सत्यनिकेतन बिल्डिंग हादसा: जब लालच और प्रशासन की नाकामी ने ली मासूमों की जान
देश की राजधानी दिल्ली का सत्यनिकेतन इलाका, जो साउथ कैंपस के छात्रों के लिए एक प्रमुख पीजी हब माना जाता है, आज एक बड़ी त्रासदी का गवाह बन गया है. यहां की P14 बिल्डिंग के भरभरा कर गिरने से न केवल इलाके में दहशत का माहौल है. बल्कि सिस्टम की घोर लापरवाही और पीजी मालिकों के लालच की भी पोल खुल गई है. हादसे का शिकार हुई यह इमारत महज़ 55 गज की जमीन पर बनी थी, जिस पर नियमों को ताक पर रखकर पांच मंजिलें खड़ी कर दी गई थीं. बिना किसी परमिशन और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखे, इमारत के नीचे बेसमेंट में भी निर्माण कार्य चल रहा था. यह बिल्डिंग 'हॉस्टल डेज' नाम से एक पीजी थी, जो इलाके के सबसे महंगे पीजी में से एक था. यहां एक बेड का किराया 15,000 रुपये तक वसूला जा रहा था [10:54]। ज्यादा मुनाफे के लालच में बिल्डिंग की स्ट्रक्चरल सेफ्टी (ढांचागत सुरक्षा) को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया. इस दर्दनाक हादसे के बाद से देश के अलग-अलग कोनों से यहां पढ़ने आए छात्रों में भारी खौफ है. छात्रों का कहना है कि इमारत में दरारें आ चुकी थीं और वह हल्की तिरछी भी हो रही थी, जिसकी भनक लगने पर कुछ छात्रों ने पहले ही यह पीजी छोड़ दिया था. पीजी मालिक छात्रों से 11 महीने का कॉन्ट्रैक्ट और भारी सिक्योरिटी डिपॉजिट लेते हैं, जिससे छात्र चाहकर भी आसानी से सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट नहीं हो पाते. अब हादसे के बाद कई छात्र खौफ के साये में हैं और उनके माता-पिता उन्हें वापस घर बुला रहे हैं.
पूजा में मौली या कलावा क्यों बांधा जाता है? जानें हाथ पर बांधे जाने वाले इस धागे का धार्मिक महत्व
Mauli Kalawa religious significance: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान कई तरह की परंपराओं का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एक है कलाई पर मौली या कलावा बांधना। पूजा, हवन, गृह प्रवेश, विवाह और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में पंडित या परिवार के बड़े सदस्य इसे कलाई पर बांधते हैं।
धार्मिक मान्यता में इस धागे को शुभता, संकल्प और ईश्वर के प्रति आस्था से जोड़ा जाता है।
मौली या कलावा क्या होता है?
मौली सामान्य तौर पर सूती धागे का बना पवित्र धागा होता है। इसे कई जगह कलावा भी कहा जाता है। अलग-अलग परंपराओं में इसके रंग और बांधने के तरीके में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है।
पूजा के दौरान इसे मंत्रोच्चार के साथ कलाई पर बांधने की परंपरा है।
लाल और पीले रंग के धागे का क्या महत्व है?
मौली में अक्सर लाल और पीले रंग का इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक परंपराओं में लाल रंग को शक्ति और मंगल से तथा पीले रंग को शुभता और आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है।
इसी वजह से इन रंगों से बने धागे का इस्तेमाल कई धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।
कलावा बांधते समय संकल्प का क्या संबंध है?
पूजा में मौली बांधना केवल धागा पहनना नहीं माना जाता। कई धार्मिक परंपराओं में इसे किसी शुभ कार्य या पूजा के संकल्प से भी जोड़ा जाता है।
धागा बांधते समय व्यक्ति ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है और पूजा या धार्मिक अनुष्ठान को पूरी निष्ठा से करने का भाव रखता है।
कलाई पर ही क्यों बांधा जाता है?
धार्मिक परंपरा में कलाई को मौली बांधने के लिए प्रमुख स्थान माना गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे किस हाथ में बांधा जाए, इसे लेकर अलग मान्यताएं मिलती हैं।
कई परिवारों में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग हाथ में कलावा बांधने की परंपरा भी बताई जाती है। इसलिए इस विषय में स्थानीय और पारिवारिक परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।
क्या मौली हमेशा हाथ में बांधे रखनी चाहिए?
इसे लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं हैं। कुछ परंपराओं में इसे तब तक रखने की बात कही जाती है, जब तक यह अपने आप ढीली या टूट न जाए। वहीं कुछ लोग धार्मिक अवसर के बाद इसे उचित तरीके से हटाते हैं।
इसलिए किसी एक नियम को सभी परंपराओं पर लागू नहीं किया जा सकता।
मौली सिर्फ धागा नहीं, आस्था का प्रतीक है
आज भी पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों में मौली बांधने की परंपरा व्यापक रूप से देखने को मिलती है। भक्तों के लिए यह धागा शुभता, संकल्प और धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।
इसके पीछे अलग-अलग धार्मिक परंपराओं की अपनी मान्यताएं हैं, जिन्हें लोग श्रद्धा के अनुसार निभाते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और परिवारों में मौली या कलावा बांधने के नियम अलग हो सकते हैं। इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।
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