Explainer: सुधार की मांग से लेकर दुनिया को समाधान देने तक... BRICS में कैसा रहा भारत का सफर?
BRICS Journey of India: 2021 के बाद भारत चौथी बार 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करने जा रहा है. भारत मेजबानी के लिए तैयार है. मीडिल ईस्ट तनाव, रूस-यूक्रेन जैसे तमाम वैश्विक मुद्दों के बीच इन दिनों पूरी दुनिया की नजर भारत पर है. नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है. भारत बैठक में वैश्विक मुद्दों पर दुनिया को समाधान देने की पहल करेगा. हालांकि ये सफर शुरूआत से ऐसा नहीं था. पहले भारत ब्रिक्स से केवल सुधार की मांग करने तक सीमित रहता था. आइए जानते हैं ब्रिक्स में भारत की अभी तक की यात्रा के बारे में...
भारत इस सप्ताह के अंत में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है. ऐसे समय में वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है. कभी भारत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों को ज्यादा जगह देने की मांग करता था, लेकिन अब वह अपने बनाए सफल मॉडल और समाधानों के जरिए वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है.
अभी तक भारत 3 बार (2012, 2016 और 2021) ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता कर चुका है. अब 2026 में भारत एक बार फिर ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है. इस बार उसका विषय "लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण" है. इसके जरिए भारत उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
2012 में भारत ने उठाई थी खास मांग
ANI की रिपोर्ट के अनुसार, 2012 में जब दुनिया यूरोजोन कर्ज (European Sovereign Debt Crisis) संकट से जूझ रही थी, तब भारत ने ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की मांग उठाई थी.
2016 में ब्रेक्सिट के बाद पैदा हुई अनिश्चितता के बीच भी भारत ने इसी मुद्दे को आगे बढ़ाया. समय के साथ भारत की ये मांगें कई बड़ी संस्थाओं और व्यवस्थाओं में बदलीं. इनमें न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और कंटीजेंट रिजर्व एग्रीमेंट (CRA) प्रमुख हैं. इसके अलावा, भारत ने रेनमिनबी में अपना पहला ग्रीन बॉन्ड जारी करके भी एक नई पहल की.
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कोविड में दुनिया के मसीहा बना भारत
साल 2021 में दुनिया एक अलग तरह के संकट से जूझ रही थी. कोरोना महामारी ने वैश्विक व्यापार और स्वास्थ्य व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया था. इस दौरान भारत ने टीका कूटनीति के जरिए कई विकासशील देशों के साथ सहयोग किया. भारत ने वैक्सीन उपलब्ध कराने के साथ डिजिटल स्वास्थ्य से जुड़े डेटाबेस और तकनीकी अनुभव भी साझा किए. महामारी के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन प्रभावित हुईं. ऐसे समय में टीकों की उपलब्धता भी एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दा बन गई थी. भारत ने खुद को केवल मदद पाने वाले देश के तौर पर नहीं, बल्कि दूसरे देशों को समाधान देने वाले देश के रूप में पेश करने की कोशिश की.
इस बात पर था भारत का जोर
ब्रिक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (ब्रिक्स सीसीआई) के अध्यक्ष समीम शास्त्री ने एएनआई से बातचीत में कहा कि ब्रिक्स में भारत का सफर उसके घरेलू आर्थिक विकास में आए बदलाव को भी दिखाता है. उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में भारत का जोर इस बात पर था कि वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ज्यादा प्रभाव और प्रतिनिधित्व मिले. लेकिन जैसे-जैसे ब्रिक्स आगे बढ़ा, सदस्य देशों ने अपने खुद के संस्थान और व्यवस्थाएं बनाने पर ध्यान देना शुरू किया. न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना इसी दिशा में एक बड़ा कदम था.
अब भारत दुनिया को दे रहा समाधान
ब्रिक्स सीसीआई के अध्यक्ष समीम शास्त्री के मुताबिक, आज भारत के पास डिजिटल भुगतान, वित्तीय समावेशन, स्टार्टअप, नवीकरणीय ऊर्जा और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में अपना अनुभव है. इसलिए भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था में बदलाव की मांग नहीं कर रहा, बल्कि यह भी बता रहा है कि उसने खुद कौन से समाधान अपनाए और वे कैसे काम कर रहे हैं.
उन्होंने भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का उदाहरण दिया. शास्त्री ने कहा कि UPI जैसे प्लेटफॉर्म ने दिखाया है कि तकनीक के जरिए बड़ी संख्या में लोगों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है. उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव सिर्फ डिजिटल भुगतान तक सीमित नहीं है. वित्तीय समावेशन, एमएसएमई, नवीकरणीय ऊर्जा और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी भारत ने बड़ी आबादी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समाधान विकसित किए हैं.
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'हर देश में एक मॉडल संभव नहीं'
शास्त्री ने कहा कि हर देश के लिए एक जैसा मॉडल लागू नहीं किया जा सकता. उनके मुताबिक, तकनीक और जानकारी साझा करना ज्यादा जरूरी है, ताकि हर देश अपनी जरूरत के हिसाब से उसे अपना सके. उन्होंने कहा कि भारत का डिजिटल मॉडल दूसरे देशों के लिए यह दिखाता है कि डिजिटल सेवाओं को केवल निजी और बंद प्लेटफॉर्म तक सीमित रखने के बजाय खुले और एक-दूसरे से जुड़ने वाले सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं.
ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा
शास्त्री ने ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिशों पर भी बात की. उन्होंने कहा कि भुगतान व्यवस्था को आपस में जोड़ना और उसे आसान बनाना ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने में मदद कर सकता है. हालांकि, उन्होंने कहा कि इस दिशा में आगे बढ़ते समय मुद्रा की आसानी से अदला-बदली, लेनदेन की लागत, नियमों की स्पष्टता और वित्तीय स्थिरता जैसे मुद्दों का ध्यान रखना जरूरी होगा. उनका कहना था कि मुद्रा में विविधता धीरे-धीरे बढ़नी चाहिए और इसका उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ज्यादा विकल्प और लचीलापन देना होना चाहिए.
इन मुद्दों पर भारत दे रहा समाधान
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स में भारत की भूमिका अब पहले से काफी बदल गई है. शुरुआत में भारत वैश्विक संस्थाओं में अधिक हिस्सेदारी और सुधार की मांग कर रहा था. अब भारत डिजिटल पेमेंट, वैक्सीन, वित्तीय समावेशन, नवीकरणीय ऊर्जा और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में अपने अनुभव और समाधान दूसरे देशों के साथ साझा कर रहा है.
न्यू डेवलपमेंट बैंक से लेकर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और वैक्सीन कूटनीति तक, भारत का ब्रिक्स सफर अब सिर्फ वैश्विक व्यवस्था में अपनी जगह बनाने की कोशिश नहीं है. यह अपने अनुभवों के आधार पर दुनिया के सामने व्यावहारिक समाधान रखने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है.
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