डीओटी की बड़ी सफलता: 15 महीनों में 5,000 करोड़ रुपए से अधिक की संभावित साइबर ठगी रोकी
नई दिल्ली, 8 सितंबर (आईएएनएस)। दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने मंगलवार को बताया कि उसके फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर (एफआरआई) ने शुरू होने के सिर्फ 15 महीनों के भीतर देश में 5,000 करोड़ रुपए से अधिक की संभावित साइबर धोखाधड़ी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विभाग के अनुसार, 22 मई 2025 को शुरू किए गए इस तंत्र के जरिए अगस्त 2026 तक कुल 5,043.73 करोड़ रुपए की संदिग्ध वित्तीय हानि को रोका गया है। तुलना करें तो अगस्त 2025 तक यह आंकड़ा केवल 139.16 करोड़ रुपए था, जो इस प्रणाली की बढ़ती प्रभावशीलता को दर्शाता है।
संचार मंत्रालय ने कहा कि केवल अप्रैल 2026 से अगस्त 2026 के बीच चार महीनों में ही 2,000 करोड़ रुपए से अधिक की संभावित साइबर ठगी को रोका गया। विभाग के मुताबिक, यह वह धनराशि है जो नागरिकों के खातों से बाहर जाने से पहले ही बचा ली गई, इसलिए बाद में उसे खोजने, खातों को फ्रीज करने या वापस हासिल करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
डीओटी द्वारा विकसित फाइनेंशियल फ्रॉड रिस्क इंडिकेटर एक ऐसा जोखिम मूल्यांकन ढांचा है जो वित्तीय संस्थानों को वास्तविक समय में यह पहचानने में मदद करता है कि कोई मोबाइल नंबर साइबर अपराध या वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़ा हो सकता है या नहीं। यह प्रणाली डीओटी के डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (डीआईपी) के माध्यम से संचालित होती है, जो मोबाइल नंबरों को वित्तीय धोखाधड़ी में संभावित संलिप्तता के आधार पर मध्यम, उच्च और अत्यधिक उच्च जोखिम वाली श्रेणियों में वर्गीकृत करती है।
इस जोखिम मूल्यांकन के लिए विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं का उपयोग किया जाता है। इनमें संचार साथी प्लेटफॉर्म पर नागरिकों द्वारा दी गई शिकायतें, भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल से प्राप्त जानकारी, दूरसंचार कंपनियों, बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा साझा किए गए आंकड़े शामिल हैं। इन जानकारियों के विश्लेषण के आधार पर जोखिम संकेत तैयार किए जाते हैं।
डीआईपी से प्राप्त खुफिया जानकारी को सुरक्षित तरीके से बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं, बीमा कंपनियों, प्रतिभूति बाजार से जुड़े संस्थानों तथा पेंशन क्षेत्र की इकाइयों के साथ साझा किया जाता है। ये संस्थान इन जोखिम संकेतों को अपने ग्राहक सत्यापन, लेनदेन निगरानी और धोखाधड़ी पहचान तंत्र में शामिल करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप किसी भी संदिग्ध लेनदेन की पहचान राशि स्थानांतरित होने से पहले ही की जा सकती है।
दूरसंचार विभाग का कहना है कि यह व्यवस्था पारंपरिक प्रतिक्रिया-आधारित प्रणाली से अलग है। पहले धोखाधड़ी हो जाने के बाद धन की खोज, खातों को फ्रीज करने और राशि वापस लाने की प्रक्रिया शुरू होती थी। लेकिन अब संभावित जोखिम की पहचान भुगतान शुरू होने के क्षण में ही हो जाती है।
विभाग के अनुसार, साइबर अपराधों में शामिल लोग अक्सर चोरी की गई राशि को बहुत कम समय में कई फर्जी खातों या तथाकथित म्यूल अकाउंट्स में स्थानांतरित कर देते हैं, जिससे धन वापस हासिल करना बेहद कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, एफआरआई-आधारित जांच एक सेकंड से भी कम समय में पूरी की जा सकती है और संदिग्ध लेनदेन को शुरुआत में ही रोक सकती है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
कौन है रोहन पारेख? PMO का फर्जी कार्ड, बॉडीगार्ड के साथ वहां तक पहुंचा जहां कुछ दिन बाद होना है पीएम मोदी का इवेंट
मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) में एक शख्स फर्जी PMO पहचान पत्र दिखाकर सुरक्षा घेरे में घुसने की कोशिश करते पकड़ा गया है. जानकारी के मुताबिक उसका नाम रोहन पारेख है. दरअसल ये मामला इसलिए और गंभीर हो गया क्योंकि यह घटना उसी वेन्यू पर हुई है जहां कुछ दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम होने वाला था. आइए जानते हैं कि आखिर रोहन पारेख है कौन है ये पूरा मामला क्या है.
