New Delhi में शनिवार से BRICS Summit, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर होगा मंथन
नयी दिल्ली, नौ सितंबर भारत की मेजबानी में शनिवार से शुरू हो रहे दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में खाद्य, ऊर्जा, स्वास्थ्य, आपदा न्यूनीकरण और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं में सामूहिक लचीलापन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिससे यह समूह खंडित भू-राजनीतिक माहौल में आगे बढ़ने के लिए एक प्रभावी आधार बन सके। नयी दिल्ली में यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट (खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी) और ट्रंप प्रशासन की व्यापार एवं शुल्क नीतियों के बुरे असर का सामना कर रही है। इस अहम सम्मेलन में शामिल होने वाले प्रमुख नेताओं में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो शामिल हैं।
शिखर सम्मेलन में अब सिर्फ़ तीन दिन बचे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि समूह के सदस्य देश किसी संयुक्त बयान पर आम सहमति बना पाए हैं या नहीं, क्योंकि पश्चिम एशिया संकट को लेकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच मतभेद अब भी बने हुए हैं। यह समूह आम सहमति के आधार पर काम करता है। मूल रूप से ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका से मिलकर बने ब्रिक्स का 2024 में विस्तार हुआ और इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात तथा सऊदी अरब शामिल हुए, जबकि इंडोनेशिया 2025 में इसमें शामिल हुआ।
बेलारूस, बॉलीविया, कजाकिस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम पिछले साल ब्रिक्स के साझेदार देश बने थे। ब्रिक्स एक प्रभावशाली समूह के तौर पर उभरा है क्योंकि यह दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाता है, जो वैश्विक आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा हैं। इस समूह की भारत की अध्यक्षता चार स्तंभों- लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता पर केंद्रित है।
अधिकारियों ने बताया कि लचीलापन स्तंभ के तहत भारत स्वास्थ्य, कृषि, खाद्य, ऊर्जा, आपदा जोखिम कम करने और आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्रों में सामूहिक सहयोग को मज़बूत करने पर ध्यान केंद्रित करता रहा है। उन्होंने कहा कि व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना भी शिखर सम्मेलन के एजेंडे में प्रमुखता से शामिल होगा। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ की थीम से निर्देशित है।
यह थीम ‘मानवता सर्वोपरि’ की भावना में निहित जन-केंद्रित रुख के भारत के दृष्टिकोण को दर्शाती है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, इन क्षेत्रों के अलावा, नेतागण साझा प्राथमिकताओं पर ब्रिक्स के भीतर सहयोग मज़बूत करने के लिए विचार-विमर्श करेंगे और पारस्परिक महत्व के वैश्विक तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर अपना नज़रिया साझा करेंगे। इस साल भारत की अध्यक्षता में, देश भर के 25 से ज़्यादा शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।
इनका उद्देश्य ब्रिक्स की रणनीतिक साझेदारी को तीन मुख्य आधारों-राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय, तथा सांस्कृतिक एवं लोगों के बीच आपसी संपर्क- पर और मज़बूत करना है। भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और इससे पहले 2012, 2016 तथा 2021 में इसकी अध्यक्षता कर चुका है। भारत ने एक जनवरी 2026 को चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह शिखर सम्मेलन शनिवार को अपराह्न 2:35 बजे ब्रिक्स सदस्य देशों के लिए ‘‘समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत करना’’ विषय पर बंद कमरे के सत्र के साथ शुरू होगा। इस सत्र के बाद, नेता ‘भारत इनोवेट्स एग्ज़िबिशन’ का दौरा करेंगे, जो शाम 4:25 बजे शुरू होगी। शाम 5:05 बजे, सभी नेता शिखर सम्मेलन की जगह -- भारत मंडपम -- के लॉन में ‘फ़ैमिली फ़ोटो’ के लिए एकत्र होंगे और उसके बाद मिलकर पौधारोपण कार्यक्रम में शामिल होंगे।
