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Jan Gan Man: SC/ST Act सुरक्षा का कानून है या दुरुपयोग का हथियार? Swatantra Bhardwaj Case से उठे बड़े सवाल

जब कोई कानून समाज के कमजोर और वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है, तो उसका उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होता है। लेकिन जब उसी कानून के दुरुपयोग के आरोप सामने आने लगें, निर्दोष लोगों के फंसने की आशंका उठे और अदालतें भी बार-बार सावधानी बरतने की जरूरत महसूस करें, तब बहस केवल कानून के समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं रह सकती। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़ा हालिया मामला इसी व्यापक बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।

7 सितंबर को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने स्वतंत्र भारद्वाज को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उन पर जून में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान सीजेपी से जुड़ी एक कार्यकर्ता के पिता और आंबेडकरवादी कार्यकर्ता संजय आजाद के साथ कथित मारपीट के मामले में कार्रवाई हुई। दिल्ली पुलिस ने बाद में एफआईआर में एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आपराधिक धमकी की धाराएं भी जोड़ दीं। इस मामले में सूरज कुमार नामक एक अन्य आरोपी को भी गिरफ्तार किया गया है।

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हालांकि, इस प्रकरण का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र भारद्वाज का कहना है कि उन्होंने किसी पर जानबूझकर हमला नहीं किया, बल्कि लगभग 25-30 लोगों की भीड़ ने उन पर हमला किया था और उन्होंने आत्मरक्षा में प्रतिक्रिया दी। उनका दावा है कि हाथ में पहने कड़े से संजय आजाद के सिर पर अनजाने में चोट लग गई होगी। प्रदर्शन का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें भीड़ के बीच पुलिसकर्मी भारद्वाज को वहां से निकालने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि संजय आजाद के एक वीडियो में भी चोट को अनजाने में लगी चोट बताया गया था। दिल्ली पुलिस ने भी पहले कहा था कि सिर की चोट साधारण प्रकृति की थी। ऐसे में मामला अदालत और जांच एजेंसियों के सामने है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा। लेकिन इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या हर विवाद, झगड़े या मारपीट को स्वतः जातिगत अत्याचार का मामला मान लेना उचित है?

यहीं से एससी/एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग पर बहस शुरू होती है। देखा जाये तो 1989 का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम जाति आधारित हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों को विशेष सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया था। यह कानून आवश्यक है, क्योंकि भारत में जातिगत अत्याचार की वास्तविक और गंभीर समस्या से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कानून की मजबूती के साथ उसके निष्पक्ष उपयोग की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में इस कानून के संभावित दुरुपयोग और अप्रासंगिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका का उल्लेख किया था। अदालत ने तब यह सवाल उठाया था कि क्या किसी निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता बिना पर्याप्त विचार के छीनी जा सकती है? बाद में विधायी और न्यायिक प्रक्रियाओं के जरिए कानून की मूल कठोरता बहाल कर दी गई, लेकिन निर्दोष को झूठे मामले में फंसने से बचाने का प्रश्न आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

एनसीआरबी के आंकड़ों को लेकर भी बहस जटिल है। उपलब्ध आंकड़ों में एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि दिखाई देती है। 2020 में लगभग 45,995 मामले दर्ज हुए, 2022 में यह संख्या 52,866 तक पहुंची और 2023 में 53,372 मामलों का पांच वर्षीय उच्च स्तर दर्ज किया गया। 2024 में मामलों की संख्या घटकर 48,669 बताई गई। लेकिन केवल एफआईआर की संख्या से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि हर मामला सिद्ध जातिगत अत्याचार था। एफआईआर दर्ज होने और अदालत में अपराध साबित होने के बीच लंबी जांच और न्यायिक प्रक्रिया होती है।

इसीलिए कम दोषसिद्धि, अंतिम रिपोर्ट, बरी होने और मामलों के बंद होने के आंकड़ों को भी गंभीरता से समझना होगा। कम दोषसिद्धि के पीछे कमजोर जांच, गवाहों का मुकरना, समझौता या साक्ष्यों की कमी जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए हर बरी होने को स्वतः “फर्जी केस” कहना भी गलत होगा। लेकिन जब अदालतें स्वयं दुर्भावनापूर्ण मुकदमों और कानून के दुरुपयोग की बात करें, तब इस समस्या को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं।

हाल के वर्षों में कई हाईकोर्टों ने स्पष्ट किया है कि हर पेशेवर विवाद, प्रशासनिक मतभेद या व्यक्तिगत झगड़े को एससी/एसटी एक्ट के दायरे में नहीं लाया जा सकता। फरवरी 2026 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर हर अपमान या विवाद तब तक एससी/एसटी एक्ट का अपराध नहीं बन सकता, जब तक स्पष्ट रूप से जाति आधारित सार्वजनिक अपमान या दुर्व्यवहार के तत्व न हों। इसी प्रकार कर्नाटक और बॉम्बे हाईकोर्ट के कुछ मामलों में भी अदालतों ने कथित जातिगत अपराध और सामान्य विवाद के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