रोहन पारेख की गिरफ्तारी कब और कहां हुई?
7 सितंबर की शाम रोहन पारेख बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित एक कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा उनके साथ उनका निजी बॉडीगार्ड दिलीप कुंडे भी था, जिसके पास हथियार मौजूद था. जब कुंडे वेन्यू के अंदर दाखिल होने लगा तो डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर ने उन्हें रोक दिया. इसके बाद पारेख वापस लौटा और अपना कथित PMO पहचान पत्र सुरक्षाकर्मियों को दिखाया जिसमें उसे 'ग्रेड C अधिकारी' बताया गया था.
आखिर वह कार्ड फर्जी कैसे साबित हुआ?
मुंबई पुलिस के मुताबिक जांच में सामने आया कि जो पहचान पत्र दिखाया गया उसमें कई गंभीर खामियां थीं. जैसे कार्ड पर जारी होने की तारीख तो लिखी थी लेकिन उसकी वैधता यानी एक्सपायरी डेट गायब थी जो सरकारी पहचान पत्रों में अनिवार्य रूप से होती है. इसके अलावा कार्ड पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी का नाम तो था लेकिन उसका पद कहीं दर्ज नहीं था. इन्हीं खामियों की वजह से सुरक्षा एजेंसियों को शक हुआ और मामला पुलिस तक पहुंचा. पुलिस के अनुसार आईकार्ड का रंग भी सही नहीं था. पूछताछ करने पर रोहन संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया.
रोहन पारेख को कब तक हिरासत में रखा गया है?
मुंबई पुलिस ने रोहन को अरेस्ट के बाद अदालत में पेश कर दिया है. बता दें अदालत ने रोहन पारेख को 11 सितंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है. बता दें रोहन के साथ बॉडीगार्ड दिलीप कुंडे को भी गिरफ्तार किया गया है जिसके पास लाइसेंसी हथियार बरामद हुआ है. मुंबई सूत्रों के मुताबिक इस मामले में एक तीसरा आरोपी प्रथमेश बागुल फिलहाल फरार है जिसकी तलाश पुलिस कर रही है. BKC थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है और अब मामले की जांच क्राइम ब्रांच के हाथ में है.
रोहन पारेख का अपना क्या कहना है?
पारेख के वकील ने अदालत में दावा किया कि उनके मुवक्किल को गलत तरीके से फंसाया गया है. वकील के मुताबिक साल 2024 में तरुण कपूर नाम के किसी व्यक्ति ने पारेख को PMO में काम करने का प्रस्ताव दिया था. इसके बाद उन्हें महक गुप्ता के नाम से एक एडवाइजरी रोल और तरुण गुप्ता की तरफ से डिफेंस एक्विजिशन पॉलिसी से जुड़ा एक ईमेल भी मिला था. वकील का दावा है कि इसके अलावा PMO से जुड़े कुछ ईमेल एक आधिकारिक ऑफर लेटर और प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर वाला एक पत्र भी उन्हें भेजा गया था. वकील का कहना है कि पहचान पत्र भी उन्हें सिर्फ स्क्रीनशॉट के रूप में मिला था और इसकी कोई फिजिकल कॉपी कभी नहीं दी गई थी.
खबर अपडेट की जा रही है
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation






