NEET Protest: जंतर-मंतर पर महिलाओं से बदसलूकी मामले में Supreme Court पहुंची याचिका
नयी दिल्ली, आठ सितंबर नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के मामले में एक याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय से अपील की है कि उन सुरक्षाकर्मियों की जवाबदेही तय की जाए, जिन पर आरोप है कि उन्होंने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रही महिलाओं को घसीटा और उनके खिलाफ बल प्रयोग किया। दिल्ली में 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) के नेतृत्व में संसद तक निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़पें हुईं; सुरक्षाकर्मियों ने संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठियों और आंसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया। जंतर-मंतर पर 20 जून को शुरू हुआ आंदोलन 25 जुलाई को तब खत्म कर दिया गया, जब तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और सरकार ने कॉजपा की अन्य मांगें मान लीं।
न्यायालय ने दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए, हाल ही में पांच सदस्यीय उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया है। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी इसके अध्यक्ष होंगे। न्यायालय ने हाल ही में, 20 जुलाई से 25 जुलाई के बीच देश भर में कॉजपा के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकी को रद्द कर दिया, जिसके बाद इस समूह ने राष्ट्रीय राजधानी में पांच सितंबर को आयोजित अपने मार्च को रद्द करने का फैसला किया।
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में “चलो संसद” प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग का जोरदार बचाव किया। पुलिस ने न्यायालय को बताया कि प्रदर्शन को “असामाजिक तत्वों” और “हिस्ट्रीशीटर” ने अपने कब्जे में ले लिया था, जिसके कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई और 240 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए। याचिकाकर्ताओं में से एक शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने जवाबी-हलफनामा दाखिल किया और दिल्ली पुलिस के कई दावों को चुनौती दी।
हलफनामे में कहा गया, “पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों को घसीटने, शारीरिक रूप से रोकने और उनके खिलाफ बल प्रयोग करने की विशिष्ट एवं निर्विवादित घटनाएं सामने आई हैं। इनमें गीतांजलि आंगमो को बाल पकड़कर घसीटना और एक महिला प्रदर्शनकारी को अतिरिक्त डीसीपी द्वारा थप्पड़ मारना भी शामिल है। ऐसे बल प्रयोग का आदेश देने या इसकी अनुमति देने वाले सबसे वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
West Bank की इजराइली बस्तियों पर Britain ने लगाया आयात प्रतिबंध
(अदिति खन्ना) लंदन, आठ सितंबर बिटेन ने मंगलवार को वेस्ट बैंक में इजराइली बस्तियों पर प्रतिबंधों की घोषणा की और कब्जे वाले फलस्तीनी इलाकों से वस्तुओं के आयात पर पाबंदी लगा दी। वेस्ट बैंक की बस्तियों में ‘‘फलस्तीनियों के जातीय सफाये’’ की निंदा करते हुए ब्रिटिश संसद के निचले सदन ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में बयान देते समय ब्रिटेन के विदेश मंत्री एड मिलिबैंड के साथ प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम भी मौजूद थे। अपनी ‘‘गर्व से भरी ब्रिटिश यहूदी’’ विरासत पर जोर देते हुए मिलिबैंड ने ‘‘उचित छूट के साथ प्रतिबंधों की एक नयी और व्यापक व्यवस्था’’ की घोषणा की।
मिलिबैंड ने सांसदों से कहा, ‘‘सरकार का मानना है कि कब्जे वाले इलाकों के साथ हमारे आर्थिक रिश्तों में इस कब्जे के गैर-कानूनी होने की बात झलकनी चाहिए।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए मैं आज यह घोषणा कर रहा हूं कि हम कब्जे वाले इलाकों में गैर-कानूनी बस्तियों से आने वाली वस्तुओं पर आयात प्रतिबंध लगाएंगे।’’ मिलिबैंड ने कहा कि बस्तियों के विस्तार से जुड़े निर्माण, बुनियादी ढांचे, वित्तपोषण या रियल एस्टेट सेवाएं देने वाली विशिष्ट कंपनियों और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा, ‘‘जो लोग गैर-कानूनी बस्तियों के लिए पैसा देते हैं या उन्हें बढ़ावा देते हैं, उनसे मैं यह कहना चाहता हूं कि उन्हें ब्रिटेन के कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। ये बस्तियां गैर-कानूनी हैं।
हमारे देश में इन्हें बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।’’ उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की ‘जातीय सफाये’ की परिका भी जिक्र किया, जिसके अनुसार यह एक खास जातीय या धार्मिक समूह द्वारा बनाई गई जान-बूझकर अपनाई जाने वाली नीति है। इसका मकसद हिंसा और आतंक फैलाकर किसी दूसरे जातीय या धार्मिक समूह की आबादी को कुछ खास इलाकों से हटाना होता है। कैबिनेट मंत्री ने कहा, ‘‘ब्रिटेन सरकार इस बात से सहमत है कि वेस्ट बैंक के इलाकों में फलस्तीनियों का जातीय सफाया हो रहा है – जिसे वहां बसे आतंकी अंजाम दे रहे हैं।
और अक्सर इजराइली सरकार ने इस पर आंखें मूंद ली हैं; बल्कि इससे भी बुरा यह है कि सरकार की ओर से फलस्तीनियों को जबरदस्ती विस्थापित करने के समर्थन में बयान दिए गया हैं और कदम उठाए हैं।’’ उनकी यह घोषणा इजराइल-फलस्तीन विवाद पर ब्रिटेन के रुख के समर्थन में 11 अन्य देशों के संयुक्त बयान के साथ आई। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने कहा कि वेस्ट बैंक में इजराइल सरकार की कार्रवाई ‘‘द्वि-राष्ट्र समाधान की संभावना को कम कर रही है।’’ संयुक्त बयान में कहा गया है, ‘‘आज, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, फ़्रांस, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, स्पेन, स्वीडन और ब्रिटेन ने पुष्टि की है कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध बस्तियों के साथ वस्तुओं के व्यापार पर राष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने और/या यूरोपीय प्रतिबंधों का समर्थन करने का इरादा रखते हैं, या वे अपनी राष्ट्रीय प्रक्रियाओं के अनुसार इन और अन्य उपायों पर विचार कर रहे हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हम सब मिलकर दृढ़ इरादे के साथ कहते हैं कि द्वि-राष्ट्र समाधान की रक्षा की जानी चाहिए। हम एक साल पहले अपनाए गए न्यूयॉर्क घोषणापत्र के सिद्धांतों के आधार पर, न्यायपूर्ण और स्थायी शांति के लिए कदम उठाएंगे।
हम फलस्तीनी जमीन पर कब्ज़ा करने और फलस्तीनी आबादी को जबरदस्ती विस्थापित करने जैसे कदमों का कड़ा विरोध करते हैं।’’ इस बीच, ब्रिटेन के कई यहूदी संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ज्यूइश लीडरशिप काउंसिल ने ब्रिटेन सरकार पर आरोप लगाया कि इजराइली बस्तियों से वस्तुओं के आयात पर रोक लगाकर उसने ‘‘ब्रिटिश यहूदियों को और ज़्यादा निशाने पर’’ ला दिया है। ब्रिटेन में फलस्तीन के राजदूत हुसाम ज़ोमलोट ने इस कदम का स्वागत करते हुए इसे ‘‘ब्रिटेन-फलस्तीन संबंधों में एक अहम मोड़’’ बताया।
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