एक ताकतवर देश जहां भगवान हनुमान का अपमान किया गया वो देश अब बर्बादी की कगार पर आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस देश के नेताओं को पीटने वाली एआई वीडियोस तक डाल रहे हैं। जिस देश का नागरिक दुनिया का हर व्यक्ति बनना चाहता था। उसी देश को छोड़कर अब लोग भाग रहे हैं। सोचिए एक तरफ हर जगह हनुमान अंश की धूम है। उसी वक्त इस देश के एक पत्रकार ने भारत को चिढ़ाने के लिए हनुमान जी का अपमान कर दिया। इस पत्रकार जैसे लाखों लोग इस देश में बसे हैं। यह होश उड़ा देने वाली कहानी कनाडा से आई है।
कनाडा के हजारों लोग ओंटारियो शहर में लगी 55 फीट ऊंची भगवान हनुमान की मूर्ति से नफरत करते हैं। इन्हीं में से एक कनाडा का यह पत्रकार है। इस नफरती पत्रकार ने 55 फीट ऊंची भगवान हनुमान की मूर्ति के आगे जो बयान दिया उसे सुनकर भारत के लोगों का खून खौल जाएगा। इसने कहा कि मैं कनाडा में ओंटारियो के ब्रमटन में सबसे बड़ी हिंदू मूर्ति के सामने खड़ा हूं जो 55 फीट ऊंची है। यह मूर्ति उस सभ्यता को दिखाती है जो खंडर हो चुकी है। यह मूर्ति उन लोगों की कहानी है जो खो चुके हैं। यह मूर्ति ऐसे देश को दिखाती है जहां के लोग अपनी किस्मत को लेकर बेपरवाह हैं। यह लोग खुद से ही नफरत करते हैं। यानी इस पत्रकार ने भारतीय लोगों का भी अपमान किया है। इसने कहा कि कनाडा को डायवर्सिटी ले डूब रही है।
हैरानी की बात देखिए कि कनाडा के कई नेता और पत्रकार हमेशा से भारत को यह नसीहत देते आए हैं कि भारत को अपने देश में डायवर्सिटी यानी विविधता को बचाना चाहिए। लेकिन यह मक्कार लोग अपनी ही बात से पलट गए। कनाडा के इन लोगों ने कहा है कि हमारे देश में हनुमान मूर्ति के लिए जगह नहीं है। हम एक ईसाई देश हैं। भारत के लोग हमारे देश पर कब्जा करना चाहते हैं। अब इन लोगों ने ऐसी घटिया बात कही है तो इनको जवाब मिलना चाहिए। बता दें कि कनाडा के मूल निवासी गोरे नहीं थे। यह जो पत्रकार है, यह भी कनाडा का मूल निवासी नहीं है। गोरे लोग यूरोप से आए और कनाडा के मूल निवासियों को भगाकर कनाडा पर कब्जा कर लिया और आज यह खुद को कनाडा का नागरिक बोलते हैं। कनाडा पर भारतीय लोग तो कब्जा नहीं करेंगे लेकिन इन लोगों ने कनाडा पर कब्जा किया था। दूसरी बात हनुमान जी की मूर्ति की। इन लोगों को कनाडा में हनुमान जी की एक मूर्ति से दिक्कत है। मगर कनाडा समेत कई पश्चिमी देश भारत में चर्च को फंड देते हैं। भारत में हजारों चर्च बनाने के लिए पैसा देते हैं। मिशनरियों के जरिए हिंदुओं का धर्मांतरण करते हैं।
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साउथ कोरिया की राजधानी सोल में दुनिया के कई देशों के रक्षाधिकारियों का बड़ा मंच लगा था। चर्चा हो रही थी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और समुद्री चुनौतियों की। फिलीपींस के डिफेंस सेक्रेटरी गिलबर्टो टोडेरो भी मंच पर मौजूद थे और अपने देश के सामने मौजूद समुद्री खतरों की बात कर रहे थे। तभी ऑडियंस की तरफ से चीन की स्थिति वाला एक नोट उन्हें दिया गया। नोट में लिखा था कि 2016 में साउथ चाइना सी को लेकर आया अंतरराष्ट्रीय फैसला गैरकानूनी है। चीन उसे नहीं मानता और उसकी कोई बाधिकारी ताकत नहीं है। गिलबर्टों ने पर्ची पढ़ी और फिर चीन को उसी के शब्दों में ऐसा जवाब दिया कि यह पूरा मामला सुर्खियों में आ गया। मतलब इस तरह चीन को कभी बेइज्जत होते नहीं देखा गया। फिलीपींस के डिफेंस सेक्रेटरी ने चीन की तरफ से आए एक छोटे से कागज को ही चीन के खिलाफ हथियार बना दिया। लेकिन जो कुछ कहा गया उसमें कई ऐसी बातें हैं जिन्हें समझना बेहद जरूरी है। इसके पीछे करीब एक दशक पुराना एक बड़ा समुद्री विवाद है। एक ऐसा विवाद जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, समुद्र में अधिकार, चीन की दावेदारी और फिलीपींस की सुरक्षा सब कुछ एक साथ जुड़ा हुआ है।
दरअसल गिलबर्टो सोल डिफेंस डायलॉग में अंतरराष्ट्रीय कानून और साउथ चाइना सी में अपने देश की सुरक्षा पर बात कर रहे थे। तभी उन्हें चीन की तरफ से एक नोट दिया गया। गिलबर्टो ने उस नोट को सबके सामने पढ़ना शुरू कर दिया। चीन ने सोचा होगा कि वो इस नोट के जरिए उनको बता पाएगा कि उन्हें क्या बोलना है, क्या नहीं। लेकिन यहां पर चीन की चाल उल्टी ही पड़ गई। चीन ने जो नोट भेजा वो नोट गिलबर्टो ने उसी मंच से पढ़ना शुरू कर दिया और चीन को बेइज्जत करना शुरू कर दिया। दरअसल चीन की तरफ से कहा गया था कि साउथ चाइना सी ऑर्बिट्रेशन के मामले में चीन की स्थिति साफ है। चीन इस ऑर्बिट्रेशन को अंतरराष्ट्रीय कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ मानता है और 2016 में आया अवार्ड गैर कानानूनी शून्य और बेअसर है। अब यहां गिलबर्टो ने चीन को पहली बार घेरा।
पहले तो उन्होंने चीन का नोट पढ़ा। फिर कहा कि अगर आप यह कह रहे हैं कि ऑर्बिट्रेशन अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करता है, तो फिर आपने जिस उन्ज़ पर दस्तखत किए, तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उन्को ही अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करता है। यानी चीन की दलील को उसी के सामने पलट दिया गया। इसके बाद नोट में कहा गया कि 2016 के फैसले की कोई बाधिकारी ताकत नहीं है। गिलबर्टो ने जवाब दिया क्योंकि आप यूएन क्लॉज़ के अधीन होना नहीं चाहते और क्योंकि नोट में चीन की तरफ से इस फैसले को स्वीकार नहीं किया गया ना उसे मान्यता दी गई।
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