(दूसरा पैरा में सुधार के साथ)
वडोदरा, आठ सितंबर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में पिछली कांग्रेस नीत सरकार पर ‘‘विकास कार्यों की धीमी गति’’ को लेकर मंगलवार को निशाना साधते हुए कहा कि ‘‘नाराज फूफा’’ अब समर्पित माल ढुलाई गलियारे के ट्रक चालकों पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाएंगे। मोदी ने गुजरात के वडोदरा में आयोजित एक कार्यक्रम में 35,000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करने के बाद जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘भारत ने 2014 के बाद 50,000 आधुनिक रेल कोच बनाए। पिछली (कांग्रेस) सरकार 10 साल में 50,000 शौचालय भी नहीं बना सकी।’’
मोदी ने समर्पित माल ढुलाई गलियारा (पश्चिम) के तीन प्रमुख खंडों का उद्घाटन किया।
यह गलियारा नवी मुंबई के जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह को उत्तर प्रदेश के दादरी से जोड़ता है। इन खंडों के उद्घाटन के साथ ही यह परियोजना पूरी हो गई। मोदी ने कहा, ‘‘समर्पित माल ढुलाई गलियारे तेजी से विकसित हो रहे भारत की जीवनरेखा हैं।
इस आधुनिक माल ढुलाई नेटवर्क के कारण भारत में बदलाव की रफ्तार तेज हो रही है।’’
उन्होंने कहा कि पहले यात्री और मालगाड़ियों को एक ही रेल पटरी पर चलना पड़ता था, जिससे यात्री और माल परिवहन दोनों की रफ्तार धीमी होती थी लेकिन समर्पित माल ढुलाई गलियारे ने इस स्थिति को बदल दिया है। मोदी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा, ‘‘अब नाराज फूफा चिल्लाएंगे कि ट्रक वालों का क्या होगा? फूफा को अब कुछ काम मिल गया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं 2014 के बाद आपके आशीर्वाद से जब दिल्ली पहुंचा तो वहां पहुंचते ही हमने इस परियोजना के काम में तेजी लानी शुरू कर दी।
आज समर्पित माल ढुलाई गलियारे का काम पूरा हो गया है।’’
मोदी ने कहा कि आज माल ढुलाई गलियारे देश के व्यापार और कारोबार की रीढ़ बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2,800 किलोमीटर लंबा समर्पित माल ढुलाई गलियारा इस बात का प्रमाण है कि पिछले 12 वर्ष में देश की कार्यसंस्कृति किस तरह बदली है। मोदी ने कहा, ‘‘इस समर्पित माल ढुलाई गलियारे का विचार 2004 में सामने आया था।
इस काम के लिए 2006 में एक विशेष कंपनी बनाई गई लेकिन 2014 तक फाइलें एक जगह से दूसरी जगह घूमती रहीं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से इन फाइलों की किस्मत में भी कोई समर्पित गलियारा नहीं था। फाइलें कहीं अटक जाती थीं, कहीं पड़ी रहती थीं और इधर-उधर भटकती रहती थीं।
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने मंगलवार (8 सितंबर) को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला रद्द करने से इनकार कर दिया। यह मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "चोरों के सरदार" और "कमांडर-इन-थीफ" (चोरों का कमांडर) कहने वाली उनकी कथित टिप्पणियों से जुड़ा था। गांधी ने इस मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट के समन को चुनौती दी थी और तर्क दिया था कि बीजेपी कार्यकर्ता द्वारा दायर शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है। सिंगल-जज जस्टिस नितिन बोरकर ने गांधी की दलील को खारिज कर दिया और कहा कि एक रजिस्टर्ड राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी होने के नाते, बीजेपी निश्चित रूप से एक पहचान योग्य संस्था है। जज ने कहा कि शिकायतकर्ता का कहना है कि वह दो दशकों से BJP के सक्रिय सदस्य रहे हैं।
BJP के सदस्य और प्रधानमंत्री को 'कमांडर-इन-चीफ़' बताने वाले बयान को पहली नज़र में देखने पर यह नहीं कहा जा सकता कि विवादित टिप्पणी सिर्फ़ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं तक ही सीमित है। आरोप का असल मतलब क्या था और इसका पार्टी के सदस्यों पर क्या असर पड़ेगा, इस पर ट्रायल के दौरान विचार किया जाएगा। इसलिए, इस कोर्ट को विद्वान मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई गैर-कानूनी बात नज़र नहीं आती।
कोर्ट ने शशि थरूर के मामले में दिए गए उस फ़ैसले का आधार लिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने रजिस्ट्रेशन की वजह से एक पहचानी जा सकने वाली और तय संस्था होती है। जज ने इस साल फरवरी में कांग्रेस नेता की याचिका पर शिकायतकर्ता, गांधी और महाराष्ट्र सरकार की बात सुनने के बाद मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था। गौरतलब है कि यह शिकायत भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराई थी, जिन्होंने गांधी को समन जारी किया था। शिकायतकर्ता का तर्क था कि ये टिप्पणियां प्रधानमंत्री और साथ ही सत्ताधारी पार्टी और उसके सदस्यों को निशाना बनाकर की गई थीं, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। उनके अनुसार, मोदी को "चोरों का सरदार" कहने का मतलब असल में सभी BJP सदस्यों को "चोर" बताना था, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं को मानहानि का केस करने का अधिकार मिल गया।
समन और कार्यवाही जारी रखने को चुनौती देते हुए, गांधी ने हाई कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि शिकायत कानूनी रूप से मान्य नहीं थी। उनकी ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट सुदीप पसबोला ने कहा कि गांधी ने ट्वीट में बीजेपी या किसी राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं लिया था और न ही किसी "पहचान योग्य या निश्चित वर्ग" को निशाना बनाया था। पसबोला ने तर्क दिया कि किसी स्पष्ट रूप से पीड़ित व्यक्ति या समूह के न होने पर, शिकायतकर्ता के पास मुकदमा चलाने का अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं था। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि केवल यह अर्थ निकालना कि बयान पार्टी कार्यकर्ताओं पर लागू होता है, आपराधिक मानहानि का मामला नहीं बना सकता।
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