाया जाता है। गणेश जी की चार भुजाओं वाला स्वरूप भी पारंपरिक रूप से प्रचलित है।
किस चीज से बनी गणेश मूर्ति खरीदें?
घर में गणपति स्थापना के लिए मिट्टी, पीतल, तांबा, चांदी या सफेद संगमरमर जैसी सामग्री से बनी मूर्तियां खरीदी जाती हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि मूर्ति खरीदते समय उसे अच्छी तरह देख लें। कहीं से भी प्रतिमा टूटी या खंडित नहीं होनी चाहिए। घर के पूजा स्थल के आकार को देखते हुए उसी के अनुरूप मूर्ति का आकार चुनना भी बेहतर रहता है।
गणेश जी की मूर्ति किस दिशा में रखें?
धार्मिक मान्यता के अनुसार घर में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा को शुभ माना जाता है। मूर्ति को रखने की जगह साफ-सुथरी होनी चाहिए और वहां नियमित रूप से पूजा की जा सके। स्थापना के समय परिवार की परंपरा और निर्धारित शुभ मुहूर्त का ध्यान रखा जा सकता है।
गणेश पूजा के दौरान इन बातों का रखें ध्यान
गणपति स्थापना के बाद पूजा के दौरान भी कुछ पारंपरिक नियम बताए गए हैं।
- सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें।
- पूजा की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।
- गणेश जी की मूर्ति को शुभ मुहूर्त में स्थापित करें।
- पूजा स्थल पर तांबे के पात्र में जल, सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते रखने की परंपरा है।
- गणेश जी को फल, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।
- भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं।
- पूजा के बाद गणेश जी की आरती करें।
मूर्ति खरीदते समय सबसे जरूरी बात
गणेश चतुर्थी पर घर में गणपति की स्थापना श्रद्धा और परंपरा से जुड़ा विषय है। इसलिए मूर्ति खरीदते समय केवल आकार या सजावट देखने के बजाय मूर्ति की स्थिति, पूजा स्थल के अनुरूप आकार और अपनी पारिवारिक परंपरा का भी ध्यान रखना चाहिए।
धार्मिक मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती हैं, इसलिए किसी एक परंपरा को अनिवार्य नियम मानने के बजाय स्थानीय रीति-रिवाज के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।
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