पहले दिन के कार्यक्रमों का समापन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शाम 7:30 बजे आयोजित एक शानदार रात्रिभोज के साथ होगा। रविवार को ब्रिक्स सदस्य देशों, सहयोगी देशों और ‘आउटरीच’ के लिए आमंत्रित नेताओं का आगमन सुबह 9:55 बजे से शुरू होगा, जिसके बाद सुबह 10:35 बजे आधिकारिक सामूहिक तस्वीर ली जाएगी। विदेश मंत्रालय की ओर से जारी कार्यक्रम के मुताबिक, ‘‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और निरंतरता: समावेशी वैश्विक प्रगति के लिए भविष्य को आकार देना’’ विषयक खुला सत्र सुबह 10.50 बजे शुरू होगा।
नयी दिल्ली घोषणापत्र जारी किए जाने के साथ इस शिखर सम्मेलन का समापन होगा।
DU के प्रोफेसर हरीश अरोड़ा बोले, भारतीय भाषा परिवार भाषाई औपनिवेशिकता से मुक्ति का आधार है
नई दिल्ली। ‘अंग्रेजों ने भारत की एकता को विखंडित करने के लिए वर्नाक्युलर भाषाओं का विचार रख जिसने भरतिए भाषाओं को हीन और निचले स्तर की भाषाओं के रूप में स्थापित किया। दुर्भाग्यवश हम भारतीयों ने इसे स्वीकार कर लिया। एकीकृत राष्ट्र की संकल्पना के लिए आवश्यक है कि हम भारतीय भाषाओं को विभाजित परिवारों की भाषा से मुक्ति देते हुए भारतीय भाषा परिवार की संकल्पना को चरितार्थ करें। यह परिवार ही वर्षों से चली या रही औपनिवेशिकता से मुक्ति का आधार है।’
ये विचार दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज (सांध्य) में हिन्दी के प्रोफेसर डॉ. हरीश अरोड़ा ने कर्नाटक राज्य विश्वविद्यालय कॉलेज हिन्दी प्राध्यापक संघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सप्ताह हिन्दी पर्व-2026 के अवसर पर आभासी पटल के माध्यम से रखे। इस कार्यक्रम का पहला आयोजन विशम कॉटन विमेंस क्रिश्चियन कॉलेज, बेंगलुरू की ओर से आयोजित किया गया।
इस अवसर पर प्रो. अरोड़ा ने ‘भारतीय भाषा परिवार की संकल्पना और एकीकृत राष्ट्र’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय भाषाएँ एकीकृत सांस्कृतिक चिंतन-प्रक्रिया की पालना और संवाहक रही हैं। भारतीय भाषाएँ अपने अस्तित्व की पूरी यात्रा में परस्पर सहअस्तित्व में रही हैं और सामंजस्यपूर्ण रूप से साथ-साथ विकसित हुई हैं। उनका साहित्य शब्दावली में एक-दूसरे का पूरक है और विषयवस्तु तथा प्रेरणा के स्रोत में एक-दूसरे को समृद्ध करता है। उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ अन्य देशों में भाषा को केवल संप्रेषण का माध्यम माना जाता है वहीं भारत में उसे दैवीय माना गया है। सभी भारतीय भाषाओं को वाक् के रूप में पूज्य माना जाता है और वाग्देवी या सरस्वती के रूप में आराधित किया जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत में ‘विविधता में एकता’ की संकल्पना को माना जाता रहा है जबकि भारत में एकता विविधता से कहीं अधिक प्रबल आधार है। उनका मानना था कि विविधता सौंदर्य है, एकता शक्ति है। विविधता का सौंदर्य केवल एकता की शक्ति से ही टिक सकता है। उन्होंने अपने विचार को आरंभ करते हुए बताया कि भारत की गौरवशाली परंपरा से भारतीय समाज को हमेशा से दूर रखा गया है इसी कारण से भारतीय समाज की चेतना पराधीन होती गई। अंग्रेजों ने लोगों को बाँटने, देश को विभाजित करने, समाज को विभाजित करने और एक समुदाय को दूसरे के विरुद्ध भाषाई वैमनस्य के लिए उकसाने का कार्य किया गया। उन्होंने भारत की भाषाओं को भारोपीय, द्रविड, चीनी-तिब्बती और ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवारों में विभाजित कर दिया। इसीलिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस औपनिवेशिकता से मुक्ति के लिए भारतबोध के विचार को स्वीकार किया।
कार्यक्रम के आरम्भ में स्वागत वक्तव्य देते हुए डॉ. विनय कुमार ने कहा यादव ने कहा कि आज का विषय अत्यंत ही प्रासंगिक और नवीन है। इस विचार से निश्चित रूप से भारतीय भाषाओं में एकता के साथ भारत भी एकीकृत राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। कार्यक्रम में कर्नाटक राज्य विश्वविद्यालय कॉलेज हिन्दी प्राध्यापक संघ के संस्थापक डॉ. एस. मंजुनाथ ने संघ की कार्य प्रणाली और विभिन्न योजनाओं से परिचित कराया। इस अवसर पर कॉलेज की प्राचार्य डॉ. सुनीला कुमारी सहित देश भर से अनेक शिक्षाविद, शोधार्थी और विद्यार्थी कार्यक्रम में जुड़े।
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