एक और संवेदनशील मुद्दा मुआवजे की व्यवस्था है। एससी/एसटी अत्याचार निवारण नियमों के तहत पीड़ितों को आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है, जो वास्तविक पीड़ितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा तंत्र है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि एफआईआर और चार्जशीट के चरणों में मिलने वाली राहत के कारण कुछ मामलों में आर्थिक लाभ के लिए झूठे आरोप लगाने की आशंका पैदा हो सकती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जुड़े कुछ मामलों और टिप्पणियों में बार-बार मुआवजे के दावों तथा कथित बिचौलियों की भूमिका की जांच की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की गई है।

देखा जाये तो समस्या का समाधान कानून को कमजोर करना नहीं है। वास्तविक जातिगत अत्याचारों के पीड़ितों को मजबूत कानूनी सुरक्षा और त्वरित न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, राजनीतिक प्रतिशोध, कार्यस्थल संघर्ष या आर्थिक लाभ के लिए किसी कठोर कानून का कथित हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं हो।

स्वतंत्र भारद्वाज का मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और किसी भी व्यक्ति के दोष या निर्दोष होने का फैसला अदालत ही करेगी। लेकिन यह प्रकरण एक बड़ी बहस का अवसर जरूर देता है। कानून इतना मजबूत होना चाहिए कि वास्तविक पीड़ित न डरें, लेकिन जांच इतनी निष्पक्ष भी हो कि कोई निर्दोष व्यक्ति केवल आरोप लगने के कारण अपना सम्मान, आजादी और जीवन के वर्ष न गंवा दे।

बहरहाल, न्याय का अर्थ केवल दोषी को सजा देना नहीं है। न्याय का अर्थ निर्दोष को बचाना भी है। एससी/एसटी एक्ट जैसे कठोर और आवश्यक कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी, जब वास्तविक अत्याचारों पर कठोर कार्रवाई के साथ-साथ उसके किसी भी कथित दुरुपयोग को भी समान गंभीरता से रोका जाएगा। आखिर कानून का उद्देश्य समाज में न्याय स्थापित करना है न कि न्याय के नाम पर किसी नई अन्यायपूर्ण व्यवस्था को जन्म देना।

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Afghanistan Cricket Board ने नक्शे में PoK और Gilgit Baltistan को दिखाया India का हिस्सा, बुरी तरह भड़क उठा Pakistan

पाकिस्तान को शायद सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है, जब उसकी बनाई हुई कहानी पर कोई पड़ोसी देश भरोसा करने से इंकार कर दे। अब अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड यानी एसीबी के एक प्रमोशनल वीडियो ने इस्लामाबाद की बेचैनी को एक बार फिर खुलकर सामने ला दिया है। हम आपको बता दें कि भारत और अफगानिस्तान के बीच होने वाली आगामी क्रिकेट सीरीज के प्रचार वीडियो में भारत के नक्शे को लेकर उठे विवाद ने पाकिस्तान को इतना परेशान कर दिया है कि मामला कथित तौर पर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड से होते हुए विदेश कार्यालय तक पहुंच गया।

दरअसल, अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने रविवार को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर भारत-अफगानिस्तान सीरीज का प्रमोशनल वीडियो साझा किया। वीडियो में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान को भारत का हिस्सा दिखाया गया। बस फिर क्या था। पाकिस्तान की कथित क्षेत्रीय संवेदनशीलता को गहरी चोट पहुंच गई। सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इस नक्शे को लेकर पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के समक्ष चिंता जताई है। हालांकि पीसीबी ने विदेश मंत्रालय को औपचारिक रूप से क्या संदेश दिया और किस तरह की आपत्ति दर्ज कराई, इसकी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। लेकिन इतना जरूर कहा जा रहा है कि इस्लामाबाद इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने पर भी विचार कर सकता है।

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यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब काबुल और इस्लामाबाद के रिश्ते पहले से ही तल्खी के दौर से गुजर रहे हैं। सीमा विवाद, सुरक्षा मुद्दे, सीमा पर झड़पें और हवाई हमलों के आरोपों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और गहरा किया है। पाकिस्तान लगातार अफगान तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी को पनाह देने का आरोप लगाता रहा है और पाकिस्तान के भीतर होने वाले कई घातक हमलों के लिए टीटीपी को जिम्मेदार ठहराता है।

भारतीय खुफिया सूत्रों का कहना है कि काबुल और इस्लामाबाद के बीच बढ़ता तनाव अब केवल सीमा तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर सांस्कृतिक और खेल कूटनीति जैसे ‘सॉफ्ट पावर’ के मंचों पर भी दिखाई दे रहा है। एसीबी के प्रमोशनल वीडियो को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। सूत्रों का मानना है कि अपने आधिकारिक ब्रांडिंग प्लेटफॉर्म के जरिए पाकिस्तान की क्षेत्रीय संवेदनशीलताओं की परवाह न करना काबुल के स्वतंत्र विदेश नीति रुख का संकेत हो सकता है। संदेश साफ है कि अफगानिस्तान भारत के साथ अपने रिश्तों और खेल कूटनीति को पाकिस्तान की पसंद-नापसंद के हिसाब से चलाने को तैयार नहीं दिखता।

एसीबी ने अपने पोस्ट में भारत-अफगानिस्तान सीरीज को दो देशों के बीच गहरे इतिहास, संस्कृति और क्रिकेट के साझा जुनून का संगम बताया। बोर्ड ने कहा कि ये मुकाबले केवल क्रिकेट मैच नहीं हैं, बल्कि जुनून, उत्साह और महत्व से भरी भिड़ंत हैं, जहां ‘अफगान अटलान’ करोड़ों अफगानों की उम्मीदों और गर्व को मैदान पर लेकर उतरेंगे। हम आपको बता दें कि भारत और अफगानिस्तान के बीच तीन मैचों की सीरीज 13, 15 और 17 सितंबर को नई दिल्ली के अरुण जेटली क्रिकेट स्टेडियम में खेली जानी है।

इसके अलावा, पाकिस्तान की परेशानी सिर्फ एक नक्शे तक सीमित नहीं है। भारत के खिलाफ नैरेटिव की जंग में पाकिस्तान की दूसरी बड़ी समस्या उसके अपने दावों की विश्वसनीयता है। खासकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान ने जिस तरह एआई वीडियो और एनिमेशन का सहारा लेकर दावों की एक पूरी काल्पनिक दुनिया खड़ी करने की कोशिश की, उसने उसके प्रचार तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो ऐसे दिखाई दिए मानो किसी बेहद कम बजट वाली पुरानी फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स को आधुनिक ‘प्रोपेगेंडा’ का नाम दे दिया गया हो। इन वीडियो और एनिमेशन के जरिए पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने भारत के 32 एयरबेस पर हमला किया। जबकि तथ्य यह है कि केवल चार एयरबेस पर सीमित नुकसान की बात सामने आई थी, जिसे भारत ने स्वीकार भी किया था।

एआई वीडियो में पाकिस्तान ने यह दावा भी किया कि उसने भारतीय सैन्य उपग्रहों को जाम कर दिया था। इसी तरह भारत के पावर ग्रिड को हैक कर भारतीय सैन्य अभियानों को बाधित करने का दावा भी किया गया। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का इस संबंध में कहना है कि उस अवधि में भारत की बिजली आपूर्ति प्रभावित होने का कोई प्रमाण नहीं है ना ही भारतीय सैन्य उपग्रहों को जाम करने का दावा सही है। यही नहीं, भारतीय वायुसेना के विमानों को मार गिराने को लेकर भी पाकिस्तान के दावे लगातार बदलते रहे। कभी आठ विमानों की बात हुई, तो कभी संख्या अलग-अलग बताई गई। एक और बड़ा दावा एस-400 श्रेणी की दो सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों को नष्ट करने का था। जबकि सच यह है कि कोई एस-400 यूनिट न तो नष्ट हुई और न ही निष्क्रिय की गई। पाकिस्तान ने भारत में ईंधन आपूर्ति बाधित करने का दावा भी किया जिसको विश्लेषकों ने नकार दिया।

दरअसल, अफगानिस्तान के क्रिकेट वीडियो और ऑपरेशन सिंदूर पर पाकिस्तान के एआई-आधारित दावों में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ पाकिस्तान नक्शे पर दूसरों को निर्देश देने की कोशिश करता है, दूसरी तरफ अपनी सैन्य सफलता साबित करने के लिए ऐसे दावे करता है जिनके समर्थन में ठोस सबूत नदारद हैं। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर पाकिस्तान की समस्या नक्शे से है या उस बदलती क्षेत्रीय वास्तविकता से, जिसमें उसके पड़ोसी अब उसकी नाराजगी को अपनी विदेश नीति का कंपास मानने को तैयार नहीं हैं? साथ ही सवाल यह भी है कि क्या एआई वीडियो और चमकदार एनिमेशन किसी सैन्य दावे को सच साबित कर सकते हैं? पाकिस्तान को समझना होगा कि प्रचार से शोर पैदा किया जा सकता है, लेकिन सबूत नहीं।

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अफगानिस्तान को यह क्या हुआ? सच दिखाकर डिलीट किया POK वाला मैप, पाकिस्तान था आगबबूला

भारत-अफगानिस्तान टी20 सीरीज से पहले एक नक्शे ने पाकिस्तान की टेंशन बढ़ा दी. अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड के प्रमोशनल वीडियो में PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान भारत के नक्शे में दिखे. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने इस पर आपत्ति जताई और मामला विदेश कार्यालय तक पहुंच गया. विवाद बढ़ने के बाद अब लेटेस्ट अपडेट है कि एसीबी ने विवादित मैप वाला वीडियो डिलीट कर दिया है. यह पूरा मामला ऐसे वक्त सामने आया जब अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण हैं. वहीं भारत और अफगानिस्तान की तीन मैचों की टी20 सीरीज 13 सितंबर से दिल्ली में शुरू होने वाली है. Wed, 9 Sep 2026 13:32:28 +0530

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